दोहे....१ जनवरी २०१६
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प्रेम न कोई चाह है............................... प्रेम न दुखवा देत
प्रेम न होवे खास से.............................. प्रेमवा सभी समेत
जो जुबान मीठी करे...............................वह मीठा कहलाय
मीठा मीठा कहन से................................ ना मीठा बन जाय
अरुण
दोहे....२ जनवरी २०१६
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धन आपन बढ़ता गया ........................... गर्व जात है फूल
जिस पेटी में धन धरा .......................... वो न करे यह भूल
मै क़ुदरत को देखता ............................. क़ुदरत से ले ज्ञान
अपनी क़ुदरत देखते ............................. 'मै' क़ुदरत को दान
अरुण
दोहे....३ जनवरी २०१६
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अलग अलग, दुई, नींद में....................अलग अलग सपनाव
"वही सत्य जो मुझ दिखा" ...................इस कारण टकराव
हांथ उठे असहाय का.........................भीतर वह बिन साथ
प्रेम करे जो सबन से ............................उसका उठे न हांथ
अरुण
दोहे....४ जनवरी २०१६
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जो अखियां ना बोलती......................... उनसे दुनिया देख
फिर न दिखे कोई बुरा.......................... और न दिखता नेक
बाप मरा रोने लगा ............................ तब पहुँचे समशान
देख अनेकों मुझन से ..............................पाते अंसु विराम
अरुण
दोहे....५ जनवरी २०१६
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मन की गाडी चढ़ पडूं.......................... गाडी लेत सम्हाल
जब बाहर को झांकता....................... समझूँ मन की चाल
दौड़ पेड़ दिखला रहे ......................... अंखियों को गति-रेल
मीटर में गति देखना................................ एक दिमाग़ी खेल
अरुण
दोहे....६ जनवरी २०१६
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सपने में ही चाहते ............................. करते यही प्रयास
कि नींद कभी ना आ सके................... न आवे सपना पास
तबला संगत कर रहा.............................. देता गायन जान
गर तबला हाबी हुआ............................. गायन हो निष्प्राण
अरुण
दोहे....७ जनवरी २०१६
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भय ने रखा बंध में.......................... हर सुविधा के साथ
मंदिर मदिरा ग्रंथ हैं............................ छुपने की हर बात
बात बैद की वह भली.........................जिससे तबियत ठीक
मोह बंध में सुन न सब ........................जो भी बके वह मीत
अरुण
दोहे....८ जनवरी २०१६
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बाट चले जो दिख पड़े ........................ सब लेना है देख
पेड़ नदी नाला कुआँ.........................सबको सम मन देख
घर में मोती गिर गया.................... ...... कोना कोना छान
सबहुं चीज़ हटाय जोह........................ कचरा या धनधान
अरुण
दोहे....९ जनवरी २०१६
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गर पानी भय लागता ................... और दु:खकर शूल
फिर मछली कैसे जिए.................. धरते यह मन-भूल
दुनियाभर की चीज़ को ...................... मन लेता है जान
मन को जानत जग गया .................... भीतर का भगवान
अरुण
दोहे....१० जनवरी २०१६
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ध्वनि सुधराने, रेडियो बजा रहे......... ..........जो लोग (यानि मैकेनिक)
जो भी चर्चा बज रही .................. करें न उसका भोग
कुएँ में बच्चा गिरा .......................पहले उसे निकाल
"सब कुओं को पाट दो" ................ कर आंदोलन बाद
अरुण
दोहे....११ जनवरी २०१६
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हवा हिलाये पात को................... पात हवा आधीन
पात भूलता सत्य यह.................. होता भय में लीन
दुख न कभी भी पास हो .............. इच्छा यह, दुख-मूल
हर आशा के फूल को...................लिपटे दुख के शूल
अरुण
दोहे....१२ जनवरी २०१६
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नापतोल सब मन बसे ..........इनसे सत्य न जाँच
निर्मन ध्यानी देखता ................क्या होवे है साच
जिस घर में हम क़ैद हों................ गर उससे हो प्रीत
कौन करे आज़ाद फिर................... बचे न कोई रीत
अरुण
दोहे....१३ जनवरी २०१६
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जो झुठलाए ईश* को..................वह अज्ञानी होत
बिन देखे स्वीकारता...............वह भी नास्तिक होत
श्रद्धा और विश्वास ही................ढकते जीवन पूर
फिर न दिखे जीवन हमें............खोज भी रहती दूर
अरुण
दोहे....१४ जनवरी २०१६
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सभी इशारे एक पर................जिनके रूप अनेक
उलझे बंदे रूप में.................. मार्ग अलग हर एक (हर एक रूप)
हम लढते हैं देह से.................. और चित्त के बीच
बाहर दिखती शांतता ............... भीतर रस्साखींच
अरुण
दोहे....१५ जनवरी २०१६
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भले बुरे के ख्याल से .............अनुभव को मत तोल
हर अनुभव सिखला रहा ..........सीखे सिख उस बोल सिख = शिष्य
रिश्ते ये इंसान के................... सब प्रतिमा के ठोर
यह मेरा जो मीत है ....................... बैरी दूजे छोर
अरुण
दोहे....१६ जनवरी २०१६
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निजता भिनता गुण लिए ......... दो 'मै' भीतर दंग
हिरदय निजता का धनी .......... भिनता मन का रंग
अखियाँ मूंदे सुन रहे................. जो कहता गुरुदेव
सुन न सको आशय सही.......... जितना भी सुन लेव
अरुण
दोहे....१७ जनवरी २०१६
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चढ़ चक्केपर होत है.............. मज़ा मौज आनंद
चक्के भीतर गर फँसा........... दुखकर होत प्रसंग
जीवन की सब उलझने ............मन का फिर आधार
मन में ही उलझा अगर.....................कैसे होवे पार
अरुण
दोहे....१८ जनवरी २०१६
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हर पल जागत जो जिए......... वह भगवान स्वरूप
उसके हांथो जो घटे.............. सब निष्काम स्वरूप
पडदे पर छाया नचे............... नचे जगत, चित माही
जात 'रौशनी' दिख पड़े ........... सब माया, कछु नाही
अरुण
'रौशनी' = भ्रम-प्रकाश
दोहे....१९ जनवरी २०१६
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उसे न मुक्ती है कभी................... जो सपने में क़ैद
सपने में घायल हुए .....................दवा न माँगो बैद
जड़ ज़मीन मेरी नही.................... ना शरीर भी मोर
देह देन माँ बाप की..................... क्या दुनिया में मोर?
