Sunday, 31 July 2016

1-31 July Dohe

दोहा....२ जुलाई २०१६
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आखर पोथी स्कूल की .................. शिक्षा केवल बंध
शिक्षा पा शिक्षित हुए .................... फिर भी रहते अंध

तात्पर्य-
शिक्षा का उद्देश्य आदमी को मानसिक निद्रा से जगाना है। फिर भी होता यह है कि चित्त शिक्षा-सामग्री या जानकारी के रूप में मिले ज्ञान के बोझ से दबकर निद्रा में ही बना रहता है। हाँ यह जानकारी उसे व्यावहारिक अर्थ में मददगार साबित होती है, फिर भी सही अर्थ में उसे ‘दृष्टि’ देगी इस बाक का कोई भरोसा नही। दृष्टि मूल समझ का नाम है, जानकारी या बौद्धिक समस्याओं को हल करने की क्षमता का नही। बौद्धिक क्षमता के सजग उपयोग को ही मूल समझ कहना ठीक होगा।
- अरुण
दोहा....३ जुलाई २०१६
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बिन समझे झुठलाय दे .................. कहलाएँ नास्तिक
बिन समझे जो मान ले................... वह भी तो नास्तिक

तात्पर्य-
आमतौर पर, ईश्वर के होने को जो नकारते हैं, उन्हे नास्तिक कहा जाता है। पर क्या वे सभी जो ईश्वर के होने को मान लेते हैं, आस्तिक हैं? मानना या न मानना आस्तिकता का पैमाना नही हो सकता। जो हाँ कहे वह भी और जो ना कहे वह भी, दोनों एक ही हैं। एक पैरों पे खड़ा है तो दूसरा सर पे। जिसमें अस्तित्व की पूरी समझ जाग जाती है, उसे ही आस्तिक समझें। बाकी सारे शाब्दिक विशेषण किसी भी अर्थ के नही। वे आदमीयों के किए गये, ऊपरी बँटवारे मात्र हैं।
- अरुण
दोहा....४ जुलाई २०१६
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सत खोजन के रास्ते...................... गुरू न होवे कोय
गहन खोज की प्रेरणा .....................


शिष्य बनाए तोय

तात्पर्य-
सत्य-खोज के मार्ग में गहन खोज की प्रेरणा चाहिए। ऐसी गहन प्रेरेणा का होना ही शिष्यत्व का सही आधार है। जिससे भी ऐसी प्रेरणा मिले, चाहे वह व्यक्ति हो या प्रसंग या साहित्य या ग्रंथ या सत्संग या दृष्टांत अथवा कुछ भी, वही सही गुरू है। किसी गुरू विशेष की पूर्वशर्त ज़रूरी नही।
- अरुण
दोहा....५-६ जुलाई २०१६
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कोरी कापी पर लिखे.......................सब को जो है भात
जो सिखलाए जात हैं...................... उन्हीं गुणों को गात

तात्पर्य-
मनुष्य कोरी बही लेकर जन्मता है, जिसपर वही बातें लिख ली जाती हैं जिन्हें दुनिया सराहे, दुनिया को भाये। वही उसके जीवन के मूल्य बनते हैं जिसे दुनिया ने, समाज ने संमति दी हो। मानवीय वातावरण उसे जो शिक्षा व संस्कार दे उसी को वह ग्रहण करता है। लेकिन सत्य की खोज कठोर है, वह मिली हुई जानकारी, शिक्षा और संस्कारों का तटस्थता से पुन: अवलोकन करती है।
- अरुण

आज की यह पोस्ट बैंगलोर से
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दोहा....७ जुलाई २०१६
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‘वह’ न किसी को ख़ूब दे ................और न देत अभाव
उसमें ना कुई दोस्ती.......................... ना कुई बैरीभाव

तात्पर्य-
अस्तित्व करुणामयी है। एक ऐसा प्रेम-स्रोत है जिसमें दोस्ती और दुश्मनी, दोनों को ही कोई स्थान नही, पक्ष-विपक्ष नही, भेदभाव नही, ज़्यादा-कम नही, मेरा-तेरा नही, न्याय-अन्याय नही, अमीर-ग़रीब नही...... बस करुणा ही करुणा है... सब के लिए ... सकल के लिए।
- अरुण
दोहा....८ जुलाई २०१६
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मन का परदा  ना हिले.........................देख अपरिचित लोग
परिचय में लग जात है............................. भले बुरे का रोग

तात्पर्य-
राह चलते कितने ही अपरिचित लोग मिलते हैं और हम उन्हे त्रयस्थभाव से देखते रहते हैं। अपरिचित होने के कारण उनसे हमारा कोई वास्ता नही, नाता नही, भावना नही, स्मृति नही.. न ही उनपर न कोई प्रतिक्रिया होती है और न ही उनका कोई विशेषण होता है। यही भाव सारी परिचित वस्तुओं, व्यक्तियों, प्राणी एवं परिस्थिती बाबत होना चाहिए, परंतु यह संभव नही हो पाता। जहाँ परिचय वहाँ किसी न किसी अच्छी बुरी या उदासीन प्रतिक्रिया का होना अपरिहार्य है।
जबतक स्वयं के प्रति तटस्थता न होगी, अन्यों के प्रति भी नही हो सकती। सारे संबंध,प्रतिक्रियायें, भावनायें स्वयं के केन्द्र से ही होती हैं। स्वयं को जो तटस्थता से देख पाए वही साक्षीभाव का धनी हो पाए।
- अरुण


दोहा....९-१० जुलाई २०१६
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अकड दिखाये दूसरा................................गर तुझमें हो क्रोध
तू भी रोगी गर्व का .......................... कर लो मन में बोध

तात्पर्य-
दूसरों के अहंकारपूर्ण बर्ताव को देखकर हम उनपर अहंकारी होने का आरोप करते हैं। बात यहीं समाप्त हो जाए तो ठीक, पर ऐसा नही होता। क्योंकि बहुधा हमारा आरोप केवल निरीक्षण मात्र से फला नही होता, वह हममें जगे ग़ुस्से या क्रोध की एक प्रतिक्रिया बनकर बाहर आता है। हमें यह बात सहज मालूम पड़ती है और हम उसे भुला देते हैं। परंतु ऐसी स्थिती में अगर भीतर ग़ौर से देखें तो पाएंगे कि हमारे भीतर का अहंकार किसी दूसरे के अहंकार द्वारा आहत हो रहा है।
- अरुण

दोहा....११-१२ जुलाई २०१६
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‘मै’ पृथ्वी हूँ जगत में.........................पृथ्वी में ‘मै’ देश
सूबा हूँ ‘मै’ देश का............................ क्या मेरा परिवेश

तात्पर्य-
अहंकार सूक्ष्म से सूक्ष्म और बृहत् से बृहत् रूप धारण करता रहता है। जैसे जैसे संदर्भ की सीमाएँ बदलती हैं, अहं का आकार भी बदलता जाता है। सृष्टि के संदर्भ में मै पृथ्वी हूँ, पृथ्वी में मै अपने को भारत से identify करता हूँ, भारत में मै महाराष्ट्र, महाराष्ट्र में मेरा जो गाँव है वो, गाँव में मेरा अपना मुहल्ला, मुह्ले में मेरा अपना घर .......इसतरह मेरे अहंकार की काल्पनिक सीमाएँ सदर्भानुसार घटती बढ़ती रहती हैं।
- अरुण
दोहा....१३-१४-१५ जुलाई २०१६
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मन की गौरय्या चुगे................ कण कण में विस्तार
ध्यान चबाये सकल ही...................... एक कौर संसार

तात्पर्य-
मन में विचार एक सीधी रेखा की तरह चलते हैं। जगत के सारे विस्तार को, मन एक क्रमिक ज्ञान के रूप में समय की पट्टीपर... रचता जाता है। परंतु ध्यान सकल सृष्टि को एक क्षण में ही निहार लेता है।
- अरुण
दोहा....१६ जुलाई २०१६
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हिंदू-मन मुस्लिम बने...................... मुस्लिम हिंदू-प्राण
यही खरी है ‘एकता’.......................... बाकी सब भ्रममान

तात्पर्य-
हिंदू-मुस्लिम एकता की बहुत चर्चा होती रहती है। परंतु ‘एकता’ के नामपर जो होता दिखता है, क्या उसीको एकता कहना ठीक होगा? दोनों के बीच आपसी समझौता, आंतरिक-समझ या सामंजस्य के होने को भले ही अच्छा सकारात्मक रुख़ मान लिया जाए, परंतु एकता यह शब्द और भी व्यापक और गहन है। ‘एकता’ का संकेत उस मनोमिलन की ओर है जिसमें हिंदू-मन मुसलमान के अंतरंग में घुला हो और मुसलमान.. हिंदू के प्राणोंको महसूस करता हो। बात आंतरिक-समझ तक ही न रुके तो आगे बढ़कर आंतरिक मिलन में रूपांतरित हो… यही खरा संकेत है ‘एकता’ शब्द का।
- अरुण


दोहा....१७-१८ जुलाई २०१६
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दीप लिये जो ढूँढता ....................... ना दिखता अंधियार
जो जागा ना पालता........................ कोई चित्त- विकार

तात्पर्य-
चित्त के सारे विकार मन के अंधेरे में जन्म लेते हैं। जागरण ऐसा प्रकाश है जिसके अवतरित होते ही सारे मानसिक अंधेरे लुप्त हो जाते हैं, फलत: कोई भी चित्तविकार भी नही फलता। दरअसल न प्रकाश ने कभी अंधेरे को देखा है और न अंधेरे ने प्रकाश को। इसीतरह, जागरण ने निद्रा को और निद्रासे फलनेवाले विकारों को जाना ही नही कभी। जो सकल में जागा वह विकल न होगा, उसका चित्त विकारों से मुक्त होगा।
- अरुण
दोहा....१९-२० जुलाई २०१६
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सपने में घायल हुआ....................... दवा माँगता बैद
दवा उसे क्या काम की.................... जो सपने में क़ैद

तात्पर्य-
सपने का तात्पर्य नींदसे, बेहोशीसे, विचारों-चिंताओं या सपनों में खो जाने से है। ऐसी बेहोशी की अवस्था में होनेवाला कोई भी दुख या मानसिक वेदना किसीभी दवा से दूर नही हो सकती। नींदसे जाग जाना ही एकमेव दवा या उपाय है।
- अरुण
दोहा....२१-२२ जुलाई २०१६
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तनमन एक सुराग़ है .................... आत्मा एक आकाश
इस सुराग़ से झाँक लो .................. आत्मा जो अविनाश

तात्पर्य-
आत्मा को जानने के लिए तनमन की ही आवश्यकता है। इसी माध्यम से अस्तित्व को समझा जा सकता है। तनमन एक सुराग़ है जहांसे परमात्मा में लीन हुआ जा सकता है।
- अरुण
दोहा....२३-२४-२५ जुलाई २०१६
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पाँच द्वार के देह में........................पंचमुखी इक चोर
जिसे देह ना पा सके.................... हासिल कर ले चोर

तात्पर्य-
पाँच इंद्रियों वाले इस देह के भीतर पाँच मुखवाला मन नामक चोर अवतरित होता है। जिन चीज़ों की चाहना होती है, मन उसे शरीर से पहले ही लपककर प्राप्त कर लेता है... इतना ही नही उस वस्तु को मन ही मन उपभोगना भी शुरू कर देता है। भले ही, शरीर, चाही वस्तु को असलियत में, प्राप्त न कर पाए, पर मन हासिल कर लेता है और यह एक मानसिक तनाववाली स्थिति बन जाती है। मनुष्य ऐसे ही तनाओंसे जूझता रहता है... परेशान है।
- अरुण
दोहा....२६-२७-२८ जुलाई २०१६
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मिची आँख अंधियार है.................. खुली आँख उजियार
है इक पल का फ़ासला.....................बंधन....मुक्त-दवार

तात्पर्य-
अँधियारे और उजाले के बीच न कोई फ़ासला है और न ही कोई दीवार। आँख बंद हो तो अँधियारा, खुली हो तो प्रकाश ही प्रकाश। प्रपंच और संस्कारों की पट्टियाँ....परमदृष्टि को रोके रखती हैं, या यूँ कहें कि हमें परमप्रकाश से वंचित रखती हैं। जिस क्षण अनायास, यह रुकावट ओझल हो जाए, परमसयानपन उभर आए।
दोनों के बीच न फ़ासला है वक्त का और न ज़मीनी।
- अरुण
दोहा....२९-३० जुलाई २०१६
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टेप चले गाना बजे..........................गाना गाये गीत
गाना ही गाना सुने.……................... भ्रमित हुआ संगीत

तात्पर्य-
गहन आत्म अवलोकन की जरूरत है.....
कल्पना कीजिए, कहीं कोई टेप, कैसेट, सीडी या रेडियो पर कोई गाना बज रहा हो और उसे सुननेवाला अगर कोई है.... तो वह है स्वयं बजनेवाला वह गाना ही। यही अवस्था मन की है। मन के भीतर विचार या कल्पनाओं के रूप में एक अखंड आवाज़ गूँज रही है और उस आवाज़ को केवल मन के भीतर बजनेवाली वह आवाज़ ही सुन पाती है। मनुष्य का ध्यान इस तरफ नही होता.... वह तो स्वयं मन बन जाता है, पूरी तरह मनाधीन होकर अपनी भ्रमावस्था में जीवन संगीत को खो बैठता है।
- अरुण



Wednesday, 29 June 2016

१ जून से ३० जून २०१६

दोहा....१ जून २०१६
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थाली तेरी सामने.................... खुद सवाद को जान
क्यों दूजे से पूछता........................तू सवाद-पहचान

तात्पर्य-
जो जीवन सामने धरा है उसे अपने अनुभवों से जानना होगा, दूसरों से जानना, जानना नही है। अपने से देखना और दूसरों द्वारा दिखलाया या सिखलाया जाना, दो भिन्न बातें हैं। जीवन को जानने की प्रक्रिया में उधार का ज्ञान किसी भी काम का नही।
- अरुण
दोहा....२ जून २०१६
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आस्तिकता अस्तित्व के.............. अनुभव का है नाम
ना संस्कारों से बने........................ ना कोई फ़रमान

