Tuesday, 31 May 2016

मई २०१६

दोहा....१ मई २०१६
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मिची आँख अंधियार है..............खुली आँख उजियार
बस एक पल की बात है........... इस तट से उस पार

तात्पर्य
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हम हर पल हर स्थल सत्यावस्था में ही हैं, फिर भी हमें उस अवस्था का कोई भी भान नही, क्योंकि हम किसी नींद से होकर गुज़र रहे हैं। किसी कल्पना या मायावी दुनिया में मग्न हैं। आँखों के सामने सत्य- सृष्टि के होते हुए भी भीतर किसी मानसिक या काल्पनिक प्रतिसृष्टी का आभास होता रहता है। हम उस प्रतिसृष्टी को ही सत्य-सृष्टि माने हुए जीवनयापन कर रहे हैं।
जो लोग सत्य-सृष्टि की वास्तविकता के प्रति यकायक जाग उठे, या यूँ कहें कि जिनकी आँखें अचानक खुल गईं, वे असत्य के तट से अचानक सत्य के तटपर आ गये, बिना कोई समय लिये, कोई मार्ग चले या किसी प्रयास के किये।
- अरुण
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दोहा....२ मई २०१६
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सपने में ही चल रहा................ हरदम एक प्रयास
नींद कभी ना आ सके............... और न सपना पास

तात्पर्य
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आदमी नींद में हो तभी सपने देखता है। नींद की अवस्था में चलनेवाला विचार भी नींद का ही लक्षण है। नींद में सोचना कि नींद को दूर भगाना है, नींद या बेहोशी की ही एक कृति है। यह होश का लक्षण नही। मनुष्य द्वारा होश के संबंध में चलनेवाला कोई भी विचार, संकल्प या जानाबूझा प्रयास उसके बेहोशी में ही घटता है।
बेहोशी होश को जन्मा नही सकती। होश का पता केवल होश को ही संभव है। सारे स्व से निकले विचार एक तरह से, आदमी के बेहोशी की अवस्था के ही परिचायक हैं।
- अरुण
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दोहा....३ मई २०१६
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बिखरे को पागल कहें...................... सुधरा नेक सयान
पागल तो पागल रहे..................... बिखर सुधर अनुमान

तात्पर्य -
जीवन की सच्चाई यही है कि यहाँ प्रतिस्पर्धा, प्रतिहिंसा, असुरक्षितता का ही माहोल है। हर कोई असुरक्षा और भय का शिकार होने के कारण जीवन की समझ खो बैठा है। सभी यहाँ नासमझ हैं। अज्ञानी या यूँ कहें कि पागल हैं। सभी एक तरह की मानसिक निद्रा में हैं।
हाँ जो इस पागलपन को छोडेबिना या उससे मुक्त हुए बिना समाज के अनुकूल आचरण कर पातें हैं, उन्हे नेक सयान.... तो जो इसतरह की कला या सामंजस्य हासिल करने में असफल रहते हैं उन्हे बिगड़ा हुआ समझा जाता है, सही अर्थ में पागल तो दोनों ही हैं।
- अरुण
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दोहा....४ मई २०१६
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दुनिया का सत जानते...................... माथे में धर लेत
माथे का सत जानते........................ सत पे माथा टेक

