दोहा....१५ अप्रैल २०१६
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बाट चले जो दिख पड़े ...............हम लेते हैं देख
पेड़ नदी नाला कुवाँ ................ सबसे अँखियाँ एक
तात्पर्य
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सत्य-खोज के मार्ग में, साधक को देखनी है दिखनेवाली हरेक वस्तु, घटना। जो भी दिखे उसे देखना है... अच्छे बुरे का ख़्याल या विचार भुलाकर देखना है। किसी भी चयन को मन में रखकर ध्यान नही हो सकता। ‘यह देखना है और वह नही देखना’ इस भावसे तो ध्यान बट जाएगा। हरेक अनुभव को स्पष्ट दृष्टिसे देखना होगा, समान भावसे देखना होगा।
- अरुण
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दोहा....१६ अप्रैल २०१६
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घट घट में पानी भरा.................मिट गया रीतापन
पानी को कैसी समझ.................... क्या है रीतापन?
तात्पर्य
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रीतेपन की अनुभूति उस पानी के लिए असंभव है जो घड़े में भरा हुआ है। पानी ने घट के रीतेपन को अनुपस्थित कर दिया है। घड़े को तो रीतेपन की अनुभूति कभी थी, पानी निकल जाए तो... फिर हो सकती है, परंतु सवाल यह है कि पानी कैसे जाने घड़े के रीतेपन को?
मन कैसे जाने.. निर्मन क्या होता है?
- अरुण
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दोहा....१७ अप्रैल २०१६
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जड़ पत डाली और फल..................सभी पेड़ ही पेड़
अलग अलग सब देखते............. सभी, सिवा बस पेड़
तात्पर्य
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बात समझने के लिए विश्लेषण आवश्यक है। विश्लेषण के कारण किसी चीज़ के बारे में विस्तार से समझा जाता है। चीज़ के अंगों को, उनके बीच के आंतरिक संबंधों को, ठीक से समझा जाता है। परंतु इसमें एक ख़तरा भी है.. वह यह कि अगर बुद्धि विश्लेषण की ओर झुक जाय तो वस्तु की समग्रता से ध्यान बँट जाता है। समग्र पेड़ का बोध खोकर, विश्लेषक जड़ पत डाली पर ही अलग अलग सोचने लगता है। ध्यानी, समग्रता पर ध्यान बनाए रखत हुए, उसे पलभर के लिए भी न भुलाते, अंगों को निहारता है।
- अरुण
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दोहा....१८ अप्रैल २०१६
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चिंता तो जंजाल है................... फँसने का एक नाम
चिंतन है एक रास्ता ............... और मुक्ती का धाम
तात्पर्य
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चिंता में फँसा आदमी मस्तिष्क की भुलभुलैया में खोता जाता है। चिंतनशील आदमी भुलभुलैया से बाहर निकल मुक्त हो जाता है। चिंता अहंकार का तो चिंतन जागरूकता का स्वभाव है। चिंता स्वयं के बारे में चिंतित है तो चिंतक सकल जगत पर चिंतन मनन करता है।
- अरुण
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दोहा....१९ अप्रैल २०१६
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थोडीसी उर्जा बहोत.................... दो साँसों का खेल
हम भटके इतने यहाँ ................ साँसों में नही मेल
तात्पर्य
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तन, मन और वातावरण में सुसंवाद हो, मेल हो, तालमेल हो तो जीवन सरल सहज जान पड़ता है। परंतु ऐसा होता नही, यह तालमेल या सुसंवाद, एक दुर्लभ वस्तु जान पड़ती है। ऐसे सुसंवाद के लिए जितनी कोशिश करते जाते हैं, मन में अंतर-द्वंद्व बढ़ता जाता है। शांति पाने की इच्छा अशांति की जनक बन जाती है। सुरक्षा की माँग ही जीवन को असुरक्षा के भाव से भर देती है।
जीवन को, पूर्णरूपेण.. भीतर बाहर से, देखते हुए समझ लेना ही एक उपाय है। समझ में ही शांति है, समझ में ही सुरक्षा है, समझ में ही सुसंवाद है।
- अरुण
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दोहा....२० अप्रैल २०१६
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चढ़ चक्के पर होत है................ दुनियाभर की सैर
जो चक्के में फँस गया............... उसकी ना कुइ ख़ैर
तात्पर्य
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गाड़ी पर सवार, यानी चक्के के ऊपर बैठा हुआ, सफ़र का आनंद लेता है। परंतु अगर कोई चक्के के बीच में ही उलझ जाए तो उसकी हालत क्या होगी ? बेचारे का सर, घूमते हुए चक्र में फँसकर चकरा जाएगा। वह बेज़ार हो जाएगा। हम सब प्राय: मन-चक्र में ही फँसे या उलझे व्यथित लोग हैं। जो जाग पाए वही मन की भटकन से बाहर रहकर जीवन का आनंद ले पाए। मन में रहनेवाला उलझनों से जूझता रहता है, परंतु मन पर जागा हुआ, सारी परेशानियों से मुक्त है।
- अरुण
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दोहा....२१ अप्रैल २०१६
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ध्वनि सुधराने, रेडियो................. बजा रहे जो लोग
जो कुछ उसमें बज रहा............. करें न उसका भोग
तात्पर्य
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दृष्टांत यह है कि......