तात्पर्य-
आस्तिकता... अस्तित्व के बोधस्पर्श से फलती है। यह कोई संस्कार या आदत नही जिसे दूसरों में डाला जा सके। न ही आस्तिकता... समाज, समूह या किसी संप्रदाय द्वारा जारी किये गये आदेश का अनुपालन है।
- अरुण
दोहा....३ जून २०१६
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‘मै’ तो हूँ एक यंत्र बस.................. यांत्रिक भी कहीं और
जिसकी है यह भावना........................ वह ईश्वर के ठौर

तात्पर्य-
स्वयं पर चेतना डाल, प्रकाश डाल, ध्यान डाल, जो अपने को अंदर बाहर, सब ओर से पूरी तरह से देख समझ लेता है.... उसकी समझ में यह आ जाता है कि वह कोई स्वतंत्र इकाई नही है, पूर्ण का यानि ब्रह्म का एक हिस्सा मात्र है। वह समझ रहा है कि वह किसी परम-यांत्रिकता का एक पुर्ज़ा है, जिसे (यांत्रिकता) कहीं कोई सतत संचालित कर रहा है। अपने को पुर्ण का हिस्सा मानते हुए,  जानते हुए, अनुभव करते हुए जीनेवाला या ऐसी प्रतीति रखनेवाला... प्रति-क्षण.... ‘ईश्वर’ इस भावना के आधीन रहकर जीवन जी रहा है।
- अरुण
दोहा....४ जून २०१६
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वर्तमान के द्वार से ...................... देखो भूत भविष्य
‘बीती-आती’ के नयन...................... ना देखें सतदृष्य

तात्पर्य-
वर्तमान में वर्तमान रहते यानि वर्तमान में बसते हुए भूत और भविष्य की असलियत या भ्रामकता को देखा जा सकता है। पर इसके उलट, भूत या भविष्य में रमते हुए, वर्तमान का बोध संभव नही है। वर्तमान ही सत्य है, भूतभविष्य हैं कल्पना। सत्य में रहते हुए, कल्पना या असत्य से निपटा जा सकता है, परंतु कल्पना द्वारा सत्य को जानने के कोई भी प्रयास कल्पना मात्र ही होंगे, यानि सत्य से कोसों दूर होंगे।
- अरुण

दोहा....५ जून २०१६
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आँधी सतत विचार की ................... मन मोरा घबराय
डर से व्याकुल ढूँढता ................ फिर, विचार की छाय

तात्पर्य-
कभी कभी.....विचार एक अनियंत्रित तूफ़ान की तरह बहता रहता हैं। मन को डरा देता हैं। फिर, घबराया मन, विचार की मार से बचने के लिए किसी विचार का ही सहारा ढूँढने लगता है। विचार से बचने का उपाय विचार नही, केवल शुद्ध ध्यान या साक्षीभाव ही है।
- अरुण
दोहा....६ जून २०१६
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पानी के सब बुलबुले.............. गया, वो नहि आता
हमने जोड़ा व्यर्थ में...................पुनरजन का नाता

तात्पर्य-
पानी के बुलबुलों का दृष्टांत यह बतलाता है कि
आगमन और निगमन, आना और जाना, उभरना और गिर जाना...... एक सतत का क्रम है। देखनेवालों ने कल्पना के सहारे दोनों में एक संबंध जोड़ा और यह मान लिया कि जो बुलबुला गया वही आया है। जो जाता है, वही नही आता। गया वह पुराना था और जो आता है वह है नया। दोनों के बीच कोई भी नाता नही। अगर है तो इतना ही कि दोनों एक ही अविनाशी तत्व के हिस्से हैं।
- अरुण
दोहा....७ जून २०१६
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सबकुछ जग में सचल है.......... अचल होत नहि कोय
गति देखन के वास्ते................. स्थिरता मन में बोय

तात्पर्य-
सारी चीज़ें, सारे पदार्थ, सारे अस्तित्वकण चल रहे हैं। पृथ्वी, सूर्य, ग्रह, आदमी, प्राणी, जंगल ...... सब के सब गतिमान हैं। ‘स्थिरता’ एक काल्पनिक संदर्भ है जिससे गति को जाना जाता है और ये जो संदर्भ हैं, सापेक्षत:: परस्पर भिन्न भिन्न हैं।
- अरुण

दोहा....८ जून २०१६
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हर क्षण तो होता अलग............. अलग नियम आधीन
सजग होय जो जी रहा...................... होता वही प्रवीन

तात्पर्य-
प्रत्येक क्षण स्वतंत्र है, पूर्णरूपसे भिन्न है, अद्वितीय है, अतुलनीय है। जो हर क्षण में जीता है, इस तथ्य को देख पाता है, पूर्व नियोजित व्यवहारों से प्रेरित नही होता। पूर्व के अनुभवों से नये क्षण को नही जोड़ता। हर क्षण नवीन है और उसे जीनेवाला भी हर पल नवीन है।
- अरुण
दोहा....९ जून २०१६
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जो खोता है आस में........................ सांस न उसे सुझाय
तन को भी वह भूलता.................... जब मन में भरमाय

तात्पर्य-
तन मन और वातावरण, तीनों ही एक संयुक्त इकाई है, अलग अलग नही हैं। फिर भी हमारी चेतना, मन के साथ इतनी उलझी हुई होती है कि उसका शरीर की तरफ़ से ध्यान हट जाता है। दृष्टांत कहता है कि जो अपनी आस में (सोच, इच्छा, कल्पना, चिंता या विचार) में उलझ जाए, उसे अपनी साँस या श्वांसतक का भी पता नही रहता। मन में खोया आदमी तन की तरफ़ से गाफ़िल हो जाता है। चेतना....तन, मन और वातावरण पर एक साथ जागने के बजाय मन पर ही focused  हुई जाती है।
- अरुण
दोहा....१० जून २०१६
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जीवन का मतलब महज़ …………… जी लेना ही होय
दुनिया के मतलब बहुत.............. जीवन जिनमें खोय

तात्पर्य-
जीवन का मतलब केवल जी लेना या जीना ही है। वैसे तो कुटुंब, समाज, समुदाय, संप्रदाय, धर्म, देश, विश्व इत्यादि के संदर्भों ने जीने के साथ कई मतलब या मिशन जोड़ दिये हैं। इसतरह, अपने अपने हिसाब से, सभी ने जीवन के साथ कुछ प्रयोजनों को भी स्थान दे दिया है।
पूरे अस्तित्व को या अस्तित्वगत सच्चाई को इन सब बातों से कोई सरोकार नही होता। मनुष्य अपने स्वीकारे प्रयोजनों से जुड़े या न जुड़े, जीवन की सच्चाई कभी विचलित नही होती। जन्म,जीवन और मरण... इन तीनो बातों की सच्चाई सनातन रही है और रहेगी।
- अरुण
दोहा....११ जून २०१६
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गुड के बने गणेशजी................... गुड का लगता भोग
गुड ही गुड को खात है..................... बँटवारा है रोग

तात्पर्य-
ऐसा भी देखा जाता है कि गुड के बने गणेशजी के सामने गुड का ही नैवेद्य चढ़ाया हुआ है। कहना यह है कि अस्तित्व भी कहीं से बँटा हुआ नही है। अलग अलग संज्ञाएँ या नाम देकर अस्तित्व को बँटा हुआ समझ लिया गया है। यह हमारी सार्वजनिक मौलिक भूल है। न आदमी बँटे हैं, न प्रकृति, न आकाश, न धरती। अलग अलग नाम देकर अस्तित्व को बाँटकर एक उपयोगी भ्रमजगत खड़ा कर देना हमारे मन की भले ही एक जरूरत बन गई हो, परंतु  वास्तविकता में कहीं भी कोई भी विभाजन हुआ नही दिखता।
- अरुण
दोहा....१२ जून २०१६
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जड़ ज़मीन मेरी नही....................... ना शरीर भी मोर
यह भी तो मां-बाप का.................. दुनिया में का मोर?

तात्पर्य-
जड़ ज़मीन संपत्ति की बात तो छोड़िये, यह शरीर जिसे हम अपना मान रहे हैं वह भी अपना कहां? वह भी माँ-बाप की ही देन है। इतनी गहराई और व्यापकता अगर चित्त में जाग जाए तो फिर सारी ग़लतफ़हमियों जिन्हें संजोकर हम जी रहे हैं, अपने से ही लुप्त हो जाएँगी। हमारा सच्चाई के साथ जीना आसान बन जाएगा ।
- अरुण
दोहा....१३ जून २०१६
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शब्दोंकी गाड़ी लिये....................... अर्थ, सूझ भरपूर
सूझ अर्थ को लो पकड................ शब्दों को कर दूर

तात्पर्य-
शब्द एक गाड़ी के समान हैं जिनमें अर्थ, सूझ या आशय को रखकर दूसरे तक पहुँचा दिया जाता है। कितना ही अच्छा हो, अगर आप केवल अर्थ, सूझ या आशय को ही पकड़ें और शब्द को त्याग दें। समझ की प्रक्रिया में शब्दों का होना बहुत ही गड़बड़ या भ्रामकता फैला देता है, हाला की उनकी उपयोगिता को नकारा नही जा सकता। शब्द वाहक तो हैं पर समझ को फलने के मार्ग में एक रोडा भी। शब्द अगर ठीक तरह से न पकडे जाएं तो समझ को त्रुटिपूर्ण बना देते हैं। ज्ञान की जगह अज्ञान का कारण बन जाते हैं।
- अरुण
दोहा....१४ जून २०१६
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दुजा न देगा स्पर्श तुझ................ना करता उद्धार
ग्रंथ गुरू सब छोर तक ............... खुद ही होना पार

तात्पर्य-
आध्यात्मिक शोध पूर्णत: स्वयं की प्रचिति या अनुभव- स्पर्श है, कोई दूसरा, चाहे कितना भी सिद्ध क्यों न समझा जाता हो, किसी भी काम का नही।  खुद को ही खोजना है। हाँ, दूसरा प्रेरणा दे सकता है, दृष्टि दे सकता है, संकेत कर सकता है। परंतु अनुभव-स्पर्श तो निजी ही हो सकता है। गुरू, ग्रंथ तो किनारे तक ले जाने में सहायक बन सकते है लेकिन सत्य की तरलता में डुबकी तो स्वयं को ही लगानी होगी। दुनिया किनारे तक ही साथ दे सकती है, डुबकी लगाकर पार जाने का साहस तो स्वयं में ही उपजे, तो ठीक।
- अरुण
दोहा....१५ जून २०१६
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राग, क्रोध, मद, मोह का...................’मै’ ही ठेकेदार
जो ‘मै’ के बिन हो सका........... पहुँच गया उसपार

तात्पर्य-
अहंकार के कारण ही सारे भावनात्मक दोष पनप रहे हैं। अहंभाव का लोप होने पर ही, इन विकारों की संभावना समाप्त होगी।
- अरुण
दोहा....१६-१७ जून २०१६
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हम अंधियारी कोठडी................ उजियारे की आस
क्यों ढूँढे वह रोशनी.................. जो खुद होत प्रकाश

तात्पर्य-
सांकेतिक अर्थ में, जबतक हमारे जैसे माया मोह में लिप्त लोगों में,  अज्ञान का, भ्रांति का, त्रुटिपूर्ण समझ का, प्रतीति में होनेवाली भूल का... अंधकार व्याप्त है यानि हम ऐसे अंधकार से भरे पड़े हों तो हममें, सही समझ-दृष्टि, पूर्ण ध्यान या जागृति-प्रकाश का जागना आवश्यक है। जो लोग स्वयं से प्रकाशित होते होंगे उन्हे किसी प्रकाश की क्या जरूरत?
संबोधी या enlightenment ….  ‘स्वयं से प्रकाशित होने’ को ही कहते हैं।
- अरुण
दोहा....१८ जून २०१६
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रिश्ते ये इंसान के ..................सब प्रतिमा के ज़ोर
यहाँ एक जो मित है......................... बैरी दूजे छोर

तात्पर्य-
अक्सर यह देखा जाता है कि एक ही आदमी, एकतरफ जब किसी का मित्र हो तो ठीक उसी वक्त दूसरी तरफ, किसी दूसरे से वह अपना शत्रुत्व निभा रहा होता है। आदमी एक ही पर उसकी दो प्रतिमाएँ, किसी एक को वह मित्र लगता है तो किसी दूसरे को वह फूटी आँख नही सुहाता। ज़ाहिर है, रिश्ते दो इंसानों के बीच नही, दो प्रतिमाओं या छबियों के बीच होते हैं। रिश्तों का फ़ैसला इंसानों के आपसी मनजुड़ाव या मनमुटाव करते हैं, उनकी तथाकथित अच्छाईयां या बुराइईयां नही।
- अरुण
दोहा....१९- २०जून २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ .......................... ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले......................... प्रज्ञानी परिमल

तात्पर्य-
दोहा....१९- २०जून २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ .......................... ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले......................... प्रज्ञानी परिमल

तात्पर्य-
जैसे जब देह का तापमान अपनी सामान्य सीमा से हटकर बढता या घटता है तो कहा जाता है कि आदमी बीमार हो गया। उसी तरह जब आदमी सामान्यत: मान्य आचरण से हटकर बर्ताव करने लगे तो कहते हैं आदमी पागल हो गया। जो मान्य मर्यादा के भीतर रहकर आचरण करे उसे ही सयाना या ज्ञानी समझा जाता है।
परंतु सच्चा सयाना या प्रज्ञानी तो वही है जो किसी भी तरह के पागलपन से, चाहे वह सीमा के भीतर हो या बाहर, मुक्त ही रहता है, क्योंकि वह उस प्रक्रिया के प्रति हमेशा सतर्क या जागा हुआ है जो उसे सीमा के बाहर या भीतर ले जाती है। ऐसी सतर्कता उसे पागलपन से पूरीतरह मुक्त कर देती है।
- अरुण
दोहा....२१- २२ जून २०१६
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मानुष ना हम जन्मसे ..................... मानुष एक विकास
जैसा पाला जायगा............................ वैसा होत विकास