तात्पर्य -
दुनिया की हर बात को जानने और इस जानकारी का जीवन में उपयोग करने की परंपरा सदियों से चलती आई है। मनुष्य का मनो-मस्तिष्क ऐसी जानकारी से भरता चला आया है (यानि माथे में धर लेता है) और इसी  ज्ञान या जानकारी के बल पर मनुष्य ने अपनी प्रगति की है। परंतु जिन्होंने मनो-मस्तिष्क का दर्शन कर लिया (यानि माथे का सत जान लिया) वे ही सही माने में मुक्त हो सके, उन्होंने ही सत्य पर अपनी जानने की ललक समर्पित कर दी यानि सत के समक्ष माथा टेक दिया।
- अरुण
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दोहा....५ मई २०१६
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शब्द-अर्थ सब धारणा...................... केवल छाया पक्ष
छायाकण को बोत ही .................... फैले छाया वृक्ष
तात्पर्य -
मनुष्य एक साथ ही दो अलग अलग संसारों या जगतों में जीता है। एक है अस्तित्व-जगत, तो दूसरा है कल्पना जगत। शब्द-अर्थ, विचार, चिंतन-मनन, स्मृतिस्मरण, गणन मापन, ये सब जीवन के मायावी, छायावी या काल्पनिक पक्ष हैं। जिस जगत में इंसान साँस लेता है, जिसके अकाल्पनिक या जीवित संपर्क में रहता है, वह है उसका अस्तित्वगत जगत।

कल्पना या विचार या मान्यता का एक कण या बीज, तत्काल ही एक विशाल वृक्ष खड़ा कर देता है। इस वृक्ष के फैले जाल में ही मनुष्य उलझा या बंधा रहता है। मनुष्य ही वह एकमेव प्राणी है जो अपने कल्पजगत में ख़ुद उलझा पड़ा है और अपने इस काल्पनिक भँवर  में दूसरे सभी मनुष्यों को उलझाए हुए है।
- अरुण
दोहा....६ मई २०१६
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भ्रामक सूर्यप्रकाश को.....................रोके भ्रामक आड़
भ्रामक छाया में बसा.................. यह भ्रममय संसार
दृष्टांत यह है कि -
अगर सूर्य काल्पनिक हो तो उसके प्रकाश को रोके रखनेवाली आड़ भी काल्पनिक ही होगी... और फिर उस काल्पनिक आड़ के पीछे उभरनेवाली छाया भी एक काल्पनिक entity ही होगी। मनुष्य ऐसी ही काल्पनिक entity से रचा हुआ जीवन जी रहा है।
इस वास्तविकता को जो समझ की आँखों से देख सका वही मुक्त हो सका, सारे इस काल्पनिक व्यापार से। कल्पना बंधन है और इसी कल्पना का पूरा पूरा और सटीक एहसास ही है, कल्पना से मुक्ति।
- अरुण
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दोहा....७ मई २०१६
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लाल हरा पीला निला................... मिलकर बनता चित्र
वाद हुआ गर रंग में ................... हर तस्वीर विचित्र

दृष्टांत यह है कि-
चित्र की माँग के अनुसार चित्र में रंग भरे हों तो चित्र सजीव हो उठता है। चित्रकार न तो किसी रंग विशेष के प्रति आग्रही हो सकता है और न किसी रंग को नकार सकता है। रंगों में आपसी भेदभाव या विवाद-भाव, चित्रकार के स्वभाव का हिस्सा नही बन सकता।
जीवन भी परिस्थिति की जो माँग हो, उसके अनुसार अपना रंगढंग बदलता रहता है। परिस्थिति के अनुसार बदलना ही सुसंगति है, किसी आग्रह या दुराग्रह के साथ जीना, जीवन में विसंगति को आमंत्रित करने जैसा है।
- अरुण

दोहा....९ मई २०१६
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हर क्षण तो होता अलग............. अलग नियम आधीन
सजग होय जो जीरहा.................... वह जीवन परवीन

तात्पर्य-
हर क्षण का जीवन अपने आप में एक स्वतंत्र जीवन है। पिछले या अगले क्षण से उसका कोई संबंध नही। वह न तो पिछले को याद करता है और न ही अगले की सोचता है। दरअसल ‘पिछला’ और ‘अगला’... इन दोनों संकल्पनाओं से वह मुक्त है। उसे बस स्वयं की ही अनुभूति है। स्मृति से जुड़ा न होने के कारण, उसे ‘था’ और ‘होगा’ जैसे शब्दों से कोई वास्ता नही।
स्मृति ही क्षणों को जोड़कर एक काल्पनिक जीवन रेखा खींचती है, एक आकार की कल्पना गढ़कर.. अहंकार की कल्पना को जगाती है। इसी अहंकार नामक कल्पना के इर्दगिर्द ही हमारा जीवन घूम रहा है।
- अरुण
दोहा....१० मई २०१६
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तन मन एक सुराग़ है..................... आत्मा इक आकाश
इस सुराग़ से झाँक लो.................... आत्मा जो अविनाश