रेडियो मॅकेनिक रेडियो का साउंड ठीक करने के ख़्याल से रेडियो बजाकर ध्वनि की क्वालिटी को चेक कर रहा है। उसका पूरा ध्यान, बज रहे साउंड पर है, वह रेडियो में चल रहे program को नही सुन रहा।
परंतु हमारा पूरा ध्यान मन के विषयों में यानि, programs में, उलझा होता है। यह उलझन हमें हंसाती, रुलाती, चिंतित करती या मन से मिल रही information पर focus कराती रहती है।
हम मन की रचना को अलिप्त रहकर, कभीकदा ही निहारते हैं। ‘मॅकेनिक’ का त्रयस्थभाव रखकर हम मन को नही देखते, हमारा देखना बहुत ही लिप्तता लिए होता है । हम मन के विषयों में रम कर ही मन को भोगते रहते क हैं। मन को देखते नही,, मन में घुलते रहते हैं।
- अरुण
दोहा....२२ अप्रैल २०१६
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घर में मोती खो या............... कोना कोना छान
छितराया सामान,.............. मय पूजाघर भगवान
तात्पर्य
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दृष्टांत यह है कि......
जब घर में कोई मूल्यवान चीज़ जैसे मोती या स्वर्ण आभूषण खो गया हो और आसानी से मिल न रहा हो.... तो आदमी बहुत ही disturbed हो जाता है। अपनी खोज को बहुत ही गंभीरता और गहनता के साथ शुरू कर देता है। खोज की तीव्रता इतनी बढ़ जाती है कि घर की दूसरी वस्तुओं की सुरक्षा का ख्याल न करते हुए वह उन्हे उनके स्थान से हटाबढा कर, बिना उनका मुलायजा किए, उनको बुरीतरह से छितरा कर, उस मूल्यवान चीज़ की खोज में जुट जाता है। यहांतक की पूजाघर में सम्मान से स्थापित भगवान की मूर्ति को भी उठाकर, इधर उधर फेंककर अपनी खोयी वस्तु को खोजने लगता है। मतलब यह कि अगर खोज गहन हो जाए तो दुसरी पूजनीय वस्तुओं को भी गहन परिक्षण से होकर गुज़रना पड़ता है, उनका कोई भी ख़याल नही रखा जाता।
सत्य की खोज में ऐसी ही गंभीरता और तीव्रता की ज़रूरत होती है। सारे सम्मानित संस्कारों और आदरस्थानों को भी सच्चे ओर निष्पक्ष परिक्षण से गुज़ारने का सच्चा साहस करना पड़ता है।
- अरुण
दोहा....२३ अप्रैल २०१६
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बच्चा कुवें गिर पड़ा ......... कोई न उसे निकाल
लगे पाटने सब जने............... कुवाँ वह तत्काल
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
कई बार ऐसा होता है कि दुर्घटना से उपजे संकट को दूर करने के पहले ही हम घटना की ज़िम्मेदारी निश्चित करने में जुट जाते हैं। उसी में हमें अधिक मज़ा आता है। कुवें में गिरे बच्चे को बाहर निकालने से पहले, घटना के लिए कुवें को जिम्मेदार ठहरा कर उसे पाटने की बात को ही हम पहले सोचने लगते हैं। सही चिंतन के स्थान पर चिंता ही हमारे निर्णय को प्रभावित कर देती है।
- अरुण
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दोहा....२५ अप्रैल २०१६
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बैद कहे औषध करो............... होती तबीयत ठीक
काय सुने हर बात को........... जो भी कहे वह मीत?
तात्पर्य
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दृष्टांत यह है कि......