तात्पर्य-
एक घटना ऐसी भी घटी कि मनुष्य के शिशु को भेड़िया उठा ले गया और उसने उस शिशु को पाला, अपना दूध पिलाकर अपनी बिरादरी में रखकर बड़ा किया। कुछ ही वर्षों बाद जब वह लड़का मिला, वह भेड़िये की तरह ही चल फिर रहा था, उसकी ही तरह आवाज़ें निकाल रहा था। दिखने में भले ही मनुष्य जैसा था पर आचरण भेड़िये जैसा ही था।
मनुष्य का पिल्ला चुंकि मनुष्य का लालन पोषण पाता है, मनुष्य की ही तरह बड़ा होता है, विकसित होता है। इस विकास का नाम मनुष्य है। अगर उसे भेड़िया पाले पोसे तो वह भेड़िया कहलाएगा, मनुष्य नही।
- अरुण
दोहा....२३-२४ जून २०१६
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हांथ पाँव से ना लढें.......................... ना ही उनमें प्यार
सब अंगों का एक मन......................... ना मनवा बेज़ार

तात्पर्य-
हम देखते हैं कि शरीर के सभी अंगों के बीच एकसूत्रता होती है, एकात्मकता होती है। सभी अंगों में पूरा तालमेल बना रहता है, जिसके कारण उनमें न कोई अंतर्विरोध है और न ही कोई आंतरिक पक्षपात। इसी बात को आधार बनाकर अगर हम सोचें तो हम पाएँगे कि अस्तित्व की हर बात एक ही आत्मीक सूत्र में गुँथी हुई है। फिर भी आदमी जो इस बात से बेख़बर है, कई अनावश्यक संघर्षों से, समस्याओं से जूझ रहा है। न तो उसमें भौगोलिक एवं प्राकृतिक एकांगता है और न ही वैश्विक सद्भाव।
- अरुण
एक शेर
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लगता है ‘मै हूँ’ का मतलब ये नही ‘मै हूँ’
बना जाता है ‘होने का’ एहसास.... ‘लगना’
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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असणे वेगळे.... वाटणे वेगळे
तरीही ‘वाटणे’च घेते ‘असण्या’चे रूप
- अरुण
दोहा....२५-२६ जून २०१६
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जैसे दुखता देह को .......................... कंकड़ काटा बेत
मन के तन को चूबता........................दुख का हर संकेत

तात्पर्य-
मन को दुख की नही, दुख के संकेत की चुबन होती है। मन ने जिस बात, घटना या स्थिति को दुखदायी माना है, उसका ज़रा भी संकेत मन को दुखी कर देता है। भले ही घटना न भी घटे, उसकी कल्पनाभर ही मन को अप्रिय लगने लगती है। दुखदायी घटना के बारे में सोचना या ज़िक्र करना भी एक बुरा लक्षन माना जाता है।
- अरुण
दोहा....२७ जून २०१६
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जलती ज्योती देखकर....................... करते ख़ूब बयान
जो प्रकाश उपभोगता........................ होता वही सयान
तात्पर्य-
परमात्मा की प्रतीति या ज्ञानस्पर्श परमात्मा के विवरण में नही होता। जिसतरह ज्योति का किया गया बयान ज्योति का प्रकाश नही होता, ठीक वैसे ही, परमात्मा जानने या देखने की वस्तु न होकर...स्वयं प्रकाशित होकर जागने का अनुभव है। जागना यानि सयान होना।
- अरुण
दोहा....२८-२९ जून २०१६
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हितमित काहि जमावड़ा ...................जिसका नाम समाज
कोई किसीका क्यों हुआ ................... हो ना गर कुई काज
तात्पर्य-
सारे संबंध किसी काम या मतलब के वास्ते हैं। किसी प्रयोजन से हैं। एक दूसरे की ज़रूरतें पूरी करने के लिए या तो सहज या जानबूझकर, विचारपूर्वक रचे गये हैं। इन रिश्तों के जाल या जमावड़े को ही समाज कहा गया है।
- अरुण

दोहा....३० जून २०१६
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जब जनमा चित साफ़ था................. चढ़ा बाद में ख़्याल
मरकर देखा चित्त को..........................चित था बिन जंजाल
तात्पर्य-
चित्त की वृत्तियाँ शुरू होने से पूर्व या यूँ कहें, मन विकसित होने से पहले चित्त अपनी सहज सरल नैसर्गिक अवस्था में था। विचारों के आक्रमण, जानकारी के बसेरे, उधार में मिले ज्ञान, दोस्ती या दुश्मनी जैसी भावनाओं के स्पर्श से दूर था। मन की इस विकास प्रक्रिया के होते, चित्त की शुद्धता से हम वंचित हुए।
जब फिर सकल बोध हुआ इस अशुद्धीकरण की प्रक्रिया का (यानि जब हम मन से मरे) चित्त की निर्मलता जाग उठी। ये सब बातें आत्मशोध-बोध को ही उजागर हो पाती हैं।
- अरुण

Tuesday, 31 May 2016

मई २०१६

दोहा....१ मई २०१६
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मिची आँख अंधियार है..............खुली आँख उजियार
बस एक पल की बात है........... इस तट से उस पार

तात्पर्य
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हम हर पल हर स्थल सत्यावस्था में ही हैं, फिर भी हमें उस अवस्था का कोई भी भान नही, क्योंकि हम किसी नींद से होकर गुज़र रहे हैं। किसी कल्पना या मायावी दुनिया में मग्न हैं। आँखों के सामने सत्य- सृष्टि के होते हुए भी भीतर किसी मानसिक या काल्पनिक प्रतिसृष्टी का आभास होता रहता है। हम उस प्रतिसृष्टी को ही सत्य-सृष्टि माने हुए जीवनयापन कर रहे हैं।
जो लोग सत्य-सृष्टि की वास्तविकता के प्रति यकायक जाग उठे, या यूँ कहें कि जिनकी आँखें अचानक खुल गईं, वे असत्य के तट से अचानक सत्य के तटपर आ गये, बिना कोई समय लिये, कोई मार्ग चले या किसी प्रयास के किये।
- अरुण
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दोहा....२ मई २०१६
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सपने में ही चल रहा................ हरदम एक प्रयास
नींद कभी ना आ सके............... और न सपना पास

तात्पर्य
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आदमी नींद में हो तभी सपने देखता है। नींद की अवस्था में चलनेवाला विचार भी नींद का ही लक्षण है। नींद में सोचना कि नींद को दूर भगाना है, नींद या बेहोशी की ही एक कृति है। यह होश का लक्षण नही। मनुष्य द्वारा होश के संबंध में चलनेवाला कोई भी विचार, संकल्प या जानाबूझा प्रयास उसके बेहोशी में ही घटता है।
बेहोशी होश को जन्मा नही सकती। होश का पता केवल होश को ही संभव है। सारे स्व से निकले विचार एक तरह से, आदमी के बेहोशी की अवस्था के ही परिचायक हैं।
- अरुण
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दोहा....३ मई २०१६
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बिखरे को पागल कहें...................... सुधरा नेक सयान
पागल तो पागल रहे..................... बिखर सुधर अनुमान

तात्पर्य -
जीवन की सच्चाई यही है कि यहाँ प्रतिस्पर्धा, प्रतिहिंसा, असुरक्षितता का ही माहोल है। हर कोई असुरक्षा और भय का शिकार होने के कारण जीवन की समझ खो बैठा है। सभी यहाँ नासमझ हैं। अज्ञानी या यूँ कहें कि पागल हैं। सभी एक तरह की मानसिक निद्रा में हैं।
हाँ जो इस पागलपन को छोडेबिना या उससे मुक्त हुए बिना समाज के अनुकूल आचरण कर पातें हैं, उन्हे नेक सयान.... तो जो इसतरह की कला या सामंजस्य हासिल करने में असफल रहते हैं उन्हे बिगड़ा हुआ समझा जाता है, सही अर्थ में पागल तो दोनों ही हैं।
- अरुण
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दोहा....४ मई २०१६
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दुनिया का सत जानते...................... माथे में धर लेत
माथे का सत जानते........................ सत पे माथा टेक

तात्पर्य -
दुनिया की हर बात को जानने और इस जानकारी का जीवन में उपयोग करने की परंपरा सदियों से चलती आई है। मनुष्य का मनो-मस्तिष्क ऐसी जानकारी से भरता चला आया है (यानि माथे में धर लेता है) और इसी  ज्ञान या जानकारी के बल पर मनुष्य ने अपनी प्रगति की है। परंतु जिन्होंने मनो-मस्तिष्क का दर्शन कर लिया (यानि माथे का सत जान लिया) वे ही सही माने में मुक्त हो सके, उन्होंने ही सत्य पर अपनी जानने की ललक समर्पित कर दी यानि सत के समक्ष माथा टेक दिया।
- अरुण
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दोहा....५ मई २०१६
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शब्द-अर्थ सब धारणा...................... केवल छाया पक्ष
छायाकण को बोत ही .................... फैले छाया वृक्ष
तात्पर्य -
मनुष्य एक साथ ही दो अलग अलग संसारों या जगतों में जीता है। एक है अस्तित्व-जगत, तो दूसरा है कल्पना जगत। शब्द-अर्थ, विचार, चिंतन-मनन, स्मृतिस्मरण, गणन मापन, ये सब जीवन के मायावी, छायावी या काल्पनिक पक्ष हैं। जिस जगत में इंसान साँस लेता है, जिसके अकाल्पनिक या जीवित संपर्क में रहता है, वह है उसका अस्तित्वगत जगत।

कल्पना या विचार या मान्यता का एक कण या बीज, तत्काल ही एक विशाल वृक्ष खड़ा कर देता है। इस वृक्ष के फैले जाल में ही मनुष्य उलझा या बंधा रहता है। मनुष्य ही वह एकमेव प्राणी है जो अपने कल्पजगत में ख़ुद उलझा पड़ा है और अपने इस काल्पनिक भँवर  में दूसरे सभी मनुष्यों को उलझाए हुए है।
- अरुण
दोहा....६ मई २०१६
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भ्रामक सूर्यप्रकाश को.....................रोके भ्रामक आड़
भ्रामक छाया में बसा.................. यह भ्रममय संसार
दृष्टांत यह है कि -
अगर सूर्य काल्पनिक हो तो उसके प्रकाश को रोके रखनेवाली आड़ भी काल्पनिक ही होगी... और फिर उस काल्पनिक आड़ के पीछे उभरनेवाली छाया भी एक काल्पनिक entity ही होगी। मनुष्य ऐसी ही काल्पनिक entity से रचा हुआ जीवन जी रहा है।
इस वास्तविकता को जो समझ की आँखों से देख सका वही मुक्त हो सका, सारे इस काल्पनिक व्यापार से। कल्पना बंधन है और इसी कल्पना का पूरा पूरा और सटीक एहसास ही है, कल्पना से मुक्ति।
- अरुण
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दोहा....७ मई २०१६
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लाल हरा पीला निला................... मिलकर बनता चित्र
वाद हुआ गर रंग में ................... हर तस्वीर विचित्र

दृष्टांत यह है कि-
चित्र की माँग के अनुसार चित्र में रंग भरे हों तो चित्र सजीव हो उठता है। चित्रकार न तो किसी रंग विशेष के प्रति आग्रही हो सकता है और न किसी रंग को नकार सकता है। रंगों में आपसी भेदभाव या विवाद-भाव, चित्रकार के स्वभाव का हिस्सा नही बन सकता।
जीवन भी परिस्थिति की जो माँग हो, उसके अनुसार अपना रंगढंग बदलता रहता है। परिस्थिति के अनुसार बदलना ही सुसंगति है, किसी आग्रह या दुराग्रह के साथ जीना, जीवन में विसंगति को आमंत्रित करने जैसा है।
- अरुण

दोहा....९ मई २०१६
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हर क्षण तो होता अलग............. अलग नियम आधीन
सजग होय जो जीरहा.................... वह जीवन परवीन

तात्पर्य-
हर क्षण का जीवन अपने आप में एक स्वतंत्र जीवन है। पिछले या अगले क्षण से उसका कोई संबंध नही। वह न तो पिछले को याद करता है और न ही अगले की सोचता है। दरअसल ‘पिछला’ और ‘अगला’... इन दोनों संकल्पनाओं से वह मुक्त है। उसे बस स्वयं की ही अनुभूति है। स्मृति से जुड़ा न होने के कारण, उसे ‘था’ और ‘होगा’ जैसे शब्दों से कोई वास्ता नही।
स्मृति ही क्षणों को जोड़कर एक काल्पनिक जीवन रेखा खींचती है, एक आकार की कल्पना गढ़कर.. अहंकार की कल्पना को जगाती है। इसी अहंकार नामक कल्पना के इर्दगिर्द ही हमारा जीवन घूम रहा है।
- अरुण
दोहा....१० मई २०१६
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तन मन एक सुराग़ है..................... आत्मा इक आकाश
इस सुराग़ से झाँक लो.................... आत्मा जो अविनाश

तात्पर्य-
हरेक व्यक्ति, प्राणी, जीव, जंतु, पौधे, पेड़ आदि सृष्टि की अभिव्यक्तियाँ हैं। यह अभिव्यक्ति ही वह द्वार है जहाँ से सृष्टि में प्रवेश होता है। मनुष्य इस प्रवेश द्वार के प्रति जागरूक नही है। बाहरी विषयों में खोया मन ख़ुद को या ख़ुद में होने वाली प्रक्रिया को देख नही पाता।  जो ख़ुद को देख ले, या यूँ कहें कि जो ख़ुद में झाँक ले उसे अविनाशी अस्तित्व से रहा अपना चिरंतन लगाव समझ आ जाए।
- अरुण

दोहा....११ मई २०१६
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पाँच द्वार के देह में........................ पंचमुखी एक चोर
जिसे देह ना पा सके......................... उसपर उसका ज़ोर