तात्पर्य-
हरेक व्यक्ति, प्राणी, जीव, जंतु, पौधे, पेड़ आदि सृष्टि की अभिव्यक्तियाँ हैं। यह अभिव्यक्ति ही वह द्वार है जहाँ से सृष्टि में प्रवेश होता है। मनुष्य इस प्रवेश द्वार के प्रति जागरूक नही है। बाहरी विषयों में खोया मन ख़ुद को या ख़ुद में होने वाली प्रक्रिया को देख नही पाता।  जो ख़ुद को देख ले, या यूँ कहें कि जो ख़ुद में झाँक ले उसे अविनाशी अस्तित्व से रहा अपना चिरंतन लगाव समझ आ जाए।
- अरुण

दोहा....११ मई २०१६
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पाँच द्वार के देह में........................ पंचमुखी एक चोर
जिसे देह ना पा सके......................... उसपर उसका ज़ोर

तात्पर्य-
शरीर की पाँच इंद्रियाँ शरीर के वे पाँच द्वार हैं, जहांसे किसीभी वस्तु, प्रसंग या स्थिति का देह उपभोग करता है। देह के लिए जबतक उपभोग संभव नही हो पाता, मन यानि ‘पंचमुखी चोर’ ...मन ही मन उसका उपभोग करने लगता है। ‘पंचमुखी चोर’ द्वारा होनेवाले उपभोग को ही इच्छा या वासना का जागना कहा जाता है। वासना जगती है तभी शरीर उपभोग की दिशा में प्रयास शुरू कर देता है। वासना प्रयास की प्रेरक है।
उदाहरण के लिए, जलेबी खाने की इच्छा होना यानि मन-मुख से ‘जलेबी’ का उपभोग होने लगना।
उपभोग के लिए देह से पूर्व, मन पंहुचकर तुरंत ही उपभोग का आनंद लेने लगता है और शरीर को उस दिशा में सक्रीय कर देता है। महत्वाकांक्षा को जगानेवाले लोग कहते हैं..”पहले चीज़ के ख़्वाब देखना शुरू करो तभी तुम उसे हासिल कर पाओगे”। ख़्वाब देखने का मतलब ही है कि तुम उस चीज़ को मन ही मन हासिल कर लेने की कल्पना करने लगो।
-अरुण
दोहा....१२ मई २०१६
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गर पानी भयदाय हो......................मछली मन बौरात
मछली फिर कैसे जिए.....................सागर में दिनरात

दृष्टांत कहता है कि-
पानी मछली का जीवन तो है, परंतु, अगर मछली का मन बौराकर पानी से डरने लगे, तो मछली का सागर में रहना मुश्किल बन जाएगा।
ठीक उसी तरह हमसब प्राणनौका पर बैठे मृत्यु सागर में जी रहे हैं। मृत्यु से ही उबरते हैं और फिर प्राणों का साथ छूटते ही, मृत्यु में समा जाते है। परंतु इस रहस्य के प्रति असहज बन जाने के कारण, हम मृत्यु की कल्पना मात्र से भयभीत हो जाते हैं।
- अरुण
दोहा....१३ मई २०१६
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जिस घर में हम क़ैद हैं................ गर उससे हो प्रीत
कौन करे आज़ाद फिर..................... बचे न कोई रीत

