दोहा....१ जून २०१६
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थाली तेरी सामने.................... खुद सवाद को जान
क्यों दूजे से पूछता........................तू सवाद-पहचान
तात्पर्य-
जो जीवन सामने धरा है उसे अपने अनुभवों से जानना होगा, दूसरों से जानना, जानना नही है। अपने से देखना और दूसरों द्वारा दिखलाया या सिखलाया जाना, दो भिन्न बातें हैं। जीवन को जानने की प्रक्रिया में उधार का ज्ञान किसी भी काम का नही।
- अरुण
दोहा....२ जून २०१६
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आस्तिकता अस्तित्व के.............. अनुभव का है नाम
ना संस्कारों से बने........................ ना कोई फ़रमान
तात्पर्य-
आस्तिकता... अस्तित्व के बोधस्पर्श से फलती है। यह कोई संस्कार या आदत नही जिसे दूसरों में डाला जा सके। न ही आस्तिकता... समाज, समूह या किसी संप्रदाय द्वारा जारी किये गये आदेश का अनुपालन है।
- अरुण
दोहा....३ जून २०१६
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‘मै’ तो हूँ एक यंत्र बस.................. यांत्रिक भी कहीं और
जिसकी है यह भावना........................ वह ईश्वर के ठौर
तात्पर्य-
स्वयं पर चेतना डाल, प्रकाश डाल, ध्यान डाल, जो अपने को अंदर बाहर, सब ओर से पूरी तरह से देख समझ लेता है.... उसकी समझ में यह आ जाता है कि वह कोई स्वतंत्र इकाई नही है, पूर्ण का यानि ब्रह्म का एक हिस्सा मात्र है। वह समझ रहा है कि वह किसी परम-यांत्रिकता का एक पुर्ज़ा है, जिसे (यांत्रिकता) कहीं कोई सतत संचालित कर रहा है। अपने को पुर्ण का हिस्सा मानते हुए, जानते हुए, अनुभव करते हुए जीनेवाला या ऐसी प्रतीति रखनेवाला... प्रति-क्षण.... ‘ईश्वर’ इस भावना के आधीन रहकर जीवन जी रहा है।
- अरुण
दोहा....४ जून २०१६
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वर्तमान के द्वार से ...................... देखो भूत भविष्य
‘बीती-आती’ के नयन...................... ना देखें सतदृष्य
तात्पर्य-
वर्तमान में वर्तमान रहते यानि वर्तमान में बसते हुए भूत और भविष्य की असलियत या भ्रामकता को देखा जा सकता है। पर इसके उलट, भूत या भविष्य में रमते हुए, वर्तमान का बोध संभव नही है। वर्तमान ही सत्य है, भूतभविष्य हैं कल्पना। सत्य में रहते हुए, कल्पना या असत्य से निपटा जा सकता है, परंतु कल्पना द्वारा सत्य को जानने के कोई भी प्रयास कल्पना मात्र ही होंगे, यानि सत्य से कोसों दूर होंगे।
- अरुण
दोहा....५ जून २०१६
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आँधी सतत विचार की ................... मन मोरा घबराय
डर से व्याकुल ढूँढता ................ फिर, विचार की छाय
तात्पर्य-
कभी कभी.....विचार एक अनियंत्रित तूफ़ान की तरह बहता रहता हैं। मन को डरा देता हैं। फिर, घबराया मन, विचार की मार से बचने के लिए किसी विचार का ही सहारा ढूँढने लगता है। विचार से बचने का उपाय विचार नही, केवल शुद्ध ध्यान या साक्षीभाव ही है।
- अरुण
दोहा....६ जून २०१६
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पानी के सब बुलबुले.............. गया, वो नहि आता
हमने जोड़ा व्यर्थ में...................पुनरजन का नाता
तात्पर्य-
पानी के बुलबुलों का दृष्टांत यह बतलाता है कि
आगमन और निगमन, आना और जाना, उभरना और गिर जाना...... एक सतत का क्रम है। देखनेवालों ने कल्पना के सहारे दोनों में एक संबंध जोड़ा और यह मान लिया कि जो बुलबुला गया वही आया है। जो जाता है, वही नही आता। गया वह पुराना था और जो आता है वह है नया। दोनों के बीच कोई भी नाता नही। अगर है तो इतना ही कि दोनों एक ही अविनाशी तत्व के हिस्से हैं।