तात्पर्य-
शरीर की पाँच इंद्रियाँ शरीर के वे पाँच द्वार हैं, जहांसे किसीभी वस्तु, प्रसंग या स्थिति का देह उपभोग करता है। देह के लिए जबतक उपभोग संभव नही हो पाता, मन यानि ‘पंचमुखी चोर’ ...मन ही मन उसका उपभोग करने लगता है। ‘पंचमुखी चोर’ द्वारा होनेवाले उपभोग को ही इच्छा या वासना का जागना कहा जाता है। वासना जगती है तभी शरीर उपभोग की दिशा में प्रयास शुरू कर देता है। वासना प्रयास की प्रेरक है।
उदाहरण के लिए, जलेबी खाने की इच्छा होना यानि मन-मुख से ‘जलेबी’ का उपभोग होने लगना।
उपभोग के लिए देह से पूर्व, मन पंहुचकर तुरंत ही उपभोग का आनंद लेने लगता है और शरीर को उस दिशा में सक्रीय कर देता है। महत्वाकांक्षा को जगानेवाले लोग कहते हैं..”पहले चीज़ के ख़्वाब देखना शुरू करो तभी तुम उसे हासिल कर पाओगे”। ख़्वाब देखने का मतलब ही है कि तुम उस चीज़ को मन ही मन हासिल कर लेने की कल्पना करने लगो।
-अरुण
दोहा....१२ मई २०१६
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गर पानी भयदाय हो......................मछली मन बौरात
मछली फिर कैसे जिए.....................सागर में दिनरात

दृष्टांत कहता है कि-
पानी मछली का जीवन तो है, परंतु, अगर मछली का मन बौराकर पानी से डरने लगे, तो मछली का सागर में रहना मुश्किल बन जाएगा।
ठीक उसी तरह हमसब प्राणनौका पर बैठे मृत्यु सागर में जी रहे हैं। मृत्यु से ही उबरते हैं और फिर प्राणों का साथ छूटते ही, मृत्यु में समा जाते है। परंतु इस रहस्य के प्रति असहज बन जाने के कारण, हम मृत्यु की कल्पना मात्र से भयभीत हो जाते हैं।
- अरुण
दोहा....१३ मई २०१६
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जिस घर में हम क़ैद हैं................ गर उससे हो प्रीत
कौन करे आज़ाद फिर..................... बचे न कोई रीत

दृष्टांत का मतलब है कि-
अगर बंधन ही अच्छे लगने लगें तो उनसे मुक्त होने की बात तो बेईमानी ही होगी। मन जिन बातों में रस लेता है, वे ही सब हमारे बंधन हैं और वे बंधन ही हैं दुख के कारण। चीज़ों के प्रति आसक्ति और मिल्कियत का भाव ही बंधन हैं। कोई खुद ही बंधनों को पकड रखे और चिल्लाए कि बंधनों ने उसे जकड़ रखा है, तो कोई दूसरा इसका क्या इलाज करे?
- अरुण
दोहा....१४ मई २०१६
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दुख न किसी को चाहिए.................. यही मांग दुख मूल
हर आशा के फूल में......................... बैठा भय का शूल

तात्पर्य -
जीवन कई विरोधाभासों से भरा पड़ा है। ‘मुझे दुखदायी स्थिती का सामना न करना पडे’ यह सोच या चाह ही दुख का कारण बन जाती है। यह चाह ही आदमी को डराती रहती है। हर नई आशा के भीतर यह भय छुपा रहता है कि कहीं निराश न होना पड़े, या कहीं ऐसा न हो कि आशा की वस्तु प्राप्त होते ही हांथ से निकल जाए।
- अरुण

दोहा....१६ मई २०१६
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परदे पर छाया नचे........................... नचे जगत चित माहि
जात रौशनी दिख पड़े........................ माया यह, कछु नाहि

तात्पर्य -
सिनेमा के स्क्रीन पर जिस तरह प्रकाश-छाया नाचते हुए... एक कहानी का आभास निर्माण कर देती है, ठीक वैसे ही चित्तपर चेतना-प्रकाश का खेल चलता रहता है, लगता है मानो भीतर कोई ‘असली जगत’ सजीव रूप में जी रहा हो। सिनेमा स्क्रीन पर पड़ रहा प्रकाश ओझल होते ही, कोरा सफ़ेद परदा दिख पड़ता है और, असलियत उजागर हो जाती है।
उसीप्रकार, मनुष्य जब पूरे अवधान के साथ, चेतना प्रकाश के कारण, भ्रमरूप में निर्मित हुई जगत-क्रिडा को देख लेता है, उसे जीवन का मायावी स्वरूप स्पष्टता से समझ आ जाता है।
- अरुण
दोहा....१७ मई २०१६
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जो सत देखत डर गया...................... सत को दूर बिठाय
फिर उसकी पूजा करे........................... उसके ही गुण गाय

तात्पर्य -
सत्य की खोज के लिए बड़ा ही आंतरिक साहस चाहिए। असत्य के प्रति मोह रखकर, उसी मोह को जीवन का आधार बनाकर जीनेवाले हमसब, सत्य की झलक पाते ही उससे भयभीत हो जाते हैं। एक तरफ़ असत्य से मोह और दूसरी तरफ़ सच जानने की ललक, हमें बड़े ही दोलायमान या उलझनभरी स्थितीमें छोड देती है। ऐसे अन्तरसंघर्ष से बचने का एक ही उपाय बचता है और वह यह कि हम सत्य को किसी वस्तु, संकल्पना या व्यक्ति जैसा मानकर, बिना उसकी सच्चाई का सामना किए, उसकी पूजा करना या उसके प्रति आदर जतलाना शुरू कर दें।
क्या दुनिया में बहुतेरे ऐसा ही नही कर रहे ?
- अरुण
दोहा....१८ मई २०१६
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धन आपन बढ़ता गया......................... छाती जाती फूल
जिस पेटी में धन धरा..................... वह न करे यह भूल

दृष्टांत कहता है कि -
केवल यह एहसास कि उसकी धन-संपत्ति बढ़ रही है, आदमी को असहज या गर्विला बना देती है। परंतु जहांपर यह धन रखा हो वह पेटी या स्थान जस का तस बना रहता है। बोध यह निकलता है कि दोष धन में नही, उसके प्रति जागनेवाले मिल्कियत के भाव में है, उससे जुड़े ममत्व या अपनेपन की भावना में है।
- अरुण
दोहा....१९ मई २०१६
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चक्का फिरे कुंभार का...................... माटी लेत उभार
दो हाँथों की उँगलियाँ ..................... गढ़ती एक अकार

दृष्टांत कहता है कि -
घूमते चक्केपर माटी उभरती है जिसपर कुंभार दो हाँथों की उँगलियाँ रखकर अपना मनचाहा आकार रचता रहता है।
बोध यह है कि सामने घटनेवाली परिस्थिती को मनुष्य चित्तसंतुलन और ध्यान के सहारे ही मन के अनुकूल बना सकता है। चित्तसंतुलन एवं ध्यान ही जीवन को एक सही व जीवंत आकार देते हैं।
- अरुण
दोहा....२० मई २०१६
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कब रोना कब हासना..................... सब दुनिया की सीख
अपना तो कुछ भी नही....................सब दुनिया की भीख

तात्पर्य-
जन्म से.. जबसे भूमिपर पहली साँस ली, तबसे अबतक बस भीख ही पायी है, अपना कुछ भी नही है। भाषा, चिंतन, वेश, जात, संपत्ति और सभी आदतें दूसरों से ही पाई हुईं हैं। दोस्ती, दुश्मनी, सुख-दुख, हंसी-आँसु.. सब दूसरों ने सिखायी है। हम रिक्त थे फिर हममें अतिरिक्तता का आभास जागा और अंतत: हम फिर रिक्त हो गये।
- अरुण




दोहा....२१ मई २०१६
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परिचय का चश्मा पहन.................... देखत तू संसार
अब नवीनतम कछु नही ............ सब परिचय अनुसार

तात्पर्य-
जो चीज़ परिचित है वह नवीन नही हो सकती। उसकी नवीनता का अनुभव परिचय के पूर्व ही हो सकता है। किसी भी वस्तु या प्रसंग के पूर्णत्व से तभी मिलाप संभव है जब वह वस्तु या प्रसंग नवीन हो। जो अनुभव दुहराये जाते हैं उनमें कोई नवीनता नही रहती, फिर वस्तु का यथार्थपन (वस्तु जैसी है ठीक वैसी ही) नज़र नही आता।
उदाहरण: मानो आपने कोई नया फिल्मीगीत पहली बार सुना। आपने गीत की धुन और शब्द दोनों के मिलाप को सुना। अब अगर आपके कानों को उस गीत की धुन सुनाई देने लगें, तो उसके शब्दों की भी आपको याद आने लगेगी। केवल शुद्ध धुन सुनना मुश्किल बन जाएगा।
- अरुण

दोहा....२२ मई २०१६
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दुख का काटा ना चुभे................ सुख ना देत सुगंध
फिर दुख से क्यों भागते.............. सुख में रहते बंद

तात्पर्य-
दुख और सुख दोनों ही, एक भ्रांति के परिणाम हैं, गलत समझ से उपजे हैं। कोई भी अनुभव अपने आप में न तो सुखद है और न ही दुखद। जिसने ये सारी बातें अच्छी तरह से, समझ के पटल पर देख लीं, उसे न तो सुख से चिपके रहना है और न ही दुख से मुँह मोड़ना है, जो भी हो रहा है, बस उसे देखते रहना है।
- अरुण
दोहा....२३ मई २०१६
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पोथी से एक हांथ उठ.................. करे इशारा दूर
मोहभरी अंखियां मगर............. लगी हांथ को घूर

तात्पर्य-
सारे ग्रंथ, आध्यात्मिक-विचार, पुस्तकें, प्रवचन.... ‘निरर्थक’ होते हैं, इस अर्थ में कि उसमें कही गई बातें अर्थ को सीधे सीधे वहन नही करतीं। किसी दूसरी दिशा में ही इशारा करती हैं, कुछ और ही बतलाती रहती हैं जिसे समझाने में शब्द असमर्थ रहते हैं। मोहवश, आदमी इशारों को समझने के बजाय इशारों की विशेषता में ही, उसके वर्णन में ही उलझ जाता है। इशारा जिस ओर है.. उधर न देखकर, इशारे को ही देखता बैठता है। चौराहे पर ट्राफिक पुलिस के संकेतों को देखकर गाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं, संकेत करनेवाले हाँथों को देखते नही बैठती, उनसे मोह नही लगाती। परंतु पाठकगण आध्यात्मिक पोथियों से उठे हांथ या इशारों में ही उलझ जाते हैं एवं ‘दुर्घटना’ के शिकार बन जातें हैं।
- अरुण
दोहा....२४ मई २०१६
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ध्यान जगे चहुँओर जब.............देख सको इक ओर
जो जागा इक ओर ही..................सोया बाकी छोर

तात्पर्य-
ध्यान और एकाग्रता एक दूजे से भिन्न हैं। सारा ध्यान सिकुड़कर एक पर स्थिर होना, एकाग्रता है। ध्यान में समग्रता है, सर्वव्यापकता है। ध्यान जब सब ओर है, तो इसका मतलब कि कोई स्थान उससे बचा हुआ नही है। ऐसी सर्वव्यापकता किसी एक पर स्थिर नही हो सकती, एकग्र नही हो सकती।
एकाग्रता की माँग है कि सब जगह से हटकर या उनको भुलाकर या उनके प्रति सोते हुए, ... किसी एक ही स्थान या बिंदु पर जागो या focus करो, जबकि सर्वजागरूकता या ध्यान सहज सरल है, वह किसी प्रयास से होनेवाली ध्यान की focusing नही।
किसी एकपर focus होना नींद है। जबकि सब ओर ध्यान का जाना.. जागरूकता का लक्षण है।
- अरुण

दोहा....२५ मई २०१६
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इक अबोध मन आ गया.............. लगा कमाने ज्ञान
होत बोध जब ज्ञान का.................. तब अबोधपन जान

तात्पर्य-
संतों के संबंध में-
जन्म के समय सबों की तरह, उनका मन भी अबोध था। फिर सबों की तरह ही, वातावरण एवं मानवीय संबंधों के माध्यम से ज्ञान संचित होने लगा। लेकिन बाद में उन्हे फिर, इस संचित ज्ञान का उपयोग कम और बोझ ही अधिक महसूस होने लगा,  इसकारण वे ज्ञान के सार असार को परखने लगे। इस तरह की परख या बोध प्रवृत्ती उनमें विकसित होते ही वे ही फिर, अबोध एवं सरल बन गये। ऐसे लोग, जन्म के समय सरल थे, फिर बने कठिन और फिर अबोध सरल बन गये, संत बन गये।
- अरुण

दोहा....२६ मई २०१६
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सपने में होता बदल..................... ..बनी रहे यह नींद
दिन का सपना जागृति.................... वही रात अधनींद

तात्पर्य-
दिन हो या रात, मनुष्य तो नींद में ही जी रहा है। दिन व रात की इस नींद में भिन्नता इतनी ही है कि दिन की नींद में विचार से बने सपने चलते हैं और रात की नींद में सपनों में ढले विचार।
देह-मन की इस नींद प्रक्रिया पर जिसका ध्यान बना रहता है, या जो इसके प्रति सजग/aware है, वही आदमी सही अर्थ में जागृत है।
- अरुण

दोहा....२७ मई २०१६
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स्मृति की माटी ही गढ़े.................. स्मृति की मूरत एक
मूरत फेकन वास्ते......................... स्मृति का कुंड रचेत

तात्पर्य-
स्मृति के कारण ही द्वैतभाव उपजा। ‘मै’ की प्रतिमा बनी। गहन सोच ने (ध्यान ने नही) जाना कि यह ‘मै’ कितना काल्पनिक है, झूठा है। अत: इस ‘मै’ को विसर्जित करने की इच्छा फली और फिर विसर्जन के वास्ते स्मृति का ही कुंड रचा गया।
यहाँ स्मृति का आशय.... मन या Consciousness या बीते की याद से है। यह स्मृति-तत्व ही ‘मै’ का प्राण है, ‘मै-भाव’ की ऊर्जा है।
- अरुण
दोहा....२८ मई २०१६
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हवा हिलाये पात को..................... पात हवा आधीन
अगर भुला दे साँच यह................ दुख में होगा लीन

तात्पर्य-
हवा चली, डाली हिली, पत्ते डोलने लगे। हवा चलेगी तो पत्तों को डोलना ही है। हवा के आधीन रहना ही है, कोई चिंतावाली बात नही। अपनी इस आधीनता को उन्होंने अच्छी तरह स्वीकार कर लिया है, आधीनता की इस स्वाभाविकता से बच निकलने की कभी सोची ही नही उन्होंने। अगर सोचते या आधीनता के सत्य को भुला देते, तो वृक्ष, डाली, पत्ते - सभी.. हवा से डरे डरे रहते, भयभीत रहते, चिंतित रहते... ठीक वैसे ही जैसे, मृत्यु की वास्तविकता को अच्छी तरह या पूर्णरूपेण न देख सकने के कारण,  मनुष्य मृत्यु की  कल्पना से ही काँप उठता है, भीतर ही भीतर भयभीत रहता है।
- अरुण