दृष्टांत का मतलब है कि-
अगर बंधन ही अच्छे लगने लगें तो उनसे मुक्त होने की बात तो बेईमानी ही होगी। मन जिन बातों में रस लेता है, वे ही सब हमारे बंधन हैं और वे बंधन ही हैं दुख के कारण। चीज़ों के प्रति आसक्ति और मिल्कियत का भाव ही बंधन हैं। कोई खुद ही बंधनों को पकड रखे और चिल्लाए कि बंधनों ने उसे जकड़ रखा है, तो कोई दूसरा इसका क्या इलाज करे?
- अरुण
दोहा....१४ मई २०१६
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दुख न किसी को चाहिए.................. यही मांग दुख मूल
हर आशा के फूल में......................... बैठा भय का शूल

तात्पर्य -
जीवन कई विरोधाभासों से भरा पड़ा है। ‘मुझे दुखदायी स्थिती का सामना न करना पडे’ यह सोच या चाह ही दुख का कारण बन जाती है। यह चाह ही आदमी को डराती रहती है। हर नई आशा के भीतर यह भय छुपा रहता है कि कहीं निराश न होना पड़े, या कहीं ऐसा न हो कि आशा की वस्तु प्राप्त होते ही हांथ से निकल जाए।
- अरुण

दोहा....१६ मई २०१६
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परदे पर छाया नचे........................... नचे जगत चित माहि
जात रौशनी दिख पड़े........................ माया यह, कछु नाहि

तात्पर्य -
सिनेमा के स्क्रीन पर जिस तरह प्रकाश-छाया नाचते हुए... एक कहानी का आभास निर्माण कर देती है, ठीक वैसे ही चित्तपर चेतना-प्रकाश का खेल चलता रहता है, लगता है मानो भीतर कोई ‘असली जगत’ सजीव रूप में जी रहा हो। सिनेमा स्क्रीन पर पड़ रहा प्रकाश ओझल होते ही, कोरा सफ़ेद परदा दिख पड़ता है और, असलियत उजागर हो जाती है।
उसीप्रकार, मनुष्य जब पूरे अवधान के साथ, चेतना प्रकाश के कारण, भ्रमरूप में निर्मित हुई जगत-क्रिडा को देख लेता है, उसे जीवन का मायावी स्वरूप स्पष्टता से समझ आ जाता है।
- अरुण
दोहा....१७ मई २०१६
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जो सत देखत डर गया...................... सत को दूर बिठाय
फिर उसकी पूजा करे........................... उसके ही गुण गाय

तात्पर्य -
सत्य की खोज के लिए बड़ा ही आंतरिक साहस चाहिए। असत्य के प्रति मोह रखकर, उसी मोह को जीवन का आधार बनाकर जीनेवाले हमसब, सत्य की झलक पाते ही उससे भयभीत हो जाते हैं। एक तरफ़ असत्य से मोह और दूसरी तरफ़ सच जानने की ललक, हमें बड़े ही दोलायमान या उलझनभरी स्थितीमें छोड देती है। ऐसे अन्तरसंघर्ष से बचने का एक ही उपाय बचता है और वह यह कि हम सत्य को किसी वस्तु, संकल्पना या व्यक्ति जैसा मानकर, बिना उसकी सच्चाई का सामना किए, उसकी पूजा करना या उसके प्रति आदर जतलाना शुरू कर दें।
क्या दुनिया में बहुतेरे ऐसा ही नही कर रहे ?
- अरुण
दोहा....१८ मई २०१६
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धन आपन बढ़ता गया......................... छाती जाती फूल
जिस पेटी में धन धरा..................... वह न करे यह भूल

दृष्टांत कहता है कि -
केवल यह एहसास कि उसकी धन-संपत्ति बढ़ रही है, आदमी को असहज या गर्विला बना देती है। परंतु जहांपर यह धन रखा हो वह पेटी या स्थान जस का तस बना रहता है। बोध यह निकलता है कि दोष धन में नही, उसके प्रति जागनेवाले मिल्कियत के भाव में है, उससे जुड़े ममत्व या अपनेपन की भावना में है।
- अरुण
दोहा....१९ मई २०१६
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चक्का फिरे कुंभार का...................... माटी लेत उभार
दो हाँथों की उँगलियाँ ..................... गढ़ती एक अकार