- अरुण
दोहा....७ जून २०१६
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सबकुछ जग में सचल है.......... अचल होत नहि कोय
गति देखन के वास्ते................. स्थिरता मन में बोय
तात्पर्य-
सारी चीज़ें, सारे पदार्थ, सारे अस्तित्वकण चल रहे हैं। पृथ्वी, सूर्य, ग्रह, आदमी, प्राणी, जंगल ...... सब के सब गतिमान हैं। ‘स्थिरता’ एक काल्पनिक संदर्भ है जिससे गति को जाना जाता है और ये जो संदर्भ हैं, सापेक्षत:: परस्पर भिन्न भिन्न हैं।
- अरुण
दोहा....८ जून २०१६
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हर क्षण तो होता अलग............. अलग नियम आधीन
सजग होय जो जी रहा...................... होता वही प्रवीन
तात्पर्य-
प्रत्येक क्षण स्वतंत्र है, पूर्णरूपसे भिन्न है, अद्वितीय है, अतुलनीय है। जो हर क्षण में जीता है, इस तथ्य को देख पाता है, पूर्व नियोजित व्यवहारों से प्रेरित नही होता। पूर्व के अनुभवों से नये क्षण को नही जोड़ता। हर क्षण नवीन है और उसे जीनेवाला भी हर पल नवीन है।
- अरुण
दोहा....९ जून २०१६
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जो खोता है आस में........................ सांस न उसे सुझाय
तन को भी वह भूलता.................... जब मन में भरमाय
तात्पर्य-
तन मन और वातावरण, तीनों ही एक संयुक्त इकाई है, अलग अलग नही हैं। फिर भी हमारी चेतना, मन के साथ इतनी उलझी हुई होती है कि उसका शरीर की तरफ़ से ध्यान हट जाता है। दृष्टांत कहता है कि जो अपनी आस में (सोच, इच्छा, कल्पना, चिंता या विचार) में उलझ जाए, उसे अपनी साँस या श्वांसतक का भी पता नही रहता। मन में खोया आदमी तन की तरफ़ से गाफ़िल हो जाता है। चेतना....तन, मन और वातावरण पर एक साथ जागने के बजाय मन पर ही focused हुई जाती है।
- अरुण
दोहा....१० जून २०१६
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जीवन का मतलब महज़ …………… जी लेना ही होय
दुनिया के मतलब बहुत.............. जीवन जिनमें खोय
तात्पर्य-
जीवन का मतलब केवल जी लेना या जीना ही है। वैसे तो कुटुंब, समाज, समुदाय, संप्रदाय, धर्म, देश, विश्व इत्यादि के संदर्भों ने जीने के साथ कई मतलब या मिशन जोड़ दिये हैं। इसतरह, अपने अपने हिसाब से, सभी ने जीवन के साथ कुछ प्रयोजनों को भी स्थान दे दिया है।
पूरे अस्तित्व को या अस्तित्वगत सच्चाई को इन सब बातों से कोई सरोकार नही होता। मनुष्य अपने स्वीकारे प्रयोजनों से जुड़े या न जुड़े, जीवन की सच्चाई कभी विचलित नही होती। जन्म,जीवन और मरण... इन तीनो बातों की सच्चाई सनातन रही है और रहेगी।
- अरुण
दोहा....११ जून २०१६
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गुड के बने गणेशजी................... गुड का लगता भोग
गुड ही गुड को खात है..................... बँटवारा है रोग
तात्पर्य-
ऐसा भी देखा जाता है कि गुड के बने गणेशजी के सामने गुड का ही नैवेद्य चढ़ाया हुआ है। कहना यह है कि अस्तित्व भी कहीं से बँटा हुआ नही है। अलग अलग संज्ञाएँ या नाम देकर अस्तित्व को बँटा हुआ समझ लिया गया है। यह हमारी सार्वजनिक मौलिक भूल है। न आदमी बँटे हैं, न प्रकृति, न आकाश, न धरती। अलग अलग नाम देकर अस्तित्व को बाँटकर एक उपयोगी भ्रमजगत खड़ा कर देना हमारे मन की भले ही एक जरूरत बन गई हो, परंतु वास्तविकता में कहीं भी कोई भी विभाजन हुआ नही दिखता।
- अरुण
दोहा....१२ जून २०१६
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जड़ ज़मीन मेरी नही....................... ना शरीर भी मोर
यह भी तो मां-बाप का.................. दुनिया में का मोर?
