Saturday, 30 January 2016

दोहे... ३१ जनवरी २०१६

दोहे.... ३१ जनवरी २०१६
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गर मन में चाहत बसी........... मन आहत संभवात
डर खोने का हो उसे ................ जो पाने तरसात

जब जन्मा चित साफ़ था......... चढ़ा बाद में ख़्याल
'मरकर' देखा चित्त को.......... चित था बिन जंजाल
अरुणदोह

Friday, 29 January 2016

दोहे .... ३० जनवरी २०१६

दोहे....१ जनवरी २०१६
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प्रेम न कोई चाह है............................... प्रेम न दुखवा देत
प्रेम न होवे खास से.............................. प्रेमवा सभी समेत

जो जुबान मीठी करे...............................वह मीठा कहलाय
मीठा मीठा कहन से................................ ना मीठा बन जाय
अरुण
दोहे....२ जनवरी २०१६
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धन आपन बढ़ता गया ........................... गर्व जात है फूल
जिस पेटी में धन धरा .......................... वो न करे यह भूल

मै क़ुदरत को देखता ............................. क़ुदरत से ले ज्ञान
अपनी क़ुदरत देखते ............................. 'मै' क़ुदरत को दान
अरुण

दोहे....३ जनवरी २०१६
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अलग अलग, दुई, नींद में....................अलग अलग सपनाव
"वही सत्य जो मुझ दिखा"  ...................इस कारण टकराव

हांथ उठे असहाय का.........................भीतर वह बिन साथ
प्रेम करे जो सबन से ............................उसका उठे न हांथ
अरुण
दोहे....४ जनवरी २०१६
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जो अखियां ना बोलती......................... उनसे दुनिया देख
फिर न दिखे कोई बुरा.......................... और न दिखता नेक

बाप मरा रोने लगा ............................ तब पहुँचे समशान
देख अनेकों मुझन से ..............................पाते अंसु विराम
अरुण

दोहे....५ जनवरी २०१६
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मन की गाडी चढ़ पडूं.......................... गाडी लेत सम्हाल
जब बाहर को झांकता....................... समझूँ मन की चाल

दौड़ पेड़ दिखला रहे ......................... अंखियों को गति-रेल
मीटर में गति देखना................................ एक दिमाग़ी खेल
अरुण
दोहे....६ जनवरी २०१६
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सपने में ही चाहते ............................. करते यही प्रयास
कि नींद कभी ना आ सके................... न आवे सपना पास

तबला संगत कर रहा.............................. देता गायन जान
गर तबला हाबी हुआ............................. गायन हो निष्प्राण
अरुण
दोहे....७ जनवरी २०१६
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भय ने रखा बंध में.......................... हर सुविधा के साथ
मंदिर मदिरा ग्रंथ हैं............................ छुपने की हर बात

बात बैद की वह भली.........................जिससे तबियत ठीक
मोह बंध में सुन न सब ........................जो भी बके वह मीत
अरुण


दोहे....८ जनवरी २०१६
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बाट चले जो दिख पड़े ........................ सब लेना है देख
पेड़ नदी नाला कुआँ.........................सबको सम मन देख

घर में मोती गिर गया.................... ...... कोना कोना छान
सबहुं चीज़ हटाय जोह........................ कचरा या धनधान
अरुण

दोहे....९ जनवरी २०१६
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गर पानी भय लागता ................... और दु:खकर शूल
फिर मछली कैसे जिए.................. धरते यह मन-भूल

दुनियाभर की चीज़ को ...................... मन लेता है जान
मन को जानत जग गया .................... भीतर का भगवान
अरुण
दोहे....१० जनवरी २०१६
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ध्वनि सुधराने, रेडियो बजा रहे......... ..........जो लोग (यानि मैकेनिक)
जो भी चर्चा बज रही .................. करें न उसका भोग

कुएँ में बच्चा गिरा .......................पहले उसे निकाल
"सब कुओं को पाट दो" ................ कर आंदोलन बाद
अरुण






दोहे....११ जनवरी २०१६
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हवा हिलाये पात को................... पात हवा आधीन
पात भूलता सत्य यह.................. होता भय में लीन

दुख न कभी भी पास हो .............. इच्छा यह, दुख-मूल
हर आशा के फूल को...................लिपटे दुख के शूल
अरुण

दोहे....१२ जनवरी २०१६
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नापतोल सब मन बसे ..........इनसे सत्य न जाँच
निर्मन ध्यानी देखता ................क्या होवे है साच

