दोहे....२ दिसम्बर
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हम हर गुण की दौड़ में .........कहीं हार कहीं जीत
जो न किसी भी दौड़ में .........वह गुणी होत विनीत
जो न कभी कुछ बन सके........ जो न कभी कुछ पाय
ऐसा तो भगवान ही ............ .....जो हर जगे समाय
अरुण
दोहे....३ दिसम्बर
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मन का पडदा ना हिले ......... देख अपरिचित लोग
परिचय में लग जात है .............. भले बुरे का रोग
मन के अंदर कुछ नही............इसमें स्मृति जंजाल
आती बीती का स्मरण .......... .....जन्माता है काल
अरुण
दोहे....४ दिसम्बर
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बीता आता 'कल' हुआ...........स्मृति तो होती 'आज'
कुई 'कर्ता' स्मृतिका हुआ.........भ्रम यह 'मै' का राज
'मै' भ्रम सब में आ बसा......... अलग थलग भया टूट
भयमय हो भागा करे .......... ...करे समाजिक जूट
अरुण
दोहे....५ दिसम्बर
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क्या करना?- इस बात को....... जो पाया- वह सुझात
जो पाकरभि अपात है..............क्यों कुछ करने जात
हर ख़याल इस छोर का ............. .दुजे छोर उकसात
छोर छोर चित लड़त हैं.............. ना चित बिन उत्पात
अरुण
दोहे....६ दिसम्बर
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जड़ पत डाली और फल ..................सभी पेड़ ही पेड़
अलग नाम से देखते.................... वो सब, बस ना पेड़
हर जवाब को रख लिया.....................बढ़ा ज्ञान भंडार
पर सवाल क्योंकर उठा.................... खोजत अंतरधार
- अरुण
दोहे....७ दिसम्बर
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जैसा भी हो देख ले ........................अपना मन संसार
भला बुरा सब एक सम....................सब में जीवन सार
ना होते कारण कुई...................... ....चढ़े दाँत में पीर
औषध पर औषध करो.....................फिर भी नैनन नीर
- अरुण
दोहे....८ दिसम्बर
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दुनियाभर से नापते....................... मनवा होत उदास
ना ज्यादा ना कम कछु ................. जो भी अपने पास
धूलभरा आँगन पडा.................. .....धूल भरी चहुंओर
धूलभरी मनुआ की झाड़ू ................ करत सफ़ाई घोर
- अरुण
दोहे....९ दिसम्बर
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ख़ुद की मूरत मन बसी................... ले अपना आकार
टूट फूट का डर बना.......................मन हरपल बेज़ार
कटी जेब थी, कल, मगर............. गया, आज, मै जान
कल फूटे थे भाग या.................हुआ, आज, जब ज्ञान?
अरुण
दोहे....१० दिसम्बर
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लाल हरा पीला निला..................मिलकर बनता चित्र
'वाद' बने हर रंग गर..................... .हर तस्वीर विचित्र
हांथ पाँव से ना लढें........................ ना ही उनमें प्यार
सब का मन तो एक ही..................सब का एकही सार
- अरुण
दोहे....११ दिसम्बर
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मन जागे तो जागता..................... सपना और विचार
मन सोवे तो जग उठे.................सकल जगत का सार
चेतन का शीशा, समुख................. ..मन का बिंब बने
मन होते ओझल सकल.................. ....केवल चेत रमे
- अरुण
दोहे....१२ दिसम्बर
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पलभरकी ये जिंदगी....................पल को करे अशांत
'ना होना' पलभर घटे.................... हरपल जीवन शांत
हर पल तो तूफान का................कभी आय कभी जाय
शून्य जगे अवकाश में..................... जो भी आये भाय
- अरुण
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हम हर गुण की दौड़ में .........कहीं हार कहीं जीत
जो न किसी भी दौड़ में .........वह गुणी होत विनीत
जो न कभी कुछ बन सके........ जो न कभी कुछ पाय
ऐसा तो भगवान ही ............ .....जो हर जगे समाय
अरुण
दोहे....३ दिसम्बर
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मन का पडदा ना हिले ......... देख अपरिचित लोग
परिचय में लग जात है .............. भले बुरे का रोग
मन के अंदर कुछ नही............इसमें स्मृति जंजाल
आती बीती का स्मरण .......... .....जन्माता है काल
अरुण
दोहे....४ दिसम्बर
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बीता आता 'कल' हुआ...........स्मृति तो होती 'आज'
कुई 'कर्ता' स्मृतिका हुआ.........भ्रम यह 'मै' का राज
'मै' भ्रम सब में आ बसा......... अलग थलग भया टूट
भयमय हो भागा करे .......... ...करे समाजिक जूट
अरुण
दोहे....५ दिसम्बर
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क्या करना?- इस बात को....... जो पाया- वह सुझात
जो पाकरभि अपात है..............क्यों कुछ करने जात
हर ख़याल इस छोर का ............. .दुजे छोर उकसात
छोर छोर चित लड़त हैं.............. ना चित बिन उत्पात
अरुण
दोहे....६ दिसम्बर
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जड़ पत डाली और फल ..................सभी पेड़ ही पेड़
अलग नाम से देखते.................... वो सब, बस ना पेड़
हर जवाब को रख लिया.....................बढ़ा ज्ञान भंडार
पर सवाल क्योंकर उठा.................... खोजत अंतरधार
- अरुण
दोहे....७ दिसम्बर
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जैसा भी हो देख ले ........................अपना मन संसार
भला बुरा सब एक सम....................सब में जीवन सार
ना होते कारण कुई...................... ....चढ़े दाँत में पीर
औषध पर औषध करो.....................फिर भी नैनन नीर
- अरुण
दोहे....८ दिसम्बर
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दुनियाभर से नापते....................... मनवा होत उदास
ना ज्यादा ना कम कछु ................. जो भी अपने पास
धूलभरा आँगन पडा.................. .....धूल भरी चहुंओर
धूलभरी मनुआ की झाड़ू ................ करत सफ़ाई घोर
- अरुण
दोहे....९ दिसम्बर
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ख़ुद की मूरत मन बसी................... ले अपना आकार
टूट फूट का डर बना.......................मन हरपल बेज़ार
कटी जेब थी, कल, मगर............. गया, आज, मै जान
कल फूटे थे भाग या.................हुआ, आज, जब ज्ञान?
अरुण
दोहे....१० दिसम्बर
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लाल हरा पीला निला..................मिलकर बनता चित्र
'वाद' बने हर रंग गर..................... .हर तस्वीर विचित्र
हांथ पाँव से ना लढें........................ ना ही उनमें प्यार
सब का मन तो एक ही..................सब का एकही सार
- अरुण
दोहे....११ दिसम्बर
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मन जागे तो जागता..................... सपना और विचार
मन सोवे तो जग उठे.................सकल जगत का सार
चेतन का शीशा, समुख................. ..मन का बिंब बने
मन होते ओझल सकल.................. ....केवल चेत रमे
- अरुण
दोहे....१२ दिसम्बर
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पलभरकी ये जिंदगी....................पल को करे अशांत
'ना होना' पलभर घटे.................... हरपल जीवन शांत
हर पल तो तूफान का................कभी आय कभी जाय
शून्य जगे अवकाश में..................... जो भी आये भाय
- अरुण