तात्पर्य-
जड़ ज़मीन संपत्ति की बात तो छोड़िये, यह शरीर जिसे हम अपना मान रहे हैं वह भी अपना कहां? वह भी माँ-बाप की ही देन है। इतनी गहराई और व्यापकता अगर चित्त में जाग जाए तो फिर सारी ग़लतफ़हमियों जिन्हें संजोकर हम जी रहे हैं, अपने से ही लुप्त हो जाएँगी। हमारा सच्चाई के साथ जीना आसान बन जाएगा ।
- अरुण
दोहा....१३ जून २०१६
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शब्दोंकी गाड़ी लिये....................... अर्थ, सूझ भरपूर
सूझ अर्थ को लो पकड................ शब्दों को कर दूर
तात्पर्य-
शब्द एक गाड़ी के समान हैं जिनमें अर्थ, सूझ या आशय को रखकर दूसरे तक पहुँचा दिया जाता है। कितना ही अच्छा हो, अगर आप केवल अर्थ, सूझ या आशय को ही पकड़ें और शब्द को त्याग दें। समझ की प्रक्रिया में शब्दों का होना बहुत ही गड़बड़ या भ्रामकता फैला देता है, हाला की उनकी उपयोगिता को नकारा नही जा सकता। शब्द वाहक तो हैं पर समझ को फलने के मार्ग में एक रोडा भी। शब्द अगर ठीक तरह से न पकडे जाएं तो समझ को त्रुटिपूर्ण बना देते हैं। ज्ञान की जगह अज्ञान का कारण बन जाते हैं।
- अरुण
दोहा....१४ जून २०१६
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दुजा न देगा स्पर्श तुझ................ना करता उद्धार
ग्रंथ गुरू सब छोर तक ............... खुद ही होना पार
तात्पर्य-
आध्यात्मिक शोध पूर्णत: स्वयं की प्रचिति या अनुभव- स्पर्श है, कोई दूसरा, चाहे कितना भी सिद्ध क्यों न समझा जाता हो, किसी भी काम का नही। खुद को ही खोजना है। हाँ, दूसरा प्रेरणा दे सकता है, दृष्टि दे सकता है, संकेत कर सकता है। परंतु अनुभव-स्पर्श तो निजी ही हो सकता है। गुरू, ग्रंथ तो किनारे तक ले जाने में सहायक बन सकते है लेकिन सत्य की तरलता में डुबकी तो स्वयं को ही लगानी होगी। दुनिया किनारे तक ही साथ दे सकती है, डुबकी लगाकर पार जाने का साहस तो स्वयं में ही उपजे, तो ठीक।
- अरुण
दोहा....१५ जून २०१६
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राग, क्रोध, मद, मोह का...................’मै’ ही ठेकेदार
जो ‘मै’ के बिन हो सका........... पहुँच गया उसपार
तात्पर्य-
अहंकार के कारण ही सारे भावनात्मक दोष पनप रहे हैं। अहंभाव का लोप होने पर ही, इन विकारों की संभावना समाप्त होगी।
- अरुण
दोहा....१६-१७ जून २०१६
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हम अंधियारी कोठडी................ उजियारे की आस
क्यों ढूँढे वह रोशनी.................. जो खुद होत प्रकाश
तात्पर्य-
सांकेतिक अर्थ में, जबतक हमारे जैसे माया मोह में लिप्त लोगों में, अज्ञान का, भ्रांति का, त्रुटिपूर्ण समझ का, प्रतीति में होनेवाली भूल का... अंधकार व्याप्त है यानि हम ऐसे अंधकार से भरे पड़े हों तो हममें, सही समझ-दृष्टि, पूर्ण ध्यान या जागृति-प्रकाश का जागना आवश्यक है। जो लोग स्वयं से प्रकाशित होते होंगे उन्हे किसी प्रकाश की क्या जरूरत?
संबोधी या enlightenment …. ‘स्वयं से प्रकाशित होने’ को ही कहते हैं।
- अरुण
दोहा....१८ जून २०१६
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रिश्ते ये इंसान के ..................सब प्रतिमा के ज़ोर
यहाँ एक जो मित है......................... बैरी दूजे छोर
तात्पर्य-
अक्सर यह देखा जाता है कि एक ही आदमी, एकतरफ जब किसी का मित्र हो तो ठीक उसी वक्त दूसरी तरफ, किसी दूसरे से वह अपना शत्रुत्व निभा रहा होता है। आदमी एक ही पर उसकी दो प्रतिमाएँ, किसी एक को वह मित्र लगता है तो किसी दूसरे को वह फूटी आँख नही सुहाता। ज़ाहिर है, रिश्ते दो इंसानों के बीच नही, दो प्रतिमाओं या छबियों के बीच होते हैं। रिश्तों का फ़ैसला इंसानों के आपसी मनजुड़ाव या मनमुटाव करते हैं, उनकी तथाकथित अच्छाईयां या बुराइईयां नही।
- अरुण
दोहा....१९- २०जून २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ .......................... ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले......................... प्रज्ञानी परिमल
तात्पर्य-