जिस घर में हम क़ैद हों................ गर उससे हो प्रीत
कौन करे आज़ाद फिर................... बचे न कोई रीत
अरुण

दोहे....१३ जनवरी २०१६
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जो झुठलाए ईश* को..................वह अज्ञानी होत
बिन देखे स्वीकारता...............वह भी नास्तिक होत

श्रद्धा और विश्वास ही................ढकते जीवन पूर
फिर न दिखे जीवन हमें............खोज भी रहती दूर
अरुण





दोहे....१४ जनवरी २०१६
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सभी इशारे एक पर................जिनके रूप अनेक
उलझे बंदे रूप में.................. मार्ग अलग हर एक     (हर एक रूप)

हम लढते हैं देह से.................. और चित्त के बीच
बाहर दिखती शांतता ............... भीतर रस्साखींच
अरुण
दोहे....१५ जनवरी २०१६
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भले बुरे के ख्याल से .............अनुभव को मत तोल
हर अनुभव सिखला रहा ..........सीखे सिख उस बोल     सिख = शिष्य

रिश्ते ये इंसान के................... सब प्रतिमा के ठोर
यह मेरा जो मीत है ....................... बैरी दूजे छोर
अरुण

दोहे....१६ जनवरी २०१६
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निजता भिनता गुण लिए ......... दो 'मै' भीतर दंग
हिरदय निजता का धनी .......... भिनता मन का रंग

अखियाँ मूंदे सुन रहे................. जो कहता गुरुदेव
सुन न सको आशय सही.......... जितना भी सुन लेव
अरुण
दोहे....१७ जनवरी २०१६
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चढ़ चक्केपर होत है.............. मज़ा मौज आनंद
चक्के भीतर गर फँसा........... दुखकर होत प्रसंग

जीवन की सब उलझने ............मन का फिर आधार
मन में ही उलझा अगर.....................कैसे होवे पार
अरुण
दोहे....१८ जनवरी २०१६
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हर पल जागत जो जिए......... वह भगवान स्वरूप
उसके हांथो जो घटे.............. सब निष्काम स्वरूप

पडदे पर छाया नचे............... नचे जगत, चित माही
जात 'रौशनी' दिख पड़े ........... सब माया, कछु नाही
अरुण
'रौशनी' =  भ्रम-प्रकाश

दोहे....१९ जनवरी २०१६
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उसे न मुक्ती है कभी................... जो सपने में क़ैद
सपने में घायल हुए .....................दवा न माँगो बैद

जड़ ज़मीन मेरी नही.................... ना शरीर भी मोर
देह देन माँ बाप की..................... क्या दुनिया में मोर?
अरुण
दोहे....२० जनवरी २०१६
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मै सत देखत डर गया.................... सत को दूर धरा
बस सत पूजत बैठता.................. आस्तिक लगूँ खरा

ज्ञान ज्ञान तो कछु नही ............... ज्ञान न पाया कोय
बोध होत अज्ञान का................... बोध ज्ञानसम होय
अरुण

दोहे....२१ जनवरी २०१६
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चेतन से बहता सजग.................. मुख पर राम जगाय
मूरख समझा.................... राम-जप प्रभु से भेट कराय

बूँद बूंद सी जिंदगी...................... रूखी सूखी होय
सागर से गर मिल गई................... बूंद समंदर होय
अरुण

दोहे....२२ जनवरी २०१६
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बिन बोये फल ना मिले................... बोना तो हर हाल
बो कर भी फल पा सको ?............. बना रहाय सवाल

श्रद्धा ओ विश्वास तो ................. सत का साधन मात्र
जो साधन में लिप्त है ..................... रहता ख़ाली पात्र
अरुण
दोहे.... २३ जनवरी २०१६
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कोरी कापी होत है मानुस......................जब जन्मात
दुनिया उसप लिख रही ................ उसको ही दुहरात

है उलझा वह आस में ..................साँस न उसे सुझाय
तन को है वह भूलता......................जो मन में भरमाय
अरुण
दोहे.... २४ जनवरी २०१६
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मै बन 'कर्ता' कर रहा...................मै के बिन नही काम
'उसके' हांथों है सभी.................... उसका कर गुणगान

जीवन का मतलब महज़ जी लेना, ..............कछु नाय
वैसे तो दुनिया बहुल मतलब..................... देत सटाय
अरुण
दोहे.... २५ जनवरी २०१६
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हर क्षण तो होता अलग ............... भिन्न नियम आधीन
सजग होय जो जी रहा....................वह जीवन-परवीन