दोहा....२९ मई २०१६
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ज्ञान ज्ञान तो कछु नही ................ज्ञान न होवे कोय
होत बोध अज्ञान का..................... बोध ज्ञानसम होय

तात्पर्य-
ज्ञान किसे कहें ? वैसे तो, यह शब्द कई ढंग से प्रयोग में लाया जाता है, जानकारी, संज्ञान, परिचय, साक्षात्कार इत्यादि भी ज्ञान के ही प्रतिशब्द हैं। परंतु चुंकि ज्ञान को उसके मूल अवस्था में न देखा या पकड़ा जा सकता है, यहाँ इस दोहे में, ज्ञान के बारे में, “ज्ञान ज्ञान तो कछु नही... ज्ञान न होवे कोय” ऐसा कहा गया है। जो बोध या समझ-स्पर्श, किसी भी असत्य या झूठ के झूठपन को, स्पष्टता से समझा या दिखला दे उसे ही ज्ञान कहना उपयुक्त होगा।
- अरुण



दोहा....३० मई २०१६
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जो बीते का ज्ञान है ....................... कहते उसको भूत
‘ना बीते’ की कल्पना ..................... उसको भी कह भूत

तात्पर्य-
जीवंत अस्तित्व यानि वर्तमान, वह, जो अभी यहाँ जीवित है। बीते अनुभवों से या भविष्य के बारे में देखे जाने वाले सपनों से बनती है.... अस्तित्व के संबंध की कल्पनाएँ। ये दोनों ही कल्पनाएँ या ‘ना अस्तित्व’ की अवस्थाएँ ......भूत यानि मरी हुई ही होती हैं, जीवित नही।
- अरुण


दोहा....३१ मई २०१६
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कुछ करने का ख्याल ही ....................करता मनस अशांत
जब खयाल यह हो निरस..................... मनवा होवे शांत

तात्पर्य-
“मन को शांत करो, शांति को प्राप्त करो”- इस ढंग की नसीहतें, धार्मिक प्रवचनों में दी जाती हुई, दिखती हैं। परंतु जो मन की प्रवाह-प्रक्रिया को निहारता रहे, उसे यह स्पष्ट है कि....ख़याल, विचार, संकल्प, या उद्देश्य, चाहे किसी बात के लिए हो, (शांति के लिए ही क्यों न हो)..... मन को अस्वस्थ या अशांत कर देता है। मन जब तक शांत न हो जाए यानि जबतक किन्हीं प्रयोजनों से मुक्त न हो जाए, कभी भी शांति की अवस्था को प्राप्त नही हो सकता।
समझ की इस भूल के कारण ही, तथाकथित अच्छे अच्छे समझदार लोग भी मन की विवशता से त्रस्त हैं।
- अरुण


Saturday, 30 April 2016

१५ अप्रैल दोहे



दोहा....१५ अप्रैल २०१६
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बाट चले जो दिख पड़े ...............हम लेते हैं देख
पेड़ नदी नाला कुवाँ ................ सबसे अँखियाँ एक

तात्पर्य
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सत्य-खोज के मार्ग में, साधक को देखनी है दिखनेवाली हरेक वस्तु, घटना। जो भी दिखे उसे देखना है... अच्छे बुरे का ख़्याल या विचार भुलाकर देखना है। किसी भी चयन को मन में रखकर ध्यान नही हो सकता। ‘यह देखना है और वह नही देखना’ इस भावसे तो ध्यान बट जाएगा। हरेक अनुभव को स्पष्ट दृष्टिसे देखना होगा, समान भावसे देखना होगा।
- अरुण
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दोहा....१६ अप्रैल २०१६
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घट घट में पानी भरा.................मिट गया रीतापन
पानी को कैसी समझ.................... क्या है रीतापन?

तात्पर्य
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रीतेपन की अनुभूति उस पानी के लिए असंभव है जो घड़े में भरा हुआ है। पानी ने घट के रीतेपन को अनुपस्थित कर दिया है। घड़े को तो रीतेपन की अनुभूति कभी थी, पानी निकल जाए तो... फिर हो सकती है, परंतु सवाल यह है कि पानी कैसे जाने घड़े के रीतेपन को?
मन कैसे जाने.. निर्मन क्या होता है?
- अरुण
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दोहा....१७ अप्रैल २०१६
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जड़ पत डाली और फल..................सभी पेड़ ही पेड़
अलग अलग सब देखते............. सभी, सिवा बस पेड़

तात्पर्य
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बात समझने के लिए विश्लेषण आवश्यक है। विश्लेषण के कारण किसी चीज़ के बारे में विस्तार से समझा जाता है। चीज़ के अंगों को, उनके बीच के आंतरिक संबंधों को, ठीक से समझा जाता है। परंतु इसमें एक ख़तरा भी है.. वह यह कि अगर बुद्धि विश्लेषण की ओर झुक जाय तो वस्तु की समग्रता से ध्यान बँट जाता है। समग्र पेड़ का बोध खोकर, विश्लेषक जड़ पत डाली पर ही अलग अलग सोचने लगता है। ध्यानी, समग्रता पर ध्यान बनाए रखत हुए, उसे पलभर के लिए भी न भुलाते, अंगों को निहारता है।
- अरुण
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दोहा....१८ अप्रैल २०१६
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चिंता तो जंजाल है................... फँसने का एक नाम
चिंतन है एक रास्ता ............... और मुक्ती का धाम

तात्पर्य
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चिंता में फँसा आदमी मस्तिष्क की भुलभुलैया में खोता जाता है। चिंतनशील आदमी भुलभुलैया से बाहर निकल मुक्त हो जाता है। चिंता अहंकार का तो चिंतन जागरूकता का स्वभाव है। चिंता स्वयं के बारे में चिंतित है तो चिंतक सकल जगत पर चिंतन मनन करता है।
- अरुण
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दोहा....१९ अप्रैल २०१६
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थोडीसी उर्जा बहोत.................... दो साँसों का खेल
हम भटके इतने यहाँ ................ साँसों में नही मेल

तात्पर्य
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तन, मन और वातावरण में सुसंवाद हो, मेल हो, तालमेल हो तो जीवन सरल सहज जान पड़ता है। परंतु ऐसा होता नही, यह तालमेल या सुसंवाद, एक दुर्लभ वस्तु जान पड़ती है। ऐसे सुसंवाद के लिए जितनी कोशिश करते जाते हैं, मन में अंतर-द्वंद्व बढ़ता जाता है। शांति पाने की इच्छा अशांति की जनक बन जाती है। सुरक्षा की माँग ही जीवन को असुरक्षा के भाव से भर देती है।
जीवन को, पूर्णरूपेण.. भीतर बाहर से, देखते हुए समझ लेना ही एक उपाय है। समझ में ही शांति है, समझ में ही सुरक्षा है, समझ में ही सुसंवाद है।
- अरुण
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दोहा....२० अप्रैल २०१६
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चढ़ चक्के पर होत है................ दुनियाभर की सैर
जो चक्के में फँस गया............... उसकी ना कुइ ख़ैर

तात्पर्य
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गाड़ी पर सवार, यानी चक्के के ऊपर बैठा हुआ, सफ़र का आनंद लेता है। परंतु अगर कोई चक्के के बीच में ही उलझ जाए तो उसकी हालत क्या होगी ? बेचारे का सर, घूमते हुए चक्र में फँसकर चकरा जाएगा। वह बेज़ार हो जाएगा। हम सब प्राय: मन-चक्र में ही फँसे या उलझे व्यथित लोग हैं। जो जाग पाए वही मन की भटकन से बाहर रहकर जीवन का आनंद ले पाए। मन में रहनेवाला उलझनों से जूझता रहता है, परंतु मन पर जागा हुआ, सारी परेशानियों से मुक्त है।
- अरुण
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दोहा....२१ अप्रैल २०१६
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ध्वनि सुधराने, रेडियो................. बजा रहे जो लोग
जो कुछ उसमें बज रहा............. करें न उसका भोग

तात्पर्य
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दृष्टांत यह है कि......
रेडियो मॅकेनिक रेडियो का साउंड ठीक करने के ख़्याल से रेडियो बजाकर ध्वनि की क्वालिटी को चेक कर रहा है। उसका पूरा ध्यान, बज रहे साउंड पर है, वह रेडियो में चल रहे program को नही सुन रहा।

परंतु हमारा पूरा ध्यान मन के विषयों में यानि, programs में, उलझा होता है। यह उलझन हमें हंसाती, रुलाती, चिंतित करती या मन से मिल रही information पर focus  कराती रहती है।
हम मन की रचना को अलिप्त रहकर, कभीकदा ही निहारते हैं। ‘मॅकेनिक’ का त्रयस्थभाव रखकर हम मन को नही देखते, हमारा देखना बहुत ही लिप्तता लिए होता है । हम मन के विषयों में रम कर ही मन को भोगते रहते क हैं। मन को देखते नही,, मन में घुलते रहते हैं।
- अरुण
दोहा....२२ अप्रैल २०१६
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घर में मोती खो या............... कोना कोना छान
छितराया सामान,.............. मय पूजाघर भगवान
तात्पर्य
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दृष्टांत यह है कि......
जब घर में कोई मूल्यवान चीज़ जैसे मोती या स्वर्ण आभूषण खो गया हो और आसानी से मिल न रहा हो.... तो आदमी बहुत ही disturbed हो जाता है। अपनी खोज को बहुत ही गंभीरता और गहनता के साथ शुरू कर देता है। खोज की तीव्रता इतनी बढ़ जाती है कि घर की दूसरी वस्तुओं की सुरक्षा का ख्याल न करते हुए वह उन्हे उनके स्थान से हटाबढा कर, बिना उनका मुलायजा किए, उनको बुरीतरह से छितरा कर, उस मूल्यवान चीज़ की खोज में जुट जाता है। यहांतक की पूजाघर में सम्मान से स्थापित भगवान की मूर्ति को भी उठाकर, इधर उधर फेंककर अपनी खोयी वस्तु को खोजने लगता है। मतलब यह कि अगर खोज गहन हो जाए तो दुसरी पूजनीय वस्तुओं को भी गहन परिक्षण से होकर गुज़रना पड़ता है, उनका कोई भी ख़याल नही रखा जाता।
सत्य की खोज में ऐसी ही गंभीरता और तीव्रता की ज़रूरत होती है। सारे सम्मानित संस्कारों और आदरस्थानों को भी सच्चे ओर निष्पक्ष परिक्षण से गुज़ारने का सच्चा साहस करना पड़ता है।
- अरुण

दोहा....२३ अप्रैल २०१६
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बच्चा कुवें गिर पड़ा ......... कोई न उसे निकाल
लगे पाटने सब जने............... कुवाँ वह तत्काल
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
कई बार ऐसा होता है कि दुर्घटना से उपजे संकट को दूर करने के पहले ही हम घटना की ज़िम्मेदारी निश्चित करने में जुट जाते हैं। उसी में हमें अधिक मज़ा आता है। कुवें में गिरे बच्चे को बाहर निकालने से पहले, घटना के लिए कुवें को जिम्मेदार ठहरा कर उसे पाटने की बात को ही हम पहले सोचने लगते हैं। सही चिंतन के स्थान पर चिंता ही हमारे निर्णय को प्रभावित कर देती है।
- अरुण
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दोहा....२५ अप्रैल २०१६
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बैद कहे औषध करो............... होती तबीयत ठीक
काय सुने हर बात को........... जो भी कहे वह मीत?
तात्पर्य
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दृष्टांत यह है कि......
बैद जो भी स्वास्थ्य संबंधी सलाह दे उसे सुनना, पालन करना, उचित ही है। इस नाते बैद हमारा मित्र है। परंतु केवल इस लिए कि वह हमारा मित्र है, उसकी हर सलाह को जो स्वास्थ्य संबंधी नही, हम नही भी सुनते।
परंतु धर्म के संबंध में बात बडी विचित्र जान पड़ती है। धर्म के तथाकथित अधिकारी या गुरू के प्रति आदर रखनेवाले लोग, अज्ञानतावश गुरू के हर वचन को, चाहे वह अधार्मिक ही क्यों न हो, स्वीकारने के लिए प्रवृत्त रहते हैं। गुरू की शिक्षा को स्वीकारो मगर विवेक साथ। धर्म के क्षेत्र में विवेक को खो देना सहज बन जाता है क्योंकि वहाँ श्रद्धा के नाम पर विवेकहीन स्वीकृति का बहुत महात्म है।
- अरुण

दोहा....२६ अप्रैल २०१६
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तन मन में आत्मा बसा ........... आत्मा बसा शरीर
आत्मा में आत्मा बसा................. आत्मा बना शरीर
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
रिक्तता ही जीवन है, रिक्तता ही है ईश्वर। सारे भराव, सारी वस्तुएँ, सारे देह..... रिक्तता की ही अभिव्यक्ति हैं। देह है एक कल्पना.... और रिक्तता है एक यथार्थ। शायद सारे देह या भराव रिक्तता से ही फले हैं। देह है रिक्तता की पहचान, रिक्तता का चेहरा।
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दोहा....२७ अप्रैल २०१६
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अँखियाँ मूँदे सुन रहे ..................... तुम अपने गुरुदेव
सुन न सकोगे सत्य को ...............कितना भी सुन लेव

तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
गुरू कितना ही सच्चा क्यों न हो, सच्चा शिष्य ही उससे लाभान्वित हो पाता है। शिष्यत्व की उष्मा ही गुरुवचनों को पकाकर उसका रसपान कराती है। जागा हुआ शिष्य ही गुरुवचनों के आरपार देख पाता है।
- अरुण
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दोहा....२८ अप्रैल २०१६
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तटपर कुंड बनाय कर................... कितना भी लो तैर
जो नदिया में डूबता........................ करता आत्मा-सैर

तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
नदी में डूबकी लगाकर नदी के अंतरंग में मग्न होना और नदी के किनारे एक कुंड बनाकर उसमें तैरना... दो बिलकुल ही भिन्न बातें हैं। जो सांसारिक जीवन हम जी रहें हैं उसमें भी अस्तित्व (परम) का स्पर्श हो रहा है, परंतु अस्तित्व (परम) के अंतरंग में विलीन होनेवाले.... पारमार्थिक जीवन से एकरूप हुए होते हैं।  सांसारिकता और पारमार्थिक अनुभव.... बिलकुल ही भिन्न स्तर तो हैं पर परस्पर विरोधी नही।
- अरुण
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दोहा....२९ अप्रैल २०१६
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आस्तिकता अस्तित्व से ................ जुडे रहन का नाम
संस्कारों का नाम ना ...............…ना कर्मकांड का नाम
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
‘अस्तित्व और हमसब कहीं से भी अलग या जुदा नही हैं’..इस तथ्य की प्रतीति या अवधान रखते हुए जीवन जीते रहना ही सही आस्तिकता है। किसी संस्कार का स्मरण या पालन, कोई आस्तिकता नही, यह तो केवल एक कर्मकांड मात्र है। शुद्ध नासमझी है।
- अरुण
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दोहा....३० अप्रैल २०१६
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जीकर भी ना जी सके...................... दुनियादारी बीच
एक गुफ़ा फैली रहे......................जनम मरण के बीच
तात्पर्य
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मंतव्य यह है कि......
अगर, प्राणों के चलनेभर को ही जीवन मान लिया जाय, तो हम कह सकते हैं कि हाँ, हम जी रहे हैं। वैसे तो कोमा में पड़े आदमी को भी जीवित ही माना जाता है। दुनियादारी में उलझा चित्त, जागा हुआ या जीता हुआ चित्त नही होता, क्योंकि वह स्मृति और स्वप्न की गुफ़ा में रहकर अपने रातदिन व्यतित करता रहता है। हमेंशा आशा-निराशा के दौर से गुज़रता रहता है। अपनी ही मननिर्मित दुनिया में खोया रहता है।
जागते हुए जीता तो वह है जो तन मन ह्रदय और वातावरण की समग्रता जिलाए हुए, या उसपर जागृत रहते हुए जीता है।
- अरुण


Wednesday, 13 April 2016

14 April 2016 Dohe


1 April Dohe 2016
दोहे....१ अप्रैल २०१६
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निर्मलता शिशु की हुई.............पशुसम साफ़ सफ़ेद
नाम धाम की कालिखी.............. मानुष बना फ़रेब

जीता जी धर जी रहा जीवन............. बिन पहचान
जीवन दुष्कर बन गया................. पाते ही पहचान
- अरुण
दोहे....२ अप्रैल २०१६
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हिंदू-मन मुस्लिम बने................मुस्लिम हिंदू-प्राण
यही खरी है एकता.................. बाकी सब उपचार

जीकर भी ना जी सको.............. ‘दुनियादारी’ बीच
एक गुफ़ा फैली रहे.................जनम मरण के बीच
- अरुण

दोहे....३ अप्रैल २०१६
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हो विकास सबके लिए......... जन जंगल सब प्राण
तभी फलेगा क्षेत्र सकल......... करत सबन कल्याण

उसका ना परिचय कुई............क्योंकर करो बयान
जिन देखा वह कह पड़ा...........यही खुदा यहि राम
- अरुण

दोहे....४ अप्रैल २०१६
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तेरे मेरे बीच में........................ खड़ी एक दीवार
तहंकार के गाँव को................. अहंकार का द्वार

भूक प्यास का बोध ले............ खाओ पीओ मस्त
भूक प्यास दो नाम के ..........करो न मज़हब पुष्ट
- अरुण
दोहे....५ अप्रैल २०१६
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तन मन धन सब संपदा......... ब्रह्म जगत का अंग
घर मंजिल मारग सफ़र .......... सब रहते इक संग

ख़ून चले, ढाँचा चले................. चले धरत, अवकाश        धरत= धरती
सूर्य चले, मंडल चले...................चले सभी इक साथ
- अरुण

दोहे....६ अप्रैल २०१६
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मुरदों का स्वागत रहा........... शिशु की सुनी न हास
जीवन तो जीवित नही.................. मृत्यु का उल्हास

काल-कबूतर...................नोंचता घडियों का यह बाज
‘कल’ ‘कल’ दो कल बीच में.........लतपथ पूरा ‘आज’
- अरुण
दोहे....७ अप्रैल २०१६
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एक खुला मैदां जगत.................... फैला सूर्य प्रकाश
मै की छोटी खिड़कियाँ .................. नन्हासा आकाश

मन की गौरैया चुगे................ कण कण से विस्तार
ध्यान चबाए सकल को................... एक कौर संसार
- अरुण
दोहे....८ अप्रैल २०१६
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मनचित तन का अंग है.................तन को करे ग़ुलाम
माँ से जन्मे पुत्र को .....................माँ ने किया सलाम

जल थल या आकाश हो................. इसे दूर उस पास
अंधा देख न पायगा...................... कितहूं करे प्रवास
- अरुण
दोहे....९ अप्रैल २०१६
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‘कर्ता’ तो करता रहे.......................मनसुख ख़ातिर काम
‘होते’ का होता रहे............................सभी काम निष्काम

भाव मुताबिक़ दृष्टि हो........................ दृष्टीसम आचार
नाटक हो गर भाव में........................ नाटकसम व्यवहार
- अरुण
दोहे....१० अप्रैल २०१६
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एकसाथ मन दौड़ता .................... पूरब पश्चिम देस
मन टूटा, टूटा जगत.................... लगती हर पग ठेस

अति लगाव गर व्यक्ति से .......... या विचार या चीज़
भय हिंसा और द्वेष का ................. मन में पड़ता बीज
- अरुण
दोहे....११ अप्रैल २०१६
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हम ख़याल में सोचते .......... भूमि स्पर्श कस भाय
भूमीपर ही हैं खड़े .................. पता न इसका होय

जिस दरवाज़े से घुसे........................ कल्पजगत के बीच
उसी द्वार से लौटता ....................... सच्चा साधकमीत
- अरुण
दोहे....१२ अप्रैल २०१६
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नाटक-घर में वह घुसा................. लौटा करत बयान
घर की ही तारीफ़ बस ..............नाटक रहा न ध्यान

जल बहता सीधा सरल................... रहता मुक्त प्रवाह
मारग में पत्थर लढें...................... लगते स्वयं कराह
- अरुण
दोहे....१३ अप्रैल २०१६
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देखत जग का आइना.............. दिखा स्वयं का रूप
दृष्टी पैनी होत जब.................. दिखता जगत अरूप

ऊँची नीची घाटियाँ ....................... चित्र-धरातल एक
वर्तमान पर खिंच रही......................कालभरम की रेख
- अरुण
दोहे....१४ अप्रैल २०१६
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जो भी दिखता सामने............... सर में जा मंडरात
दुनिया सर में है धरी ............. सर ही सर खुजलात

जाने उसको जानना..................... बाकी सबकुछ व्यर्थ
तभी समझ आए हमें.................. क्या जीवन का अर्थ?
- अरुण









Wednesday, 30 March 2016

31 March 2016

From 14th March 2016
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Dohe March

दोहे....१३ मार्च २०१६
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स्मृति की पट्टी थामकर............ मनवा नापत काल
ध्यान सधे पट्टी गिरे..............'समय रहित' तत्काल

चित में है सूजन चढी............. मन की चढ़ती पीर
चित जबतक सूजा हुआ .......... अखियाँ ना बेनीर
- अरुण
दोहे....१४ मार्च २०१६
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चिंता चिंतन अहं से .............. जो शरीर आधीन
निराकार चित ध्यान दे......... कुल में जो है लीन

सब निद्रा में लीन हैं ........... बीच बीच कुइ जाग
हर क्षण बिरले ही जगे.............. सगरे अंध-प्रयास
- अरुण
दोहे....१५ मार्च २०१६
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कुछ, मानें फिर जान लें...... कुछ, मानत ही मान
कुछ जानें फिर मानते............. जाने वही सुजान

बिखरों को पागल कहें..............सुधरा, नेक सयान
वैसे सब पागल हुए ...... ...‘बिखर’ ‘सुधर’ पहचान
- अरुण
दोहे....१६ मार्च २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ..................ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले................ प्रज्ञानी परिमल

जिनसे पागलपन हटा...............दुनिया उनसे दूर
उनको केवल पूजती.................... बैठे दूर सदूर
- अरुण
दोहे....१७ मार्च २०१६
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मन ने तोड़ा जगत को............टुकड़ों में भर जान
जिसमें मन लुप्ता गया..........सधा सकल निर्वाण

झूठामूठा दर्द था................... पहुँचे बैद हकीम
सब ही नुक्सा दे रहे........ सच को कुई न चीन  
- अरुण
न चीन=पहचान न पाया
दोहे....१८ मार्च २०१६
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जीवित क्षण जागा हुआ......  देखत भूत भविष्य
हम निद्रावश चूकते................ वर्तमान का दृश्य

देखत सोचत भोगकर............ होवे ‘अनुभव ज्ञान’
जो जागे इस ज्ञान पर ..........उसे ज्ञान का ज्ञान
- अरुण
दोहे....१९ मार्च २०१६
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जो भी उभरे कल्पना ....... उसको सत्य न जान
जहाँ जन्म ले कल्पना.......... वही सत्य का धाम

तन में आत्मा है बसा.......... आत्मा बसा शरीर
आत्मा में आत्मा बसा.......... आत्मा बना शरीर
- अरुण
दोहे....२४ मार्च २०१६
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ख़ुद ही है बाहर खड़ा..............ख़ुद ले उसे निहार
कोई नही भीतर यहाँ...............कुछ भी नही बहार

सागर की गर बूँद ने .......... धर ली भिन पहचान
सागर तो जीवित रहे................. होत बूँद निष्प्राण
इसीलिए जब बूँद को ............. होता सत का ज्ञान
सागर-जीवन भोगती................. बनकर सागर-प्राण
- अरुण
दोहे....२५ मार्च २०१६
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जो होती है कल्पना............... उसको सत्य न जान
जिस कारणवश कल्पना........... सत का वही विधान

मन मेरा हिस्सा महज़ ............ समाज-मन का एक
सदियों की यादें बंधी................... कुछ ही पाए फेंक
- अरुण

दोहे....२८ मार्च २०१६
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मै जागा मनमें मगर............... मन तो रहा अजाग
जो कर दे ख़ुद को ज्वलित............ मै ढूंढू वह आग

गुड के बने गणेशजी.................... गुड का बना प्रसाद
गुड ही गुड को खा रहा................ द्वैत महज़ आभास
- अरुण










Sunday, 13 March 2016

14 March 2016

दोहे....१ मार्च २०१६
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"नौका डूबी मर गये........... पैंतिस चालिस लोग"
नही कोय अपना हुआ.............ख़ुशी मनाते लोग

धरा सत्य है सामने................ पर ढूंढत थक जाय
इस बेढंगी हाट में.............. ख़ुद गाहक बिक जाय
अरुण
दोहे....२ मार्च २०१६
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यह नाटकमय जिंदगी ........... हम नाटक के पात्र
हर पल बदले भूमिका............. बदलत रिश्ते गोत्र

जब जल से बोझिल हुए............. बरसे काले मेघ
उनके मुख प्रज्ञा बहे.................जो प्रकाश आवेग
अरुण
दोहे....३ मार्च २०१६
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हम अंधियारी कोठडी............. उजियारे की आस
क्यों ढूँढे वह रोशनी............. जो ख़ुद होत प्रकाश

निद्रा के दो स्थान हैं.............  बीता और भविष्य
जो जागा देखत रहे................ वर्तमान परिदृश्य
अरुण
दोहे....४ मार्च २०१६
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ख़ुद की थाली ख़ुद चखो...... जानो जीवन अर्थ
बाबाओं से पूछते............... समय गवांते व्यर्थ

मै तो हूं इक यंत्र बस ..... यांत्रिक कहिं कुइ और
हो जिसकी यह भावना ..........वह कुदरत के ठौर
अरुण
दोहे....५ मार्च २०१६
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पेड़ को पत्ता कहो या ......... पात को कह वृक्ष
शब्द बँटते दृश्य बँटता .........ध्यान तो संयुक्त

आँधी सतत विचार की......... मन को दे भरमाय
भ्रमा हुआ मन ढूँढता.......... फिरसे मन की छाय
अरुण
दोहे....६ मार्च २०१६
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एक ही स्वप्न गुबार के......... .दुइ टुकड़े हुइ जात
गर दर्शक फिर दृश्य भी... गर 'यह', 'वह' फिर आत

इस सपने की क़ैद से............... कैसे होऊं मुक्त
जितनी भी कोशिश करूँ ....... सपना होता सक्त
- अरुण
दोहे....७ मार्च २०१६
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मन-माटी तो कल्पना...............जो पाती आकार
खिंचे हवा पर आकृति.......... बनती चित्त-विकार

'दिख पड़ना' और 'देखना'........ दोनों में भिन तत्व
इक केवल है प्रक्रिया.............. दुजा होत कर्तृत्व
अरुण
दोहे....८ मार्च २०१६
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सुख का चिंतन सुखद है......... दुखद दु:ख का ख्याल
चिंता चिंतन चित्त में............... सुख-दुख का जंजाल

सुखदुख के क्यों ढूंढते..............कारन बाहर दूर
देखत रेखा हांथ की ........... बकता जोतिश शूर
अरुण
दोहे....९ मार्च २०१६
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आस्तिकता दर्शन नही........... और न पूजापाठ
आस्तिकता अस्तित्वसे... ..... जुड़े रहन की बात

नही समाधी वो स्थिती ...... जिसकों कहें विशेष
हो जैसे वैसे रहो ............. सजधज को दो फेंक
अरुण
दोहे....१० मार्च २०१६
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ईर्षा प्रीती द्वेष में................ रिश्ते घुलते सार                सार= सारे
रिश्ते रिश्ते ना रहें.............. मनता के अनुसार                मनता=मान्यता

शिष्टाचारी जगत में ..............नाटक चलते रोज़
पूरे खुलकर बोलना .............. पूरे खुलकर सोच
अरुण
दोहे....११ मार्च २०१६
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गागर में सागर भरा................. शब्दों में परमार्थ  
गागर शब्दों में धरा............... जीवन सागर अर्थ

