Thursday, 10 December 2015

१२ दिसम्बर

दोहे....२ दिसम्बर
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हम हर गुण की दौड़ में .........कहीं हार कहीं जीत
जो न किसी भी दौड़ में .........वह गुणी होत विनीत

जो न कभी कुछ बन सके........ जो न कभी कुछ पाय
ऐसा तो भगवान ही ............ .....जो हर जगे समाय
अरुण
दोहे....३ दिसम्बर
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मन का पडदा ना हिले ......... देख अपरिचित लोग
परिचय में लग जात है .............. भले बुरे का रोग  

मन के अंदर कुछ नही............इसमें  स्मृति जंजाल
आती बीती का स्मरण .......... .....जन्माता है काल
अरुण
दोहे....४ दिसम्बर
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बीता आता 'कल' हुआ...........स्मृति तो होती 'आज'
कुई 'कर्ता' स्मृतिका हुआ.........भ्रम यह 'मै' का राज  

'मै' भ्रम सब में आ बसा......... अलग थलग भया टूट
भयमय हो भागा करे   .......... ...करे समाजिक जूट
अरुण







दोहे....५ दिसम्बर
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क्या करना?- इस बात को....... जो पाया- वह सुझात
जो पाकरभि अपात है..............क्यों कुछ करने जात  

हर ख़याल इस छोर का ............. .दुजे छोर उकसात
छोर छोर चित लड़त हैं.............. ना चित बिन उत्पात
अरुण
दोहे....६ दिसम्बर
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जड़ पत डाली और फल ..................सभी पेड़ ही पेड़
अलग नाम से देखते.................... वो सब, बस ना पेड़  

हर जवाब को रख लिया.....................बढ़ा ज्ञान भंडार
पर सवाल क्योंकर उठा.................... खोजत अंतरधार
- अरुण
दोहे....७ दिसम्बर
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जैसा भी हो देख ले ........................अपना मन संसार
भला बुरा सब एक सम....................सब में जीवन सार

ना होते कारण कुई...................... ....चढ़े दाँत में पीर
औषध पर औषध करो.....................फिर भी नैनन नीर
- अरुण
दोहे....८ दिसम्बर
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दुनियाभर से नापते....................... मनवा होत उदास
ना ज्यादा ना कम कछु ................. जो भी अपने पास

धूलभरा आँगन पडा.................. .....धूल भरी चहुंओर
धूलभरी मनुआ की झाड़ू ................ करत सफ़ाई घोर
- अरुण

दोहे....९ दिसम्बर
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ख़ुद की मूरत मन बसी................... ले अपना आकार
टूट फूट का डर बना.......................मन हरपल बेज़ार

कटी जेब थी, कल, मगर............. गया, आज, मै जान
कल फूटे थे भाग या.................हुआ, आज, जब ज्ञान?
अरुण
दोहे....१० दिसम्बर
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लाल हरा पीला निला..................मिलकर बनता चित्र
'वाद' बने हर रंग गर..................... .हर तस्वीर विचित्र

हांथ पाँव से ना लढें........................ ना ही उनमें प्यार
सब का मन तो एक ही..................सब का एकही सार
- अरुण

दोहे....११ दिसम्बर
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मन जागे तो जागता..................... सपना और विचार
मन सोवे तो जग उठे.................सकल जगत का सार

चेतन का शीशा, समुख................. ..मन का बिंब बने
मन होते ओझल सकल.................. ....केवल चेत रमे
- अरुण



दोहे....१२ दिसम्बर
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पलभरकी ये जिंदगी....................पल को करे अशांत
'ना होना' पलभर घटे.................... हरपल जीवन शांत

हर पल तो तूफान का................कभी आय कभी जाय
शून्य जगे अवकाश में..................... जो भी आये भाय
- अरुण

Monday, 30 November 2015

1 December

दोहे....७ नवम्बर
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प्यासा पानी पीत है.... कई पीत बिन प्यास
बस प्यासा कहलाय को होंठ लगाय गिलास

माटी कभी न टूटती........ माटी का घट टूट
जो माटी बनकर रहे..........टूट सके ना फूट
अरुण
दोहे....८ नवम्बर
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घूम घूमकर ढूँढता इत उत जित मिल जाय
ढूंढनवाला गुम हुआ........ लागू होत उपाय

दुनिया का सत जानकर.... माथे में धर लेत
माथे का सत जानते........ सत पे माथा टेक
अरुण
दोहे....९ नवम्बर
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जो पलड़े में बैठता...... तुलता है दिन रात
ख़ुद का बोझा छोडते.... राज़ी हो हर बात

पहले मिर्ची खाय दे... सो फिर जले ज़ुबान
मीठे संग तीता धरे....कहे.. चुनो... .मेहमान
अरुण
दोहे....११ नवम्बर
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द्वंद्व हमेशा साथ है... दुई मनुष्य मन माह
दोनो लड़ते रह गये.....बचे न कोई गवाह

जिसने देखा साच को..वो न करत विश्वास
माने से सूरज नही..सूरज अखियन पास
अरुण
दोहे....१४ नवम्बर
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पेटी में का चीज़ है.......खोलेसे दिख जात
मन खोलो बस मान लो, यह बचकानी बात

पेड़ भरम का तन गया तो फैली नीचे छाय
भरम अचानक टूटते.....धूप ही धूप सुझाय
- अरुण
दोहे....१५ नवम्बर
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अगला कोइ न जानता.... अगले छन का हो
यह सच जो स्वीकार ले, बिना किसी डर सोय