जो ख़ुद को लेवे समझ......................सबसे कर ले मेल
ख़ुद की ना होती समझ................... चूकत जीवन-खेल
अरुण
दोहे.... २६ जनवरी २०१६
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भीतर साधू कौन है?................... कोई नही पहचान
साधू उसको मानते.................. जिसका हो गुणगान

चिंता तो जंजाल है ................... फँसने का दुज नाम
चिंतन तो है रास्ता ........................ पहुँचे मुक्तीधाम
अरुण

दोहे.... २७ जनवरी २०१६
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जिस इलाज में दर्द है................. कुई न चाहे पास
रोग सभी स्वीकार्य हैं ............... लगते जो बिन त्रास

'मै' पृथ्वी हूँ जगत में....................... हूँ पृथ्वी में देश
सूबा हूँ 'मै' देश का...................... घटबढता परिवेश
अरुण


दोहे.... २८ जनवरी २०१६
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थोडीसी उर्जा बहुत.................. दो साँसों का खेल
पर भटके इतने यहाँ.................. साँसों में नहि मेल

हितमित का हि जमावडा ......... जिसका नाम समाज
कोइ किसी का कुछ नही ..........ना हो गर कुइ काज
अरुण
दोहे.... २९ जनवरी २०१६
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स्वारथ हो स्वारथ करो.............. परमारथ को छोड
परमारथ के नाम पर................. करो न स्वारथ होड़

यहाँ-वहाँ छोटा-बड़ा..................... अंदर-बाहर नाय
जब जागे निरपेक्षता..................सबकुछ एक सुझाय
अरुण
दोहे.... ३० जनवरी २०१६
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पहले ध्यानो सकल को........ फिर टुकड़ों को जान
फिर टुकड़ों के बोध से.......... कुल का कर सज्ञान

ख़ुद को देखे आइने............... पर न करे विश्वास
गौरय्या को हो रहा............... दुजी चिडी का भास
अरुण




































Friday, 1 January 2016

2 January 2016

दोहे....१३ दिसम्बर
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मानुष ना हम जन्मसे.................... मानुष एक विकास
जिस प्राणी के घर जनम ...............उस प्राणी का भास

दान धरम की आड़ में..................... गर छुपती कुई आस
दान नही, व्यापार यह ....................... खोजत ग्राहक पास
- अरुण
दोहे....१४ दिसम्बर
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कुइना किसी की चीज़ है................ कुइना किसी का दास
कण कण सबका आम है...................नही किसी का खास  

कुछ धरना कुछ छोड़ना........................ प्रीत घीन की रीत
जो सत खोजन चल पड़ा...................... ...हर ज़र्रे से प्रीत
अरुण



दोहे....१५ दिसम्बर
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जाको धन का गर्व हो........................ आतम धन ना पाय
नीचा देखत धनिक को..........................वह भी साधू नाय

गर तू पानी-स्पर्श को........................नामुमकिन कह जाय
क्यों पौडे की बातकर..................... ..सबका  वक्त गवाय?
अरुण
दोहे....१६ दिसम्बर
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संसारा डूबा हुआ.............................. सत से सौ गज दूर
सत ख़याल में जो डुबा..........................वह भी तो मजबूर

निज शरीर को छेदते.............................छिद्र हुआ ब्रह्मांड
बाहर के उपचार तो .........................सिरफ करम के कांड
अरुण

दोहे....१७ दिसम्बर
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गर सुनने को बैठते................,............. अपने से ना बोल
मन में बैठे कान-मुख............................. इक दूजे में घोल

अपने को ही घर मिले.................... ........झुग्गी रहे पड़ोस
सबको गर घर मिल गया.....................खोत हसी ओ जोश
अरुण
दोहे....१८ दिसम्बर
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बिन विकार के  चित्त से...................... बिन विकार आचार
कुछ चित में तो सावले........................ लगते बिना विकार

जब भी आशा पूर हो..................  क्षणिक शांति जग जात
इस शांती को राखने ............................. पूरी नींद गँवात
अरुण
दोहे....१९ दिसम्बर
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वह हांके जब डींग तो........................ अपने मन पर घात
वह ख़ुद को ऊंचा करे ....................अपना दिल बिठ जात

नक़्शा बदले देश का.........................लोग न सुधरत पाय
कैसे भी घट को रचो............................बदलत माटी नाय
अरुण
दोहे....२० दिसम्बर
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हो विवेक ज़ंजीर तो....................... मुर्छितता बंध जाय
चित में गर हो रौशनी................... .....मुर्छा ना ढल पाय