दृष्टांत कहता है कि -
घूमते चक्केपर माटी उभरती है जिसपर कुंभार दो हाँथों की उँगलियाँ रखकर अपना मनचाहा आकार रचता रहता है।
बोध यह है कि सामने घटनेवाली परिस्थिती को मनुष्य चित्तसंतुलन और ध्यान के सहारे ही मन के अनुकूल बना सकता है। चित्तसंतुलन एवं ध्यान ही जीवन को एक सही व जीवंत आकार देते हैं।
- अरुण
दोहा....२० मई २०१६
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कब रोना कब हासना..................... सब दुनिया की सीख
अपना तो कुछ भी नही....................सब दुनिया की भीख

तात्पर्य-
जन्म से.. जबसे भूमिपर पहली साँस ली, तबसे अबतक बस भीख ही पायी है, अपना कुछ भी नही है। भाषा, चिंतन, वेश, जात, संपत्ति और सभी आदतें दूसरों से ही पाई हुईं हैं। दोस्ती, दुश्मनी, सुख-दुख, हंसी-आँसु.. सब दूसरों ने सिखायी है। हम रिक्त थे फिर हममें अतिरिक्तता का आभास जागा और अंतत: हम फिर रिक्त हो गये।
- अरुण




दोहा....२१ मई २०१६
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परिचय का चश्मा पहन.................... देखत तू संसार
अब नवीनतम कछु नही ............ सब परिचय अनुसार

तात्पर्य-
जो चीज़ परिचित है वह नवीन नही हो सकती। उसकी नवीनता का अनुभव परिचय के पूर्व ही हो सकता है। किसी भी वस्तु या प्रसंग के पूर्णत्व से तभी मिलाप संभव है जब वह वस्तु या प्रसंग नवीन हो। जो अनुभव दुहराये जाते हैं उनमें कोई नवीनता नही रहती, फिर वस्तु का यथार्थपन (वस्तु जैसी है ठीक वैसी ही) नज़र नही आता।
उदाहरण: मानो आपने कोई नया फिल्मीगीत पहली बार सुना। आपने गीत की धुन और शब्द दोनों के मिलाप को सुना। अब अगर आपके कानों को उस गीत की धुन सुनाई देने लगें, तो उसके शब्दों की भी आपको याद आने लगेगी। केवल शुद्ध धुन सुनना मुश्किल बन जाएगा।
- अरुण

दोहा....२२ मई २०१६
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दुख का काटा ना चुभे................ सुख ना देत सुगंध
फिर दुख से क्यों भागते.............. सुख में रहते बंद

तात्पर्य-
दुख और सुख दोनों ही, एक भ्रांति के परिणाम हैं, गलत समझ से उपजे हैं। कोई भी अनुभव अपने आप में न तो सुखद है और न ही दुखद। जिसने ये सारी बातें अच्छी तरह से, समझ के पटल पर देख लीं, उसे न तो सुख से चिपके रहना है और न ही दुख से मुँह मोड़ना है, जो भी हो रहा है, बस उसे देखते रहना है।
- अरुण
दोहा....२३ मई २०१६
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पोथी से एक हांथ उठ.................. करे इशारा दूर
मोहभरी अंखियां मगर............. लगी हांथ को घूर

तात्पर्य-
सारे ग्रंथ, आध्यात्मिक-विचार, पुस्तकें, प्रवचन.... ‘निरर्थक’ होते हैं, इस अर्थ में कि उसमें कही गई बातें अर्थ को सीधे सीधे वहन नही करतीं। किसी दूसरी दिशा में ही इशारा करती हैं, कुछ और ही बतलाती रहती हैं जिसे समझाने में शब्द असमर्थ रहते हैं। मोहवश, आदमी इशारों को समझने के बजाय इशारों की विशेषता में ही, उसके वर्णन में ही उलझ जाता है। इशारा जिस ओर है.. उधर न देखकर, इशारे को ही देखता बैठता है। चौराहे पर ट्राफिक पुलिस के संकेतों को देखकर गाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं, संकेत करनेवाले हाँथों को देखते नही बैठती, उनसे मोह नही लगाती। परंतु पाठकगण आध्यात्मिक पोथियों से उठे हांथ या इशारों में ही उलझ जाते हैं एवं ‘दुर्घटना’ के शिकार बन जातें हैं।
- अरुण
दोहा....२४ मई २०१६
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ध्यान जगे चहुँओर जब.............देख सको इक ओर
जो जागा इक ओर ही..................सोया बाकी छोर