दोहा....१९- २०जून २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ .......................... ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले......................... प्रज्ञानी परिमल
तात्पर्य-
जैसे जब देह का तापमान अपनी सामान्य सीमा से हटकर बढता या घटता है तो कहा जाता है कि आदमी बीमार हो गया। उसी तरह जब आदमी सामान्यत: मान्य आचरण से हटकर बर्ताव करने लगे तो कहते हैं आदमी पागल हो गया। जो मान्य मर्यादा के भीतर रहकर आचरण करे उसे ही सयाना या ज्ञानी समझा जाता है।
परंतु सच्चा सयाना या प्रज्ञानी तो वही है जो किसी भी तरह के पागलपन से, चाहे वह सीमा के भीतर हो या बाहर, मुक्त ही रहता है, क्योंकि वह उस प्रक्रिया के प्रति हमेशा सतर्क या जागा हुआ है जो उसे सीमा के बाहर या भीतर ले जाती है। ऐसी सतर्कता उसे पागलपन से पूरीतरह मुक्त कर देती है।
- अरुण
दोहा....२१- २२ जून २०१६
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मानुष ना हम जन्मसे ..................... मानुष एक विकास
जैसा पाला जायगा............................ वैसा होत विकास
तात्पर्य-
एक घटना ऐसी भी घटी कि मनुष्य के शिशु को भेड़िया उठा ले गया और उसने उस शिशु को पाला, अपना दूध पिलाकर अपनी बिरादरी में रखकर बड़ा किया। कुछ ही वर्षों बाद जब वह लड़का मिला, वह भेड़िये की तरह ही चल फिर रहा था, उसकी ही तरह आवाज़ें निकाल रहा था। दिखने में भले ही मनुष्य जैसा था पर आचरण भेड़िये जैसा ही था।
मनुष्य का पिल्ला चुंकि मनुष्य का लालन पोषण पाता है, मनुष्य की ही तरह बड़ा होता है, विकसित होता है। इस विकास का नाम मनुष्य है। अगर उसे भेड़िया पाले पोसे तो वह भेड़िया कहलाएगा, मनुष्य नही।
- अरुण
दोहा....२३-२४ जून २०१६
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हांथ पाँव से ना लढें.......................... ना ही उनमें प्यार
सब अंगों का एक मन......................... ना मनवा बेज़ार
तात्पर्य-
हम देखते हैं कि शरीर के सभी अंगों के बीच एकसूत्रता होती है, एकात्मकता होती है। सभी अंगों में पूरा तालमेल बना रहता है, जिसके कारण उनमें न कोई अंतर्विरोध है और न ही कोई आंतरिक पक्षपात। इसी बात को आधार बनाकर अगर हम सोचें तो हम पाएँगे कि अस्तित्व की हर बात एक ही आत्मीक सूत्र में गुँथी हुई है। फिर भी आदमी जो इस बात से बेख़बर है, कई अनावश्यक संघर्षों से, समस्याओं से जूझ रहा है। न तो उसमें भौगोलिक एवं प्राकृतिक एकांगता है और न ही वैश्विक सद्भाव।
- अरुण
एक शेर
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लगता है ‘मै हूँ’ का मतलब ये नही ‘मै हूँ’
बना जाता है ‘होने का’ एहसास.... ‘लगना’
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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असणे वेगळे.... वाटणे वेगळे
तरीही ‘वाटणे’च घेते ‘असण्या’चे रूप
- अरुण
दोहा....२५-२६ जून २०१६
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जैसे दुखता देह को .......................... कंकड़ काटा बेत
मन के तन को चूबता........................दुख का हर संकेत
तात्पर्य-
मन को दुख की नही, दुख के संकेत की चुबन होती है। मन ने जिस बात, घटना या स्थिति को दुखदायी माना है, उसका ज़रा भी संकेत मन को दुखी कर देता है। भले ही घटना न भी घटे, उसकी कल्पनाभर ही मन को अप्रिय लगने लगती है। दुखदायी घटना के बारे में सोचना या ज़िक्र करना भी एक बुरा लक्षन माना जाता है।
- अरुण
दोहा....२७ जून २०१६
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जलती ज्योती देखकर....................... करते ख़ूब बयान
जो प्रकाश उपभोगता........................ होता वही सयान
तात्पर्य-
परमात्मा की प्रतीति या ज्ञानस्पर्श परमात्मा के विवरण में नही होता। जिसतरह ज्योति का किया गया बयान ज्योति का प्रकाश नही होता, ठीक वैसे ही, परमात्मा जानने या देखने की वस्तु न होकर...स्वयं प्रकाशित होकर जागने का अनुभव है। जागना यानि सयान होना।
- अरुण
दोहा....२८-२९ जून २०१६
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हितमित काहि जमावड़ा ...................जिसका नाम समाज
कोई किसीका क्यों हुआ ................... हो ना गर कुई काज