बैद जो भी स्वास्थ्य संबंधी सलाह दे उसे सुनना, पालन करना, उचित ही है। इस नाते बैद हमारा मित्र है। परंतु केवल इस लिए कि वह हमारा मित्र है, उसकी हर सलाह को जो स्वास्थ्य संबंधी नही, हम नही भी सुनते।
परंतु धर्म के संबंध में बात बडी विचित्र जान पड़ती है। धर्म के तथाकथित अधिकारी या गुरू के प्रति आदर रखनेवाले लोग, अज्ञानतावश गुरू के हर वचन को, चाहे वह अधार्मिक ही क्यों न हो, स्वीकारने के लिए प्रवृत्त रहते हैं। गुरू की शिक्षा को स्वीकारो मगर विवेक साथ। धर्म के क्षेत्र में विवेक को खो देना सहज बन जाता है क्योंकि वहाँ श्रद्धा के नाम पर विवेकहीन स्वीकृति का बहुत महात्म है।
- अरुण
दोहा....२६ अप्रैल २०१६
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तन मन में आत्मा बसा ........... आत्मा बसा शरीर
आत्मा में आत्मा बसा................. आत्मा बना शरीर
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
रिक्तता ही जीवन है, रिक्तता ही है ईश्वर। सारे भराव, सारी वस्तुएँ, सारे देह..... रिक्तता की ही अभिव्यक्ति हैं। देह है एक कल्पना.... और रिक्तता है एक यथार्थ। शायद सारे देह या भराव रिक्तता से ही फले हैं। देह है रिक्तता की पहचान, रिक्तता का चेहरा।
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दोहा....२७ अप्रैल २०१६
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अँखियाँ मूँदे सुन रहे ..................... तुम अपने गुरुदेव
सुन न सकोगे सत्य को ...............कितना भी सुन लेव
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
गुरू कितना ही सच्चा क्यों न हो, सच्चा शिष्य ही उससे लाभान्वित हो पाता है। शिष्यत्व की उष्मा ही गुरुवचनों को पकाकर उसका रसपान कराती है। जागा हुआ शिष्य ही गुरुवचनों के आरपार देख पाता है।
- अरुण
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दोहा....२८ अप्रैल २०१६
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तटपर कुंड बनाय कर................... कितना भी लो तैर
जो नदिया में डूबता........................ करता आत्मा-सैर
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
नदी में डूबकी लगाकर नदी के अंतरंग में मग्न होना और नदी के किनारे एक कुंड बनाकर उसमें तैरना... दो बिलकुल ही भिन्न बातें हैं। जो सांसारिक जीवन हम जी रहें हैं उसमें भी अस्तित्व (परम) का स्पर्श हो रहा है, परंतु अस्तित्व (परम) के अंतरंग में विलीन होनेवाले.... पारमार्थिक जीवन से एकरूप हुए होते हैं। सांसारिकता और पारमार्थिक अनुभव.... बिलकुल ही भिन्न स्तर तो हैं पर परस्पर विरोधी नही।
- अरुण
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दोहा....२९ अप्रैल २०१६
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आस्तिकता अस्तित्व से ................ जुडे रहन का नाम
संस्कारों का नाम ना ...............…ना कर्मकांड का नाम
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
‘अस्तित्व और हमसब कहीं से भी अलग या जुदा नही हैं’..इस तथ्य की प्रतीति या अवधान रखते हुए जीवन जीते रहना ही सही आस्तिकता है। किसी संस्कार का स्मरण या पालन, कोई आस्तिकता नही, यह तो केवल एक कर्मकांड मात्र है। शुद्ध नासमझी है।
- अरुण
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दोहा....३० अप्रैल २०१६
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जीकर भी ना जी सके...................... दुनियादारी बीच
एक गुफ़ा फैली रहे......................जनम मरण के बीच
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
अगर, प्राणों के चलनेभर को ही जीवन मान लिया जाय, तो हम कह सकते हैं कि हाँ, हम जी रहे हैं। वैसे तो कोमा में पड़े आदमी को भी जीवित ही माना जाता है। दुनियादारी में उलझा चित्त, जागा हुआ या जीता हुआ चित्त नही होता, क्योंकि वह स्मृति और स्वप्न की गुफ़ा में रहकर अपने रातदिन व्यतित करता रहता है। हमेंशा आशा-निराशा के दौर से गुज़रता रहता है। अपनी ही मननिर्मित दुनिया में खोया रहता है।
जागते हुए जीता तो वह है जो तन मन ह्रदय और वातावरण की समग्रता जिलाए हुए, या उसपर जागृत रहते हुए जीता है।
- अरुण