तात्पर्य-
ध्यान और एकाग्रता एक दूजे से भिन्न हैं। सारा ध्यान सिकुड़कर एक पर स्थिर होना, एकाग्रता है। ध्यान में समग्रता है, सर्वव्यापकता है। ध्यान जब सब ओर है, तो इसका मतलब कि कोई स्थान उससे बचा हुआ नही है। ऐसी सर्वव्यापकता किसी एक पर स्थिर नही हो सकती, एकग्र नही हो सकती।
एकाग्रता की माँग है कि सब जगह से हटकर या उनको भुलाकर या उनके प्रति सोते हुए, ... किसी एक ही स्थान या बिंदु पर जागो या focus करो, जबकि सर्वजागरूकता या ध्यान सहज सरल है, वह किसी प्रयास से होनेवाली ध्यान की focusing नही।
किसी एकपर focus होना नींद है। जबकि सब ओर ध्यान का जाना.. जागरूकता का लक्षण है।
- अरुण

दोहा....२५ मई २०१६
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इक अबोध मन आ गया.............. लगा कमाने ज्ञान
होत बोध जब ज्ञान का.................. तब अबोधपन जान

तात्पर्य-
संतों के संबंध में-
जन्म के समय सबों की तरह, उनका मन भी अबोध था। फिर सबों की तरह ही, वातावरण एवं मानवीय संबंधों के माध्यम से ज्ञान संचित होने लगा। लेकिन बाद में उन्हे फिर, इस संचित ज्ञान का उपयोग कम और बोझ ही अधिक महसूस होने लगा,  इसकारण वे ज्ञान के सार असार को परखने लगे। इस तरह की परख या बोध प्रवृत्ती उनमें विकसित होते ही वे ही फिर, अबोध एवं सरल बन गये। ऐसे लोग, जन्म के समय सरल थे, फिर बने कठिन और फिर अबोध सरल बन गये, संत बन गये।
- अरुण

दोहा....२६ मई २०१६
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सपने में होता बदल..................... ..बनी रहे यह नींद
दिन का सपना जागृति.................... वही रात अधनींद

तात्पर्य-
दिन हो या रात, मनुष्य तो नींद में ही जी रहा है। दिन व रात की इस नींद में भिन्नता इतनी ही है कि दिन की नींद में विचार से बने सपने चलते हैं और रात की नींद में सपनों में ढले विचार।
देह-मन की इस नींद प्रक्रिया पर जिसका ध्यान बना रहता है, या जो इसके प्रति सजग/aware है, वही आदमी सही अर्थ में जागृत है।
- अरुण

दोहा....२७ मई २०१६
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स्मृति की माटी ही गढ़े.................. स्मृति की मूरत एक
मूरत फेकन वास्ते......................... स्मृति का कुंड रचेत

तात्पर्य-
स्मृति के कारण ही द्वैतभाव उपजा। ‘मै’ की प्रतिमा बनी। गहन सोच ने (ध्यान ने नही) जाना कि यह ‘मै’ कितना काल्पनिक है, झूठा है। अत: इस ‘मै’ को विसर्जित करने की इच्छा फली और फिर विसर्जन के वास्ते स्मृति का ही कुंड रचा गया।
यहाँ स्मृति का आशय.... मन या Consciousness या बीते की याद से है। यह स्मृति-तत्व ही ‘मै’ का प्राण है, ‘मै-भाव’ की ऊर्जा है।
- अरुण
दोहा....२८ मई २०१६
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हवा हिलाये पात को..................... पात हवा आधीन
अगर भुला दे साँच यह................ दुख में होगा लीन