तात्पर्य-
सारे संबंध किसी काम या मतलब के वास्ते हैं। किसी प्रयोजन से हैं। एक दूसरे की ज़रूरतें पूरी करने के लिए या तो सहज या जानबूझकर, विचारपूर्वक रचे गये हैं। इन रिश्तों के जाल या जमावड़े को ही समाज कहा गया है।
- अरुण
दोहा....३० जून २०१६
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जब जनमा चित साफ़ था................. चढ़ा बाद में ख़्याल
मरकर देखा चित्त को..........................चित था बिन जंजाल
तात्पर्य-
चित्त की वृत्तियाँ शुरू होने से पूर्व या यूँ कहें, मन विकसित होने से पहले चित्त अपनी सहज सरल नैसर्गिक अवस्था में था। विचारों के आक्रमण, जानकारी के बसेरे, उधार में मिले ज्ञान, दोस्ती या दुश्मनी जैसी भावनाओं के स्पर्श से दूर था। मन की इस विकास प्रक्रिया के होते, चित्त की शुद्धता से हम वंचित हुए।
जब फिर सकल बोध हुआ इस अशुद्धीकरण की प्रक्रिया का (यानि जब हम मन से मरे) चित्त की निर्मलता जाग उठी। ये सब बातें आत्मशोध-बोध को ही उजागर हो पाती हैं।
- अरुण
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थाली तेरी सामने.................... खुद सवाद को जान
क्यों दूजे से पूछता........................तू सवाद-पहचान
तात्पर्य-
जो जीवन सामने धरा है उसे अपने अनुभवों से जानना होगा, दूसरों से जानना, जानना नही है। अपने से देखना और दूसरों द्वारा दिखलाया या सिखलाया जाना, दो भिन्न बातें हैं। जीवन को जानने की प्रक्रिया में उधार का ज्ञान किसी भी काम का नही।
- अरुण
दोहा....२ जून २०१६
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आस्तिकता अस्तित्व के.............. अनुभव का है नाम
ना संस्कारों से बने........................ ना कोई फ़रमान
तात्पर्य-
आस्तिकता... अस्तित्व के बोधस्पर्श से फलती है। यह कोई संस्कार या आदत नही जिसे दूसरों में डाला जा सके। न ही आस्तिकता... समाज, समूह या किसी संप्रदाय द्वारा जारी किये गये आदेश का अनुपालन है।
- अरुण
दोहा....३ जून २०१६
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‘मै’ तो हूँ एक यंत्र बस.................. यांत्रिक भी कहीं और
जिसकी है यह भावना........................ वह ईश्वर के ठौर
तात्पर्य-
स्वयं पर चेतना डाल, प्रकाश डाल, ध्यान डाल, जो अपने को अंदर बाहर, सब ओर से पूरी तरह से देख समझ लेता है.... उसकी समझ में यह आ जाता है कि वह कोई स्वतंत्र इकाई नही है, पूर्ण का यानि ब्रह्म का एक हिस्सा मात्र है। वह समझ रहा है कि वह किसी परम-यांत्रिकता का एक पुर्ज़ा है, जिसे (यांत्रिकता) कहीं कोई सतत संचालित कर रहा है। अपने को पुर्ण का हिस्सा मानते हुए, जानते हुए, अनुभव करते हुए जीनेवाला या ऐसी प्रतीति रखनेवाला... प्रति-क्षण.... ‘ईश्वर’ इस भावना के आधीन रहकर जीवन जी रहा है।
- अरुण
दोहा....४ जून २०१६
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वर्तमान के द्वार से ...................... देखो भूत भविष्य
‘बीती-आती’ के नयन...................... ना देखें सतदृष्य
तात्पर्य-
वर्तमान में वर्तमान रहते यानि वर्तमान में बसते हुए भूत और भविष्य की असलियत या भ्रामकता को देखा जा सकता है। पर इसके उलट, भूत या भविष्य में रमते हुए, वर्तमान का बोध संभव नही है। वर्तमान ही सत्य है, भूतभविष्य हैं कल्पना। सत्य में रहते हुए, कल्पना या असत्य से निपटा जा सकता है, परंतु कल्पना द्वारा सत्य को जानने के कोई भी प्रयास कल्पना मात्र ही होंगे, यानि सत्य से कोसों दूर होंगे।
- अरुण
दोहा....५ जून २०१६
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आँधी सतत विचार की ................... मन मोरा घबराय
डर से व्याकुल ढूँढता ................ फिर, विचार की छाय
तात्पर्य-
कभी कभी.....विचार एक अनियंत्रित तूफ़ान की तरह बहता रहता हैं। मन को डरा देता हैं। फिर, घबराया मन, विचार की मार से बचने के लिए किसी विचार का ही सहारा ढूँढने लगता है। विचार से बचने का उपाय विचार नही, केवल शुद्ध ध्यान या साक्षीभाव ही है।
- अरुण
दोहा....६ जून २०१६
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पानी के सब बुलबुले.............. गया, वो नहि आता