जिसको समझे 'कर रहा'........ वही तो 'करा हुआ'
जनम मरण ना दो घटन........... एक ही 'घटा हुआ'
अरुण


दोहे....१२ मार्च २०१६
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भय की होती त्रासदी............... अहंकार के गांव  
संकट में सब भागते............. सर पर रखकर पाँव

शासक को शासन नशा...........सत्ता उसकी जान
खोने की चिंता सबल.............. वह भय से परशान
अरुण
दोहे....१३ मार्च २०१६
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स्मृति की पट्टी थामकर............ मनवा नापत काल
ध्यान सधे पट्टी गिरे..............'समय रहित' तत्काल

चित में है सूजन चढी............. मन की चढ़ती पीर
चित जबतक सूजा हुआ .......... अखियाँ ना बेनीर
अरुण






Monday, 29 February 2016

१ मार्च २०१६

दोहे....१ फ़रवरी २०१६
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प्रेम क्रोध मद मोह का............................. 'मै' ही ठेकेदार
जो 'मै' के बिन हो गया .................... पहुँच गया ' उस पार'

परम अर्थ प्रवचन नही......................... नही चर्चा, न विचार
परम दृष्टि के सामने................................ परमारथ संसार
अरुण

दोहे....२ फ़रवरी २०१६
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अकड़ दिखाए दूसरा............................ तुझमें उठ्ठे क्रोध
तू भी रोगी गर्व का............................ कर ले मन में बोध

पानी के ये बुलबुले.......................... इक जाता इक आता
हमने जोडा बीच दो............................ पुनरजनम का नाता
अरुण
दोहे....३ फ़रवरी २०१६
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'मै' आया तब 'वह' छुपा.................... 'वह' तो हरपल हाय    
जिसका होना स्वप्नसा....................... 'मै' 'मेरा' कछु नाय

शब्दों में छुपकर रहे ....................... अर्थ न कहीं दिखात
अर्थहि है बस काम का...................शब्द तो मुख की बात
अरुण
दोहे....४ फ़रवरी २०१६
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दुजा न देगा 'स्पर्श' तुझ .......................... ना करता उद्धार    
ग्रंथ गुरू बस छोर तक ............................ ख़ुद ही होना पार

सत खोजन के मार्ग में...................... वह तेरा गुरू होय
जो देता बस प्रेरणा ....................... खोज तुम्ही से होय
अरुण
दोहे....५ फ़रवरी २०१६
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सर रीता, मनवा भरा....................... मिट गया रीतापन      
मन को फिर कैसे जने......................... क्या है रीतापन ?

शब्दों ने विवरण बुना ................... विवरण बुनता ख़्याल
बिन 'दृष्टी' समझत नही ................... शब्दों का जंजाल
अरुण
दोहे....६ फ़रवरी २०१६
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आखर पोथी स्कूल की......................  शिक्षा केवल बंध
शिक्षा ले शिक्षित हुए........................ फिर भी रहते अंध

शिक्षा का धन पा गया........................करता है अभिमान
'अनपढ' को जाहिल कहे................... खुद को तो सम्मान
अरुण
दोहे....७ फ़रवरी २०१६
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बिन समझे जो हाँ कहे .................... वह अंधा आस्तिक
बिन समझे जो ना कहे ................... वह नक़ली नास्तिक

मन के भीतर हो रहा........................ आत्मा का आभास
मन के बाहर मिल सके ..................... आत्मा से सहवास
अरुण
दोहे....८ फ़रवरी २०१६
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गंगा में जमना मिले ......................या जमना में गंग
मीलन हो नर नार का................... संगम सहज अनंद

जान स्थान सम्मान का..................... जीवन में संघर्ष
इसके ऊपर जो उठा....................... उसको जीवन-स्पर्श
अरुण
दोहे....९ फ़रवरी २०१६
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तट पर कुंड बनाय कर................. बदन भिगोया जात
जीवन के मँझधार में.................. जीवन समझल जात

स्मृतिका हर कण टूटते.................. तरल बहे स्मृतिधार
निराकार हुई जात है...................... सखत अहं आकार
अरुण
दोहे....१० फ़रवरी २०१६
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चितर परीचित चित्त को................ इतना रखता बांध
के रेखा बिंदु रंग को................... अखियां होती आंध

डिब्बी भरते ज्ञान से.................... करते ढक्कन बंद
रखते मस्तक-कोष में ...................जो भीतर में अंध
अरुण
दोहे....११ फ़रवरी २०१६
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गत पल को बिसराय कर........ कर लो चित को नेक
हर पल जीवन है नया.................. जो जागे ले देख

क्योंकर आये हम यहाँ............ किससे हित या हानि?
ऐसे प्रश्नों में फँसा  .................. केवल मानुष प्राणि
अरुण

दोहे....१२ फ़रवरी २०१६
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बंदा जन्मे सकल ही.................फिर होवेव विभक्त
यही विभक्ता चाहता................ फिरसे होना भक्त  

नज़र मिलाना बाघ से............... शायद संभव हाय
ख़ुद के भीतर झाँकना   ............ बहुत भयावह होय
अरुण

दोहे....१३ फ़रवरी २०१६
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'आती-बीती' कल्पना............. होती स्मृतिका लेख
बनगये ख़ुद ही लेखमय............. सच ना पाए देख

घटना जा 'छाया' बचे.................. लेकर उससे रंग
फिर रेखें सपने नये ................... 'छाया' में रह दंग
अरुण
दोहे....१४ फ़रवरी २०१६
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'तर्क-चाप का बाण तो..............जावे तभी सटीक
आँखें जब हों जागती............. और लक्ष्य पर टीक

जीवन पथ पर दौड़ते................. पीछे को मत देख
पीछा 'भूत'  न छोड़ता...............फिर फिर करे फ़रेब
अरुण
दोहे....१५ फ़रवरी २०१६
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उलझन पर हल क्या करे ?..... हर हल उलझन होत
जब चित हो सुलझा हुआ........ कहीं न उलझन बोत

जो ख़ुद ही दुर्बल हुआ............ डरा स्वयम प्रतिपल
वही दुजे को बल दिआ.......... जो ख़ुद स्पष्ट,सबल
- अरुण

दोहे....१६ फ़रवरी २०१६
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नहर बनी यह जिंदगी..................... मूलधार से टूट
अंत होत, खोये नहर.......................मूलधार से जूट

सज्जनता फलती सहज................ पूर्ण ध्यान के साथ
सज्जनता कौशल नही.................. हो जिसका अभ्यास
अरुण
दोहे....१७ फ़रवरी २०१६
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गर्वभाव-ओ-अस्मिता ................... 'मै'-भ्रम के आधीन
इस भ्रम की पूजा करे ................... राजनीति का जीन

कारण को कारण हुआ............... कारण बिन कछु नाहि
कारण बिन सृष्टी हुई................... जिसका 'रचता' नाहि
अरुण
दोहे....१८ फ़रवरी २०१६
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सबकुछ जगमें सचल है ............. अचल होत नही कोय
गति देखन के वास्ते ....................'स्थिरता' मन में बोय

तनमन एक सुराग़ है ...................... आत्मा है आकाश
इस सुराग़ से झांक लो ................ आत्मा यह अविनाश
अरुण


दोहे....१९ फ़रवरी २०१६
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दीप लिये जब ढूँढते .................... ना दिखता अंधियार
जो जागा, ना जन्मता......................उसमें चित्त-विकार

इक अंधा इक नयनसुख .............. भिन भिन उनकी चाल
इक चलता लाठी लिये ................. इक 'सतदृष्टी' साथ
अरुण
दोहे....२० फ़रवरी २०१६
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अनुभव से दोहा बहे.........................और दोहे से बोध
क्यों रटनी हैं पंक्तियां.................... करो बोध का शोध

जिसने पायी दृष्टि हो ...................... उसको दोहे व्यर्थ
क्या सूझेगा अंध को....................... इन दोहों का अर्थ
अरुण
दोहे....२१ फ़रवरी २०१६
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अँखियाँ देखें चित्र को..................... एक नज़र में पूर्ण
पर विचार संकीर्ण हैं......................... देखें आधअधूर

जादूगर जादू करे ............................ चतुराई के साथ
यही चतुरता साधते................... .......चमत्कार-महराज
अरुण
दोहे....२२ फ़रवरी २०१६
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कंकड़, सूजन आँख में, ............. किसका करूँ इलाज
कारण-लछ्छन एक ही.................. देखो जाकर पास

सपने में बदलाव बस..................... क़ायम रहती नींद
दिन में लगती जागती...................... और रात में नींद
अरुण
दोहे....२३ फ़रवरी २०१६
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एकदृष्टि दिखता जिसे.............. 'शुरू' सहित ही 'अंत'
वही समाधी में रमे.......................समयरहित गुणवंत

जो 'मै' चाहे 'मुझ' लिए.................... वही सबन को देव
इस 'मै' में सब आ बसें................... 'मुझमें' सब भर देव
अरुण
दोहे....२४ फ़रवरी २०१६
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वस्तु अवस्तु मिल बनी...................अनुभूति की वस्तु
दोनों में क्या भेद, जन............. समझ सको, क्या अस्तु*    अस्तु=अस्तित्व

'मै' विचार से कह रहा..................... कर विचार को दूर
कैसे यह 'मै' कर सके....................... जो विचार से पूर
अरुण
दोहे....२५ फ़रवरी २०१६
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भय लालच, ये जाल दो................ फसते बुद्धू सारे
भोंदुगिरी नचवा रही ...................... नाचें बुद्धू-चेले

जब विकास और सभ्यता............... क़ुदरतसे बेमेल
कुदरत खोती संतुलन.................. मानव-संकट बेल
अरुण
दोहे....२६ फ़रवरी २०१६
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परिचय का चष्मा पहन................... देखत तू संसार
अब नवीनतम कछु नही............ सब परिचय अनुसार

उंगली में पीडा चढ़े ..................उंगली पे बस ध्यान
मनचित की पीड़ा लिए............... सब खोते अवधान
अरुण
दोहे....२७ फ़रवरी २०१६
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टेप चले, गाना बजे................ गायक के बिन गीत
मन चलते मन बोलता............ बोलत नही कुइ मीत

गागर की दीवार पर .............. जमती स्मृति की धूल
गागर स्मृति ही बन गई.................अपना अंतस भूल
अरुण
दोहे....२८ फ़रवरी २०१६
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ज्ञान नही निष्कर्ष कछु............. ज्ञान नही अनुमान
चयन रहित अवधान ही ........... देत ज्ञान का ज्ञान

सदा स्मृति की राहपर.............. चिंतन चलता जाय
देत काल का भास वह ............... मन देता भरमाय
अरुण
दोहे....२९ फ़रवरी २०१६
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अर्थ लगाता सृष्टि का........... अर्थ न समझत पाय
छूटत इच्छा अर्थ की............. ख़ुद सृष्टि बन जाय

भरभर भारा भोरभा .................. भोभो भाचा भाल
बेमतलब के शब्द ही................. बनें अर्थ जंजाल
अरुण

Saturday, 30 January 2016

दोहे... ३१ जनवरी २०१६

दोहे.... ३१ जनवरी २०१६
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गर मन में चाहत बसी........... मन आहत संभवात
डर खोने का हो उसे ................ जो पाने तरसात

जब जन्मा चित साफ़ था......... चढ़ा बाद में ख़्याल
'मरकर' देखा चित्त को.......... चित था बिन जंजाल
अरुणदोह

Friday, 29 January 2016

दोहे .... ३० जनवरी २०१६

दोहे....१ जनवरी २०१६
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प्रेम न कोई चाह है............................... प्रेम न दुखवा देत
प्रेम न होवे खास से.............................. प्रेमवा सभी समेत

जो जुबान मीठी करे...............................वह मीठा कहलाय
मीठा मीठा कहन से................................ ना मीठा बन जाय
अरुण
दोहे....२ जनवरी २०१६
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धन आपन बढ़ता गया ........................... गर्व जात है फूल
जिस पेटी में धन धरा .......................... वो न करे यह भूल

मै क़ुदरत को देखता ............................. क़ुदरत से ले ज्ञान
अपनी क़ुदरत देखते ............................. 'मै' क़ुदरत को दान
अरुण

दोहे....३ जनवरी २०१६
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अलग अलग, दुई, नींद में....................अलग अलग सपनाव
"वही सत्य जो मुझ दिखा"  ...................इस कारण टकराव

हांथ उठे असहाय का.........................भीतर वह बिन साथ
प्रेम करे जो सबन से ............................उसका उठे न हांथ
अरुण
दोहे....४ जनवरी २०१६
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जो अखियां ना बोलती......................... उनसे दुनिया देख
फिर न दिखे कोई बुरा.......................... और न दिखता नेक

बाप मरा रोने लगा ............................ तब पहुँचे समशान
देख अनेकों मुझन से ..............................पाते अंसु विराम
अरुण

दोहे....५ जनवरी २०१६
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मन की गाडी चढ़ पडूं.......................... गाडी लेत सम्हाल
जब बाहर को झांकता....................... समझूँ मन की चाल

दौड़ पेड़ दिखला रहे ......................... अंखियों को गति-रेल
मीटर में गति देखना................................ एक दिमाग़ी खेल
अरुण
दोहे....६ जनवरी २०१६
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सपने में ही चाहते ............................. करते यही प्रयास
कि नींद कभी ना आ सके................... न आवे सपना पास

तबला संगत कर रहा.............................. देता गायन जान
गर तबला हाबी हुआ............................. गायन हो निष्प्राण
अरुण
दोहे....७ जनवरी २०१६
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भय ने रखा बंध में.......................... हर सुविधा के साथ
मंदिर मदिरा ग्रंथ हैं............................ छुपने की हर बात

बात बैद की वह भली.........................जिससे तबियत ठीक
मोह बंध में सुन न सब ........................जो भी बके वह मीत
अरुण


दोहे....८ जनवरी २०१६
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बाट चले जो दिख पड़े ........................ सब लेना है देख
पेड़ नदी नाला कुआँ.........................सबको सम मन देख

घर में मोती गिर गया.................... ...... कोना कोना छान
सबहुं चीज़ हटाय जोह........................ कचरा या धनधान
अरुण

