Wednesday, 30 March 2016

31 March 2016

From 14th March 2016
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Dohe March

दोहे....१३ मार्च २०१६
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स्मृति की पट्टी थामकर............ मनवा नापत काल
ध्यान सधे पट्टी गिरे..............'समय रहित' तत्काल

चित में है सूजन चढी............. मन की चढ़ती पीर
चित जबतक सूजा हुआ .......... अखियाँ ना बेनीर
- अरुण
दोहे....१४ मार्च २०१६
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चिंता चिंतन अहं से .............. जो शरीर आधीन
निराकार चित ध्यान दे......... कुल में जो है लीन

सब निद्रा में लीन हैं ........... बीच बीच कुइ जाग
हर क्षण बिरले ही जगे.............. सगरे अंध-प्रयास
- अरुण
दोहे....१५ मार्च २०१६
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कुछ, मानें फिर जान लें...... कुछ, मानत ही मान
कुछ जानें फिर मानते............. जाने वही सुजान

बिखरों को पागल कहें..............सुधरा, नेक सयान
वैसे सब पागल हुए ...... ...‘बिखर’ ‘सुधर’ पहचान
- अरुण
दोहे....१६ मार्च २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ..................ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले................ प्रज्ञानी परिमल

जिनसे पागलपन हटा...............दुनिया उनसे दूर
उनको केवल पूजती.................... बैठे दूर सदूर
- अरुण
दोहे....१७ मार्च २०१६
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मन ने तोड़ा जगत को............टुकड़ों में भर जान
जिसमें मन लुप्ता गया..........सधा सकल निर्वाण

झूठामूठा दर्द था................... पहुँचे बैद हकीम
सब ही नुक्सा दे रहे........ सच को कुई न चीन  
- अरुण
न चीन=पहचान न पाया
दोहे....१८ मार्च २०१६
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जीवित क्षण जागा हुआ......  देखत भूत भविष्य
हम निद्रावश चूकते................ वर्तमान का दृश्य

देखत सोचत भोगकर............ होवे ‘अनुभव ज्ञान’
जो जागे इस ज्ञान पर ..........उसे ज्ञान का ज्ञान
- अरुण
दोहे....१९ मार्च २०१६
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जो भी उभरे कल्पना ....... उसको सत्य न जान
जहाँ जन्म ले कल्पना.......... वही सत्य का धाम

तन में आत्मा है बसा.......... आत्मा बसा शरीर
आत्मा में आत्मा बसा.......... आत्मा बना शरीर
- अरुण
दोहे....२४ मार्च २०१६
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ख़ुद ही है बाहर खड़ा..............ख़ुद ले उसे निहार
कोई नही भीतर यहाँ...............कुछ भी नही बहार

सागर की गर बूँद ने .......... धर ली भिन पहचान
सागर तो जीवित रहे................. होत बूँद निष्प्राण
इसीलिए जब बूँद को ............. होता सत का ज्ञान
सागर-जीवन भोगती................. बनकर सागर-प्राण
- अरुण
दोहे....२५ मार्च २०१६
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जो होती है कल्पना............... उसको सत्य न जान
जिस कारणवश कल्पना........... सत का वही विधान

मन मेरा हिस्सा महज़ ............ समाज-मन का एक
सदियों की यादें बंधी................... कुछ ही पाए फेंक
- अरुण

दोहे....२८ मार्च २०१६
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मै जागा मनमें मगर............... मन तो रहा अजाग
जो कर दे ख़ुद को ज्वलित............ मै ढूंढू वह आग

गुड के बने गणेशजी.................... गुड का बना प्रसाद
गुड ही गुड को खा रहा................ द्वैत महज़ आभास
- अरुण










Sunday, 13 March 2016

14 March 2016

दोहे....१ मार्च २०१६
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"नौका डूबी मर गये........... पैंतिस चालिस लोग"
नही कोय अपना हुआ.............ख़ुशी मनाते लोग

धरा सत्य है सामने................ पर ढूंढत थक जाय
इस बेढंगी हाट में.............. ख़ुद गाहक बिक जाय
अरुण
दोहे....२ मार्च २०१६
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यह नाटकमय जिंदगी ........... हम नाटक के पात्र
हर पल बदले भूमिका............. बदलत रिश्ते गोत्र