हमने जोड़ा व्यर्थ में...................पुनरजन का नाता
तात्पर्य-
पानी के बुलबुलों का दृष्टांत यह बतलाता है कि
आगमन और निगमन, आना और जाना, उभरना और गिर जाना...... एक सतत का क्रम है। देखनेवालों ने कल्पना के सहारे दोनों में एक संबंध जोड़ा और यह मान लिया कि जो बुलबुला गया वही आया है। जो जाता है, वही नही आता। गया वह पुराना था और जो आता है वह है नया। दोनों के बीच कोई भी नाता नही। अगर है तो इतना ही कि दोनों एक ही अविनाशी तत्व के हिस्से हैं।
- अरुण
दोहा....७ जून २०१६
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सबकुछ जग में सचल है.......... अचल होत नहि कोय
गति देखन के वास्ते................. स्थिरता मन में बोय
तात्पर्य-
सारी चीज़ें, सारे पदार्थ, सारे अस्तित्वकण चल रहे हैं। पृथ्वी, सूर्य, ग्रह, आदमी, प्राणी, जंगल ...... सब के सब गतिमान हैं। ‘स्थिरता’ एक काल्पनिक संदर्भ है जिससे गति को जाना जाता है और ये जो संदर्भ हैं, सापेक्षत:: परस्पर भिन्न भिन्न हैं।
- अरुण
दोहा....८ जून २०१६
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हर क्षण तो होता अलग............. अलग नियम आधीन
सजग होय जो जी रहा...................... होता वही प्रवीन
तात्पर्य-
प्रत्येक क्षण स्वतंत्र है, पूर्णरूपसे भिन्न है, अद्वितीय है, अतुलनीय है। जो हर क्षण में जीता है, इस तथ्य को देख पाता है, पूर्व नियोजित व्यवहारों से प्रेरित नही होता। पूर्व के अनुभवों से नये क्षण को नही जोड़ता। हर क्षण नवीन है और उसे जीनेवाला भी हर पल नवीन है।
- अरुण
दोहा....९ जून २०१६
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जो खोता है आस में........................ सांस न उसे सुझाय
तन को भी वह भूलता.................... जब मन में भरमाय
तात्पर्य-
तन मन और वातावरण, तीनों ही एक संयुक्त इकाई है, अलग अलग नही हैं। फिर भी हमारी चेतना, मन के साथ इतनी उलझी हुई होती है कि उसका शरीर की तरफ़ से ध्यान हट जाता है। दृष्टांत कहता है कि जो अपनी आस में (सोच, इच्छा, कल्पना, चिंता या विचार) में उलझ जाए, उसे अपनी साँस या श्वांसतक का भी पता नही रहता। मन में खोया आदमी तन की तरफ़ से गाफ़िल हो जाता है। चेतना....तन, मन और वातावरण पर एक साथ जागने के बजाय मन पर ही focused हुई जाती है।
- अरुण
दोहा....१० जून २०१६
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जीवन का मतलब महज़ …………… जी लेना ही होय
दुनिया के मतलब बहुत.............. जीवन जिनमें खोय
तात्पर्य-
जीवन का मतलब केवल जी लेना या जीना ही है। वैसे तो कुटुंब, समाज, समुदाय, संप्रदाय, धर्म, देश, विश्व इत्यादि के संदर्भों ने जीने के साथ कई मतलब या मिशन जोड़ दिये हैं। इसतरह, अपने अपने हिसाब से, सभी ने जीवन के साथ कुछ प्रयोजनों को भी स्थान दे दिया है।
पूरे अस्तित्व को या अस्तित्वगत सच्चाई को इन सब बातों से कोई सरोकार नही होता। मनुष्य अपने स्वीकारे प्रयोजनों से जुड़े या न जुड़े, जीवन की सच्चाई कभी विचलित नही होती। जन्म,जीवन और मरण... इन तीनो बातों की सच्चाई सनातन रही है और रहेगी।
- अरुण
दोहा....११ जून २०१६
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गुड के बने गणेशजी................... गुड का लगता भोग
गुड ही गुड को खात है..................... बँटवारा है रोग
तात्पर्य-
ऐसा भी देखा जाता है कि गुड के बने गणेशजी के सामने गुड का ही नैवेद्य चढ़ाया हुआ है। कहना यह है कि अस्तित्व भी कहीं से बँटा हुआ नही है। अलग अलग संज्ञाएँ या नाम देकर अस्तित्व को बँटा हुआ समझ लिया गया है। यह हमारी सार्वजनिक मौलिक भूल है। न आदमी बँटे हैं, न प्रकृति, न आकाश, न धरती। अलग अलग नाम देकर अस्तित्व को बाँटकर एक उपयोगी भ्रमजगत खड़ा कर देना हमारे मन की भले ही एक जरूरत बन गई हो, परंतु वास्तविकता में कहीं भी कोई भी विभाजन हुआ नही दिखता।
- अरुण
दोहा....१२ जून २०१६
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जड़ ज़मीन मेरी नही....................... ना शरीर भी मोर
यह भी तो मां-बाप का.................. दुनिया में का मोर?