जाको पैसा धूलसम...................... जगे न उसका ख़्याल
कोई रख दे जेब में....................... ..या ले जाय निकाल
अरुण
दोहे....२१ दिसम्बर
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सब क़ुदरत के अंश है  ..................... क़ुदरतमय हैं बोर
सत चीनी का जानने......................... करत बताशा शोर

सतपुरुषों से लग रहे......................... कई हज़ारों लोग
कई योग में भोगते.............................कई साधते योग
अरुण



दोहे....२२ दिसम्बर
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लगा हुआ जो खोज में.....................भूल गया है 'खान'
'ना खाना' संकल्प जिस....................पा न सके सतज्ञान

सबकुछ 'मै' ने कर लिया .................'मै' का कितना ज़ोर
ना मिलता गर देह... मन...................'मै' रहता कित ओर?
अरुण
दोहे....२३ दिसम्बर
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'वो' न किसी को ख़ूब दे................... और न देत अभाव
'उसको' ना कोई दोस्ती....................... और न बैरी-भाव

इक अबोध मन आ गया..................... लगा कमाने ज्ञान
होत सार जब ज्ञान का................... पुनह अबोध सजान
अरुण
दोहे....२४ दिसम्बर
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कहाँ खोजते ईश को ........................ ईश बसा चहुं ओर
ख़ुद ही खोया ख्याल में  ......................हो ख़याल में बोर

खोज रहा भगवान को........................... देत उसे सम्मान
पहले यह तो जान ले.......................  कौन है यह भगवान
अरुण

दोहे....२५ दिसम्बर
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कुछ राजा हैं महल के .......................... कुछ का आश्रम राज
दोनों भूके राज के................................. दुजा न उनका काज

कण कण है ब्रह्मांड का ........................ आत्मा से भरपूर
कण कण टूटे............................आत्मा होत न चकनाचूर
अरुण
दोहे....२६ दिसम्बर
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स्मृति की आभा से बना...................... अपना जीवन-ख़्वाब
सत का पडदा दिख पड़े ........................ तब जाते हैं जाग

जो सपने में डूबता............................ सपने को सच मान
ख़ुद का सच जब साफ़ हो ........................होवे अंतरज्ञान
अरुण

दोहे....२७ दिसम्बर
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जब होती है रौशनी.............................. होत न है अंधियार
अंधी आँखें ढूंढती................................ पा न सकें उजियार

ना अच्छा ना कुछ बुरा ......................... जो सत खोजन जाय
जो सवाद देखन चला............................ खट कड़वा सब खाय
अरुण

दोहे....२८ दिसम्बर
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चितभूमी में बो दिया............................ जैसा मज़हब देश
वैसा फलता चित्त से..............................भाषा चिंतन वेश

धरम पोथ से हांथ उठ.............................. करे इशारा दूर
मोहभरी अंखियां मगर ........................... पढें हांथ को घूर
अरुण

दोहे....२९ दिसम्बर
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कठपुतली जब नाचती.......................... लगती जिंदा जीव
प्राण डोर पर नाचता ............................'यह पुतला' निर्जीव

रोटी बाटी खेल में..................................हम इतने मशगूल
प्रेम द्वेष में डूबते...................................गये 'खेल यह' भूल
अरुण
दोहे....३०  दिसम्बर
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भूक उठी है पेट में .............................यह तो ख़ुद का ज्ञान
पर दिखलाऊँ ग़ैर को ?......................यह तो मुश्किल काम

जहाँ कुई मतलब बसा .......................... धर्म न वहाँ बसात
जब प्रचार होने लगे ........................... धर्म न फिर बच पात
अरुण

दोहे....३१  दिसम्बर
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त्याग-भाव को त्याग दो .................... त्याग न रखिए ख्याल
पाली गायें त्यागकर.............................त्याग न मन में पाल

इक तिनके की चाह ही.......................... दुखपर्वत की जान
जहाँ चाह ही लोपती .......................... सुख दुख एक समान
अरुण


दोहे....१ जनवरी २०१६
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प्रेम न कोई चाह है............................... प्रेम न दुखवा देत
प्रेम न होवे खास से.............................. प्रेमवा सभी समेत

जो जुबान मीठी करे...............................वह मीठा कहलाय
मीठा मीठा कहन से................................ ना मीठा बन जाय
अरुण