अरुण
दोहे....२० जनवरी २०१६
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मै सत देखत डर गया.................... सत को दूर धरा
बस सत पूजत बैठता.................. आस्तिक लगूँ खरा
ज्ञान ज्ञान तो कछु नही ............... ज्ञान न पाया कोय
बोध होत अज्ञान का................... बोध ज्ञानसम होय
अरुण
दोहे....२१ जनवरी २०१६
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चेतन से बहता सजग.................. मुख पर राम जगाय
मूरख समझा.................... राम-जप प्रभु से भेट कराय
बूँद बूंद सी जिंदगी...................... रूखी सूखी होय
सागर से गर मिल गई................... बूंद समंदर होय
अरुण
दोहे....२२ जनवरी २०१६
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बिन बोये फल ना मिले................... बोना तो हर हाल
बो कर भी फल पा सको ?............. बना रहाय सवाल
श्रद्धा ओ विश्वास तो ................. सत का साधन मात्र
जो साधन में लिप्त है ..................... रहता ख़ाली पात्र
अरुण
दोहे.... २३ जनवरी २०१६
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कोरी कापी होत है मानुस......................जब जन्मात
दुनिया उसप लिख रही ................ उसको ही दुहरात
है उलझा वह आस में ..................साँस न उसे सुझाय
तन को है वह भूलता......................जो मन में भरमाय
अरुण
दोहे.... २४ जनवरी २०१६
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मै बन 'कर्ता' कर रहा...................मै के बिन नही काम
'उसके' हांथों है सभी.................... उसका कर गुणगान
जीवन का मतलब महज़ जी लेना, ..............कछु नाय
वैसे तो दुनिया बहुल मतलब..................... देत सटाय
अरुण
दोहे.... २५ जनवरी २०१६
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हर क्षण तो होता अलग ............... भिन्न नियम आधीन
सजग होय जो जी रहा....................वह जीवन-परवीन
जो ख़ुद को लेवे समझ......................सबसे कर ले मेल
ख़ुद की ना होती समझ................... चूकत जीवन-खेल
अरुण
दोहे.... २६ जनवरी २०१६
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भीतर साधू कौन है?................... कोई नही पहचान
साधू उसको मानते.................. जिसका हो गुणगान
चिंता तो जंजाल है ................... फँसने का दुज नाम
चिंतन तो है रास्ता ........................ पहुँचे मुक्तीधाम
अरुण
दोहे.... २७ जनवरी २०१६
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जिस इलाज में दर्द है................. कुई न चाहे पास
रोग सभी स्वीकार्य हैं ............... लगते जो बिन त्रास
'मै' पृथ्वी हूँ जगत में....................... हूँ पृथ्वी में देश
सूबा हूँ 'मै' देश का...................... घटबढता परिवेश
अरुण
दोहे.... २८ जनवरी २०१६
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थोडीसी उर्जा बहुत.................. दो साँसों का खेल
पर भटके इतने यहाँ.................. साँसों में नहि मेल
हितमित का हि जमावडा ......... जिसका नाम समाज
कोइ किसी का कुछ नही ..........ना हो गर कुइ काज
अरुण
दोहे.... २९ जनवरी २०१६
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स्वारथ हो स्वारथ करो.............. परमारथ को छोड
परमारथ के नाम पर................. करो न स्वारथ होड़
यहाँ-वहाँ छोटा-बड़ा..................... अंदर-बाहर नाय
जब जागे निरपेक्षता..................सबकुछ एक सुझाय
अरुण
दोहे.... ३० जनवरी २०१६
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पहले ध्यानो सकल को........ फिर टुकड़ों को जान
फिर टुकड़ों के बोध से.......... कुल का कर सज्ञान
ख़ुद को देखे आइने............... पर न करे विश्वास
गौरय्या को हो रहा............... दुजी चिडी का भास
अरुण