तात्पर्य-
हवा चली, डाली हिली, पत्ते डोलने लगे। हवा चलेगी तो पत्तों को डोलना ही है। हवा के आधीन रहना ही है, कोई चिंतावाली बात नही। अपनी इस आधीनता को उन्होंने अच्छी तरह स्वीकार कर लिया है, आधीनता की इस स्वाभाविकता से बच निकलने की कभी सोची ही नही उन्होंने। अगर सोचते या आधीनता के सत्य को भुला देते, तो वृक्ष, डाली, पत्ते - सभी.. हवा से डरे डरे रहते, भयभीत रहते, चिंतित रहते... ठीक वैसे ही जैसे, मृत्यु की वास्तविकता को अच्छी तरह या पूर्णरूपेण न देख सकने के कारण,  मनुष्य मृत्यु की  कल्पना से ही काँप उठता है, भीतर ही भीतर भयभीत रहता है।
- अरुण

दोहा....२९ मई २०१६
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ज्ञान ज्ञान तो कछु नही ................ज्ञान न होवे कोय
होत बोध अज्ञान का..................... बोध ज्ञानसम होय

तात्पर्य-
ज्ञान किसे कहें ? वैसे तो, यह शब्द कई ढंग से प्रयोग में लाया जाता है, जानकारी, संज्ञान, परिचय, साक्षात्कार इत्यादि भी ज्ञान के ही प्रतिशब्द हैं। परंतु चुंकि ज्ञान को उसके मूल अवस्था में न देखा या पकड़ा जा सकता है, यहाँ इस दोहे में, ज्ञान के बारे में, “ज्ञान ज्ञान तो कछु नही... ज्ञान न होवे कोय” ऐसा कहा गया है। जो बोध या समझ-स्पर्श, किसी भी असत्य या झूठ के झूठपन को, स्पष्टता से समझा या दिखला दे उसे ही ज्ञान कहना उपयुक्त होगा।
- अरुण



दोहा....३० मई २०१६
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जो बीते का ज्ञान है ....................... कहते उसको भूत
‘ना बीते’ की कल्पना ..................... उसको भी कह भूत

तात्पर्य-
जीवंत अस्तित्व यानि वर्तमान, वह, जो अभी यहाँ जीवित है। बीते अनुभवों से या भविष्य के बारे में देखे जाने वाले सपनों से बनती है.... अस्तित्व के संबंध की कल्पनाएँ। ये दोनों ही कल्पनाएँ या ‘ना अस्तित्व’ की अवस्थाएँ ......भूत यानि मरी हुई ही होती हैं, जीवित नही।
- अरुण


दोहा....३१ मई २०१६
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कुछ करने का ख्याल ही ....................करता मनस अशांत
जब खयाल यह हो निरस..................... मनवा होवे शांत

तात्पर्य-
“मन को शांत करो, शांति को प्राप्त करो”- इस ढंग की नसीहतें, धार्मिक प्रवचनों में दी जाती हुई, दिखती हैं। परंतु जो मन की प्रवाह-प्रक्रिया को निहारता रहे, उसे यह स्पष्ट है कि....ख़याल, विचार, संकल्प, या उद्देश्य, चाहे किसी बात के लिए हो, (शांति के लिए ही क्यों न हो)..... मन को अस्वस्थ या अशांत कर देता है। मन जब तक शांत न हो जाए यानि जबतक किन्हीं प्रयोजनों से मुक्त न हो जाए, कभी भी शांति की अवस्था को प्राप्त नही हो सकता।
समझ की इस भूल के कारण ही, तथाकथित अच्छे अच्छे समझदार लोग भी मन की विवशता से त्रस्त हैं।
- अरुण