तात्पर्य-
जड़ ज़मीन संपत्ति की बात तो छोड़िये, यह शरीर जिसे हम अपना मान रहे हैं वह भी अपना कहां? वह भी माँ-बाप की ही देन है। इतनी गहराई और व्यापकता अगर चित्त में जाग जाए तो फिर सारी ग़लतफ़हमियों जिन्हें संजोकर हम जी रहे हैं, अपने से ही लुप्त हो जाएँगी। हमारा सच्चाई के साथ जीना आसान बन जाएगा ।
- अरुण
दोहा....१३ जून २०१६
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शब्दोंकी गाड़ी लिये....................... अर्थ, सूझ भरपूर
सूझ अर्थ को लो पकड................ शब्दों को कर दूर
तात्पर्य-
शब्द एक गाड़ी के समान हैं जिनमें अर्थ, सूझ या आशय को रखकर दूसरे तक पहुँचा दिया जाता है। कितना ही अच्छा हो, अगर आप केवल अर्थ, सूझ या आशय को ही पकड़ें और शब्द को त्याग दें। समझ की प्रक्रिया में शब्दों का होना बहुत ही गड़बड़ या भ्रामकता फैला देता है, हाला की उनकी उपयोगिता को नकारा नही जा सकता। शब्द वाहक तो हैं पर समझ को फलने के मार्ग में एक रोडा भी। शब्द अगर ठीक तरह से न पकडे जाएं तो समझ को त्रुटिपूर्ण बना देते हैं। ज्ञान की जगह अज्ञान का कारण बन जाते हैं।
- अरुण
दोहा....१४ जून २०१६
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दुजा न देगा स्पर्श तुझ................ना करता उद्धार
ग्रंथ गुरू सब छोर तक ............... खुद ही होना पार
तात्पर्य-
आध्यात्मिक शोध पूर्णत: स्वयं की प्रचिति या अनुभव- स्पर्श है, कोई दूसरा, चाहे कितना भी सिद्ध क्यों न समझा जाता हो, किसी भी काम का नही। खुद को ही खोजना है। हाँ, दूसरा प्रेरणा दे सकता है, दृष्टि दे सकता है, संकेत कर सकता है। परंतु अनुभव-स्पर्श तो निजी ही हो सकता है। गुरू, ग्रंथ तो किनारे तक ले जाने में सहायक बन सकते है लेकिन सत्य की तरलता में डुबकी तो स्वयं को ही लगानी होगी। दुनिया किनारे तक ही साथ दे सकती है, डुबकी लगाकर पार जाने का साहस तो स्वयं में ही उपजे, तो ठीक।
- अरुण
दोहा....१५ जून २०१६
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राग, क्रोध, मद, मोह का...................’मै’ ही ठेकेदार
जो ‘मै’ के बिन हो सका........... पहुँच गया उसपार
तात्पर्य-
अहंकार के कारण ही सारे भावनात्मक दोष पनप रहे हैं। अहंभाव का लोप होने पर ही, इन विकारों की संभावना समाप्त होगी।
- अरुण
दोहा....१६-१७ जून २०१६
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हम अंधियारी कोठडी................ उजियारे की आस
क्यों ढूँढे वह रोशनी.................. जो खुद होत प्रकाश
तात्पर्य-
सांकेतिक अर्थ में, जबतक हमारे जैसे माया मोह में लिप्त लोगों में, अज्ञान का, भ्रांति का, त्रुटिपूर्ण समझ का, प्रतीति में होनेवाली भूल का... अंधकार व्याप्त है यानि हम ऐसे अंधकार से भरे पड़े हों तो हममें, सही समझ-दृष्टि, पूर्ण ध्यान या जागृति-प्रकाश का जागना आवश्यक है। जो लोग स्वयं से प्रकाशित होते होंगे उन्हे किसी प्रकाश की क्या जरूरत?
संबोधी या enlightenment …. ‘स्वयं से प्रकाशित होने’ को ही कहते हैं।
- अरुण
दोहा....१८ जून २०१६
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रिश्ते ये इंसान के ..................सब प्रतिमा के ज़ोर
यहाँ एक जो मित है......................... बैरी दूजे छोर
तात्पर्य-
अक्सर यह देखा जाता है कि एक ही आदमी, एकतरफ जब किसी का मित्र हो तो ठीक उसी वक्त दूसरी तरफ, किसी दूसरे से वह अपना शत्रुत्व निभा रहा होता है। आदमी एक ही पर उसकी दो प्रतिमाएँ, किसी एक को वह मित्र लगता है तो किसी दूसरे को वह फूटी आँख नही सुहाता। ज़ाहिर है, रिश्ते दो इंसानों के बीच नही, दो प्रतिमाओं या छबियों के बीच होते हैं। रिश्तों का फ़ैसला इंसानों के आपसी मनजुड़ाव या मनमुटाव करते हैं, उनकी तथाकथित अच्छाईयां या बुराइईयां नही।
- अरुण
दोहा....१९- २०जून २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ .......................... ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले......................... प्रज्ञानी परिमल
तात्पर्य-
दोहा....१९- २०जून २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ .......................... ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले......................... प्रज्ञानी परिमल
तात्पर्य-
जैसे जब देह का तापमान अपनी सामान्य सीमा से हटकर बढता या घटता है तो कहा जाता है कि आदमी बीमार हो गया। उसी तरह जब आदमी सामान्यत: मान्य आचरण से हटकर बर्ताव करने लगे तो कहते हैं आदमी पागल हो गया। जो मान्य मर्यादा के भीतर रहकर आचरण करे उसे ही सयाना या ज्ञानी समझा जाता है।