जाको धूप न चूबती.......... क्यों ढूँढे वह छाय
जाको डर की पीर हो.......... नीडर बनने जाय
अरुण
दोहे....१६ नवम्बर
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दुखिया सुख को मांगता... मंगते को डर होय
जो चालू क्षण में जिये.. सुख दुख दोनों खोय

दुख को ना कांटा हुआ.. ...होत न सुख में गंध
क्यों दुख से फिर भागते.. जोडत सुख का छंद
अरुण
दोहे....१७ नवम्बर
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सब अपना 'आपनमयी'..'आपन' भ्रम का धाम
जो 'आपन' बिन होत है.....आप सके ना जान

जो समाज की रीत को.... सही सही जी लेत
मन गंदा ही हो भले...........समझा जाए नेक
अरुण

दोहे....१८ नवम्बर
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कब रोना कब हासना... सब दुनिया की सीख
अपना तो कुछ भी नही....सब दुनिया की भीख

चारों ओर दिवार है.......... घर हो अथवा जेल
इक मन से मिलजुल रहे.......दुजा न खाये मेल
अरुण
दोहे....१९ नवम्बर
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आतम आत न जात है... ....वह परमातम साथ
लहर पकड़कर आँख में.....,..दिया समंदर बाट

लिख पढ़ सुन इंसान में.........होत ज्ञान भरमार
ध्यान.. ज्ञान को भेदता.........बहे बोध की धार
अरुण
दोहे....२० नवम्बर
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मिची आँख अंधियार है... ....खुली आँख उजियार
बस, इक पल की बात है.......इस तट से उस पार

अलग अलग सब होत है.... ..होत न सच सहवास
अपने तुपने भाव का........... ...नातों के घर वास
अरुण
दोहे....२१ नवम्बर
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पाँच द्वार के देह में........... ....पंचमुखी एक चोर
जिसे देह ना पा सके.............उसपर इसका ज़ोर

जाको कम से भय लगे.......... ...संचय करता जाय  
जो तुलना से हो ग्रसित........... ख़ुद को कमती पाय
अरुण
दोहे....२२ नवम्बर
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दुनिया है तस्वीर सम..............चित-पट पर है छात
पट पर ध्यान स्थिराय लो  .......कोरापन दिख जात

अँखियाँ भीतर जोड़ दे........ .....वो तेरा गुरु होत
अँखियाँ गर गुरु से सटीं........भीतर का सत खोत
अरुण




दोहे....२३ नवम्बर
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धर मूरत अख़ियन समुख........अँखियाँ लेता मींच
जो ख़ुद को निर्गुण कहे...........गुण के गाता गीत

मन डरता है छांव से........ .......छांव न उसे डरात
डर बिन जिसका चित उसे ..... धूप छांव सब भात
अरुण
दोहे....२४ नवम्बर
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एक बात बैरी कहे.............. वह झूठी कहलाय
वही बात कहे आपनो............सच्चे में गन जाय

गर गाड़ी में बैठते..............चालक पर शक होय
डर से कपतीं यात्रा................कैसे अच्छी होय?
- अरुण
दोहे....२५ नवम्बर
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ना दुनिया में होत है............. सतपुरुषों का संघ
जिनमें करुणा है भरी .......... ...क्यों होवें वे तंग?

सभी पुजारी 'सत्य' के...........मिलकर संघ बनाय
पूजा करते संघ की........... ......रचते झूठ उपाय
अरुण
दोहे....२६ नवम्बर
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अवलोकन भी ज्ञान है.............और संकलन ज्ञान
ज्ञान ज्ञान के भेद को...............ऐ साधक पहचान

अवलोकन है जागृति............. परतु संकलन भिन्न
अवलोकन जिन्दा सजग.......... .परतु संकलन जिन्न
अरुण
दोहे....२७ नवम्बर
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ख़ुद को ख़ुद से जोडना.......... डरे हुओं का काम
ताकद वे जोड़त रहें............ ..जिनकी नींद हराम

सब समाज के कायदे.............. छीन लेत हथियार
हत्या फिर भीतर चले................चले घृणा-तलवार
- अरुण
दोहे....२८ नवम्बर
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सत देखत वह चल पड़े ............नीचे बनती रेख
अब हम सत खोजन लगे.........उस रेखा को देख

जो सवाल बच्चा करे.............. पास न होत जवाब
वह निर्मल मन ज़िद करे.............हम दें उसको दाब
अरुण
दोहे....२९ नवम्बर
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किसी एक से जुट गये.............किसी एक से टूट
जाको कुल का बोध है...............टूट सके ना जूट

निर्मन बाड़ा देह का......................ध्यानी पहरेदार
फिर भी चोरी होत है............... घुसते लाख विचार
अरुण
दोहे....३० नवम्बर
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'उसके' घर निर्मन  खड़ा  ....चले अहम के पाँव
बहकाकर वे ले गये...........निर्मन को मन-गाँव

गुत्थी मनस विचार की ...........थामे मै की गांठ
सुलझाने में जुट गयी........गुत्थी न सुलझत पात
अरुण
दोहे....१ दिसम्बर
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बाघ खड़ा पीछे मेरे.......... भय यह मुझको खाय
पीछे मुड़कर जाँच ले............ना साहस कर पाय

ध्यान देत हर बात पर......... खुदपर ध्यान न जाय
ख़ुद उतरे गर ध्यानमें.......... ...ध्यानी ना बच पाय
अरुण