दोहे....९ जनवरी २०१६
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गर पानी भय लागता ................... और दु:खकर शूल
फिर मछली कैसे जिए.................. धरते यह मन-भूल

दुनियाभर की चीज़ को ...................... मन लेता है जान
मन को जानत जग गया .................... भीतर का भगवान
अरुण
दोहे....१० जनवरी २०१६
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ध्वनि सुधराने, रेडियो बजा रहे......... ..........जो लोग (यानि मैकेनिक)
जो भी चर्चा बज रही .................. करें न उसका भोग

कुएँ में बच्चा गिरा .......................पहले उसे निकाल
"सब कुओं को पाट दो" ................ कर आंदोलन बाद
अरुण






दोहे....११ जनवरी २०१६
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हवा हिलाये पात को................... पात हवा आधीन
पात भूलता सत्य यह.................. होता भय में लीन

दुख न कभी भी पास हो .............. इच्छा यह, दुख-मूल
हर आशा के फूल को...................लिपटे दुख के शूल
अरुण

दोहे....१२ जनवरी २०१६
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नापतोल सब मन बसे ..........इनसे सत्य न जाँच
निर्मन ध्यानी देखता ................क्या होवे है साच

जिस घर में हम क़ैद हों................ गर उससे हो प्रीत
कौन करे आज़ाद फिर................... बचे न कोई रीत
अरुण

दोहे....१३ जनवरी २०१६
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जो झुठलाए ईश* को..................वह अज्ञानी होत
बिन देखे स्वीकारता...............वह भी नास्तिक होत

श्रद्धा और विश्वास ही................ढकते जीवन पूर
फिर न दिखे जीवन हमें............खोज भी रहती दूर
अरुण





दोहे....१४ जनवरी २०१६
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सभी इशारे एक पर................जिनके रूप अनेक
उलझे बंदे रूप में.................. मार्ग अलग हर एक     (हर एक रूप)

हम लढते हैं देह से.................. और चित्त के बीच
बाहर दिखती शांतता ............... भीतर रस्साखींच
अरुण
दोहे....१५ जनवरी २०१६
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भले बुरे के ख्याल से .............अनुभव को मत तोल
हर अनुभव सिखला रहा ..........सीखे सिख उस बोल     सिख = शिष्य

रिश्ते ये इंसान के................... सब प्रतिमा के ठोर
यह मेरा जो मीत है ....................... बैरी दूजे छोर
अरुण

दोहे....१६ जनवरी २०१६
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निजता भिनता गुण लिए ......... दो 'मै' भीतर दंग
हिरदय निजता का धनी .......... भिनता मन का रंग

अखियाँ मूंदे सुन रहे................. जो कहता गुरुदेव
सुन न सको आशय सही.......... जितना भी सुन लेव
अरुण
दोहे....१७ जनवरी २०१६
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चढ़ चक्केपर होत है.............. मज़ा मौज आनंद
चक्के भीतर गर फँसा........... दुखकर होत प्रसंग

जीवन की सब उलझने ............मन का फिर आधार
मन में ही उलझा अगर.....................कैसे होवे पार
अरुण
दोहे....१८ जनवरी २०१६
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हर पल जागत जो जिए......... वह भगवान स्वरूप
उसके हांथो जो घटे.............. सब निष्काम स्वरूप

पडदे पर छाया नचे............... नचे जगत, चित माही
जात 'रौशनी' दिख पड़े ........... सब माया, कछु नाही
अरुण
'रौशनी' =  भ्रम-प्रकाश

दोहे....१९ जनवरी २०१६
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उसे न मुक्ती है कभी................... जो सपने में क़ैद
सपने में घायल हुए .....................दवा न माँगो बैद

जड़ ज़मीन मेरी नही.................... ना शरीर भी मोर
देह देन माँ बाप की..................... क्या दुनिया में मोर?
अरुण
दोहे....२० जनवरी २०१६
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मै सत देखत डर गया.................... सत को दूर धरा
बस सत पूजत बैठता.................. आस्तिक लगूँ खरा

ज्ञान ज्ञान तो कछु नही ............... ज्ञान न पाया कोय
बोध होत अज्ञान का................... बोध ज्ञानसम होय
अरुण

दोहे....२१ जनवरी २०१६
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चेतन से बहता सजग.................. मुख पर राम जगाय
मूरख समझा.................... राम-जप प्रभु से भेट कराय

बूँद बूंद सी जिंदगी...................... रूखी सूखी होय
सागर से गर मिल गई................... बूंद समंदर होय
अरुण

दोहे....२२ जनवरी २०१६
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बिन बोये फल ना मिले................... बोना तो हर हाल
बो कर भी फल पा सको ?............. बना रहाय सवाल

श्रद्धा ओ विश्वास तो ................. सत का साधन मात्र
जो साधन में लिप्त है ..................... रहता ख़ाली पात्र
अरुण
दोहे.... २३ जनवरी २०१६
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कोरी कापी होत है मानुस......................जब जन्मात
दुनिया उसप लिख रही ................ उसको ही दुहरात

है उलझा वह आस में ..................साँस न उसे सुझाय
तन को है वह भूलता......................जो मन में भरमाय
अरुण
दोहे.... २४ जनवरी २०१६
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मै बन 'कर्ता' कर रहा...................मै के बिन नही काम
'उसके' हांथों है सभी.................... उसका कर गुणगान

जीवन का मतलब महज़ जी लेना, ..............कछु नाय
वैसे तो दुनिया बहुल मतलब..................... देत सटाय
अरुण
दोहे.... २५ जनवरी २०१६
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हर क्षण तो होता अलग ............... भिन्न नियम आधीन
सजग होय जो जी रहा....................वह जीवन-परवीन

जो ख़ुद को लेवे समझ......................सबसे कर ले मेल
ख़ुद की ना होती समझ................... चूकत जीवन-खेल
अरुण
दोहे.... २६ जनवरी २०१६
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भीतर साधू कौन है?................... कोई नही पहचान
साधू उसको मानते.................. जिसका हो गुणगान

चिंता तो जंजाल है ................... फँसने का दुज नाम
चिंतन तो है रास्ता ........................ पहुँचे मुक्तीधाम
अरुण

दोहे.... २७ जनवरी २०१६
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जिस इलाज में दर्द है................. कुई न चाहे पास
रोग सभी स्वीकार्य हैं ............... लगते जो बिन त्रास

'मै' पृथ्वी हूँ जगत में....................... हूँ पृथ्वी में देश
सूबा हूँ 'मै' देश का...................... घटबढता परिवेश
अरुण


दोहे.... २८ जनवरी २०१६
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थोडीसी उर्जा बहुत.................. दो साँसों का खेल
पर भटके इतने यहाँ.................. साँसों में नहि मेल

हितमित का हि जमावडा ......... जिसका नाम समाज
कोइ किसी का कुछ नही ..........ना हो गर कुइ काज
अरुण
दोहे.... २९ जनवरी २०१६
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स्वारथ हो स्वारथ करो.............. परमारथ को छोड
परमारथ के नाम पर................. करो न स्वारथ होड़

यहाँ-वहाँ छोटा-बड़ा..................... अंदर-बाहर नाय
जब जागे निरपेक्षता..................सबकुछ एक सुझाय
अरुण
दोहे.... ३० जनवरी २०१६
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पहले ध्यानो सकल को........ फिर टुकड़ों को जान
फिर टुकड़ों के बोध से.......... कुल का कर सज्ञान

ख़ुद को देखे आइने............... पर न करे विश्वास
गौरय्या को हो रहा............... दुजी चिडी का भास
अरुण




































Friday, 1 January 2016

2 January 2016

दोहे....१३ दिसम्बर
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मानुष ना हम जन्मसे.................... मानुष एक विकास
जिस प्राणी के घर जनम ...............उस प्राणी का भास

दान धरम की आड़ में..................... गर छुपती कुई आस
दान नही, व्यापार यह ....................... खोजत ग्राहक पास
- अरुण
दोहे....१४ दिसम्बर
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कुइना किसी की चीज़ है................ कुइना किसी का दास
कण कण सबका आम है...................नही किसी का खास  

कुछ धरना कुछ छोड़ना........................ प्रीत घीन की रीत
जो सत खोजन चल पड़ा...................... ...हर ज़र्रे से प्रीत
अरुण



दोहे....१५ दिसम्बर
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जाको धन का गर्व हो........................ आतम धन ना पाय
नीचा देखत धनिक को..........................वह भी साधू नाय

गर तू पानी-स्पर्श को........................नामुमकिन कह जाय
क्यों पौडे की बातकर..................... ..सबका  वक्त गवाय?
अरुण
दोहे....१६ दिसम्बर
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संसारा डूबा हुआ.............................. सत से सौ गज दूर
सत ख़याल में जो डुबा..........................वह भी तो मजबूर

निज शरीर को छेदते.............................छिद्र हुआ ब्रह्मांड
बाहर के उपचार तो .........................सिरफ करम के कांड
अरुण

दोहे....१७ दिसम्बर
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गर सुनने को बैठते................,............. अपने से ना बोल
मन में बैठे कान-मुख............................. इक दूजे में घोल

अपने को ही घर मिले.................... ........झुग्गी रहे पड़ोस
सबको गर घर मिल गया.....................खोत हसी ओ जोश
अरुण
दोहे....१८ दिसम्बर
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बिन विकार के  चित्त से...................... बिन विकार आचार
कुछ चित में तो सावले........................ लगते बिना विकार

जब भी आशा पूर हो..................  क्षणिक शांति जग जात
इस शांती को राखने ............................. पूरी नींद गँवात
अरुण
दोहे....१९ दिसम्बर
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वह हांके जब डींग तो........................ अपने मन पर घात
वह ख़ुद को ऊंचा करे ....................अपना दिल बिठ जात

नक़्शा बदले देश का.........................लोग न सुधरत पाय
कैसे भी घट को रचो............................बदलत माटी नाय
अरुण
दोहे....२० दिसम्बर
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हो विवेक ज़ंजीर तो....................... मुर्छितता बंध जाय
चित में गर हो रौशनी................... .....मुर्छा ना ढल पाय

जाको पैसा धूलसम...................... जगे न उसका ख़्याल
कोई रख दे जेब में....................... ..या ले जाय निकाल
अरुण
दोहे....२१ दिसम्बर
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सब क़ुदरत के अंश है  ..................... क़ुदरतमय हैं बोर
सत चीनी का जानने......................... करत बताशा शोर

सतपुरुषों से लग रहे......................... कई हज़ारों लोग
कई योग में भोगते.............................कई साधते योग
अरुण



दोहे....२२ दिसम्बर
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लगा हुआ जो खोज में.....................भूल गया है 'खान'
'ना खाना' संकल्प जिस....................पा न सके सतज्ञान

सबकुछ 'मै' ने कर लिया .................'मै' का कितना ज़ोर
ना मिलता गर देह... मन...................'मै' रहता कित ओर?
अरुण
दोहे....२३ दिसम्बर
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'वो' न किसी को ख़ूब दे................... और न देत अभाव
'उसको' ना कोई दोस्ती....................... और न बैरी-भाव

इक अबोध मन आ गया..................... लगा कमाने ज्ञान
होत सार जब ज्ञान का................... पुनह अबोध सजान
अरुण
दोहे....२४ दिसम्बर
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कहाँ खोजते ईश को ........................ ईश बसा चहुं ओर
ख़ुद ही खोया ख्याल में  ......................हो ख़याल में बोर

खोज रहा भगवान को........................... देत उसे सम्मान
पहले यह तो जान ले.......................  कौन है यह भगवान
अरुण

दोहे....२५ दिसम्बर
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कुछ राजा हैं महल के .......................... कुछ का आश्रम राज
दोनों भूके राज के................................. दुजा न उनका काज

कण कण है ब्रह्मांड का ........................ आत्मा से भरपूर
कण कण टूटे............................आत्मा होत न चकनाचूर
अरुण
दोहे....२६ दिसम्बर
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स्मृति की आभा से बना...................... अपना जीवन-ख़्वाब
सत का पडदा दिख पड़े ........................ तब जाते हैं जाग

जो सपने में डूबता............................ सपने को सच मान
ख़ुद का सच जब साफ़ हो ........................होवे अंतरज्ञान
अरुण

दोहे....२७ दिसम्बर
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जब होती है रौशनी.............................. होत न है अंधियार
अंधी आँखें ढूंढती................................ पा न सकें उजियार

ना अच्छा ना कुछ बुरा ......................... जो सत खोजन जाय
जो सवाद देखन चला............................ खट कड़वा सब खाय
अरुण

दोहे....२८ दिसम्बर
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चितभूमी में बो दिया............................ जैसा मज़हब देश
वैसा फलता चित्त से..............................भाषा चिंतन वेश

धरम पोथ से हांथ उठ.............................. करे इशारा दूर
मोहभरी अंखियां मगर ........................... पढें हांथ को घूर
अरुण

दोहे....२९ दिसम्बर
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कठपुतली जब नाचती.......................... लगती जिंदा जीव
प्राण डोर पर नाचता ............................'यह पुतला' निर्जीव

रोटी बाटी खेल में..................................हम इतने मशगूल
प्रेम द्वेष में डूबते...................................गये 'खेल यह' भूल
अरुण
दोहे....३०  दिसम्बर
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भूक उठी है पेट में .............................यह तो ख़ुद का ज्ञान
पर दिखलाऊँ ग़ैर को ?......................यह तो मुश्किल काम

जहाँ कुई मतलब बसा .......................... धर्म न वहाँ बसात
जब प्रचार होने लगे ........................... धर्म न फिर बच पात
अरुण

दोहे....३१  दिसम्बर
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त्याग-भाव को त्याग दो .................... त्याग न रखिए ख्याल
पाली गायें त्यागकर.............................त्याग न मन में पाल

इक तिनके की चाह ही.......................... दुखपर्वत की जान
जहाँ चाह ही लोपती .......................... सुख दुख एक समान
अरुण


दोहे....१ जनवरी २०१६
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प्रेम न कोई चाह है............................... प्रेम न दुखवा देत
प्रेम न होवे खास से.............................. प्रेमवा सभी समेत

जो जुबान मीठी करे...............................वह मीठा कहलाय
मीठा मीठा कहन से................................ ना मीठा बन जाय
अरुण