जब जल से बोझिल हुए............. बरसे काले मेघ
उनके मुख प्रज्ञा बहे.................जो प्रकाश आवेग
अरुण
दोहे....३ मार्च २०१६
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हम अंधियारी कोठडी............. उजियारे की आस
क्यों ढूँढे वह रोशनी............. जो ख़ुद होत प्रकाश

निद्रा के दो स्थान हैं.............  बीता और भविष्य
जो जागा देखत रहे................ वर्तमान परिदृश्य
अरुण
दोहे....४ मार्च २०१६
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ख़ुद की थाली ख़ुद चखो...... जानो जीवन अर्थ
बाबाओं से पूछते............... समय गवांते व्यर्थ

मै तो हूं इक यंत्र बस ..... यांत्रिक कहिं कुइ और
हो जिसकी यह भावना ..........वह कुदरत के ठौर
अरुण
दोहे....५ मार्च २०१६
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पेड़ को पत्ता कहो या ......... पात को कह वृक्ष
शब्द बँटते दृश्य बँटता .........ध्यान तो संयुक्त

आँधी सतत विचार की......... मन को दे भरमाय
भ्रमा हुआ मन ढूँढता.......... फिरसे मन की छाय
अरुण
दोहे....६ मार्च २०१६
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एक ही स्वप्न गुबार के......... .दुइ टुकड़े हुइ जात
गर दर्शक फिर दृश्य भी... गर 'यह', 'वह' फिर आत

इस सपने की क़ैद से............... कैसे होऊं मुक्त
जितनी भी कोशिश करूँ ....... सपना होता सक्त
- अरुण
दोहे....७ मार्च २०१६
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मन-माटी तो कल्पना...............जो पाती आकार
खिंचे हवा पर आकृति.......... बनती चित्त-विकार

'दिख पड़ना' और 'देखना'........ दोनों में भिन तत्व
इक केवल है प्रक्रिया.............. दुजा होत कर्तृत्व
अरुण
दोहे....८ मार्च २०१६
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सुख का चिंतन सुखद है......... दुखद दु:ख का ख्याल
चिंता चिंतन चित्त में............... सुख-दुख का जंजाल

सुखदुख के क्यों ढूंढते..............कारन बाहर दूर
देखत रेखा हांथ की ........... बकता जोतिश शूर
अरुण
दोहे....९ मार्च २०१६
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आस्तिकता दर्शन नही........... और न पूजापाठ
आस्तिकता अस्तित्वसे... ..... जुड़े रहन की बात

नही समाधी वो स्थिती ...... जिसकों कहें विशेष
हो जैसे वैसे रहो ............. सजधज को दो फेंक
अरुण
दोहे....१० मार्च २०१६
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ईर्षा प्रीती द्वेष में................ रिश्ते घुलते सार                सार= सारे
रिश्ते रिश्ते ना रहें.............. मनता के अनुसार                मनता=मान्यता

शिष्टाचारी जगत में ..............नाटक चलते रोज़
पूरे खुलकर बोलना .............. पूरे खुलकर सोच
अरुण
दोहे....११ मार्च २०१६
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गागर में सागर भरा................. शब्दों में परमार्थ  
गागर शब्दों में धरा............... जीवन सागर अर्थ

जिसको समझे 'कर रहा'........ वही तो 'करा हुआ'
जनम मरण ना दो घटन........... एक ही 'घटा हुआ'
अरुण


दोहे....१२ मार्च २०१६
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भय की होती त्रासदी............... अहंकार के गांव  
संकट में सब भागते............. सर पर रखकर पाँव

शासक को शासन नशा...........सत्ता उसकी जान
खोने की चिंता सबल.............. वह भय से परशान
अरुण
दोहे....१३ मार्च २०१६
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स्मृति की पट्टी थामकर............ मनवा नापत काल
ध्यान सधे पट्टी गिरे..............'समय रहित' तत्काल

चित में है सूजन चढी............. मन की चढ़ती पीर
चित जबतक सूजा हुआ .......... अखियाँ ना बेनीर
अरुण