परंतु सच्चा सयाना या प्रज्ञानी तो वही है जो किसी भी तरह के पागलपन से, चाहे वह सीमा के भीतर हो या बाहर, मुक्त ही रहता है, क्योंकि वह उस प्रक्रिया के प्रति हमेशा सतर्क या जागा हुआ है जो उसे सीमा के बाहर या भीतर ले जाती है। ऐसी सतर्कता उसे पागलपन से पूरीतरह मुक्त कर देती है।
- अरुण
दोहा....२१- २२ जून २०१६
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मानुष ना हम जन्मसे ..................... मानुष एक विकास
जैसा पाला जायगा............................ वैसा होत विकास
तात्पर्य-
एक घटना ऐसी भी घटी कि मनुष्य के शिशु को भेड़िया उठा ले गया और उसने उस शिशु को पाला, अपना दूध पिलाकर अपनी बिरादरी में रखकर बड़ा किया। कुछ ही वर्षों बाद जब वह लड़का मिला, वह भेड़िये की तरह ही चल फिर रहा था, उसकी ही तरह आवाज़ें निकाल रहा था। दिखने में भले ही मनुष्य जैसा था पर आचरण भेड़िये जैसा ही था।
मनुष्य का पिल्ला चुंकि मनुष्य का लालन पोषण पाता है, मनुष्य की ही तरह बड़ा होता है, विकसित होता है। इस विकास का नाम मनुष्य है। अगर उसे भेड़िया पाले पोसे तो वह भेड़िया कहलाएगा, मनुष्य नही।
- अरुण
दोहा....२३-२४ जून २०१६
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हांथ पाँव से ना लढें.......................... ना ही उनमें प्यार
सब अंगों का एक मन......................... ना मनवा बेज़ार
तात्पर्य-
हम देखते हैं कि शरीर के सभी अंगों के बीच एकसूत्रता होती है, एकात्मकता होती है। सभी अंगों में पूरा तालमेल बना रहता है, जिसके कारण उनमें न कोई अंतर्विरोध है और न ही कोई आंतरिक पक्षपात। इसी बात को आधार बनाकर अगर हम सोचें तो हम पाएँगे कि अस्तित्व की हर बात एक ही आत्मीक सूत्र में गुँथी हुई है। फिर भी आदमी जो इस बात से बेख़बर है, कई अनावश्यक संघर्षों से, समस्याओं से जूझ रहा है। न तो उसमें भौगोलिक एवं प्राकृतिक एकांगता है और न ही वैश्विक सद्भाव।
- अरुण
एक शेर
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लगता है ‘मै हूँ’ का मतलब ये नही ‘मै हूँ’
बना जाता है ‘होने का’ एहसास.... ‘लगना’
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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असणे वेगळे.... वाटणे वेगळे
तरीही ‘वाटणे’च घेते ‘असण्या’चे रूप
- अरुण
दोहा....२५-२६ जून २०१६
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जैसे दुखता देह को .......................... कंकड़ काटा बेत
मन के तन को चूबता........................दुख का हर संकेत
तात्पर्य-
मन को दुख की नही, दुख के संकेत की चुबन होती है। मन ने जिस बात, घटना या स्थिति को दुखदायी माना है, उसका ज़रा भी संकेत मन को दुखी कर देता है। भले ही घटना न भी घटे, उसकी कल्पनाभर ही मन को अप्रिय लगने लगती है। दुखदायी घटना के बारे में सोचना या ज़िक्र करना भी एक बुरा लक्षन माना जाता है।
- अरुण
दोहा....२७ जून २०१६
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जलती ज्योती देखकर....................... करते ख़ूब बयान
जो प्रकाश उपभोगता........................ होता वही सयान
तात्पर्य-
परमात्मा की प्रतीति या ज्ञानस्पर्श परमात्मा के विवरण में नही होता। जिसतरह ज्योति का किया गया बयान ज्योति का प्रकाश नही होता, ठीक वैसे ही, परमात्मा जानने या देखने की वस्तु न होकर...स्वयं प्रकाशित होकर जागने का अनुभव है। जागना यानि सयान होना।
- अरुण
दोहा....२८-२९ जून २०१६
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हितमित काहि जमावड़ा ...................जिसका नाम समाज
कोई किसीका क्यों हुआ ................... हो ना गर कुई काज
तात्पर्य-
सारे संबंध किसी काम या मतलब के वास्ते हैं। किसी प्रयोजन से हैं। एक दूसरे की ज़रूरतें पूरी करने के लिए या तो सहज या जानबूझकर, विचारपूर्वक रचे गये हैं। इन रिश्तों के जाल या जमावड़े को ही समाज कहा गया है।
- अरुण
दोहा....३० जून २०१६
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जब जनमा चित साफ़ था................. चढ़ा बाद में ख़्याल
मरकर देखा चित्त को..........................चित था बिन जंजाल
तात्पर्य-
चित्त की वृत्तियाँ शुरू होने से पूर्व या यूँ कहें, मन विकसित होने से पहले चित्त अपनी सहज सरल नैसर्गिक अवस्था में था। विचारों के आक्रमण, जानकारी के बसेरे, उधार में मिले ज्ञान, दोस्ती या दुश्मनी जैसी भावनाओं के स्पर्श से दूर था। मन की इस विकास प्रक्रिया के होते, चित्त की शुद्धता से हम वंचित हुए।
जब फिर सकल बोध हुआ इस अशुद्धीकरण की प्रक्रिया का (यानि जब हम मन से मरे) चित्त की निर्मलता जाग उठी। ये सब बातें आत्मशोध-बोध को ही उजागर हो पाती हैं।
- अरुण