दोहे....१३ दिसम्बर
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मानुष ना हम जन्मसे.................... मानुष एक विकास
जिस प्राणी के घर जनम ...............उस प्राणी का भास
दान धरम की आड़ में..................... गर छुपती कुई आस
दान नही, व्यापार यह ....................... खोजत ग्राहक पास
- अरुण
दोहे....१४ दिसम्बर
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कुइना किसी की चीज़ है................ कुइना किसी का दास
कण कण सबका आम है...................नही किसी का खास
कुछ धरना कुछ छोड़ना........................ प्रीत घीन की रीत
जो सत खोजन चल पड़ा...................... ...हर ज़र्रे से प्रीत
अरुण
दोहे....१५ दिसम्बर
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जाको धन का गर्व हो........................ आतम धन ना पाय
नीचा देखत धनिक को..........................वह भी साधू नाय
गर तू पानी-स्पर्श को........................नामुमकिन कह जाय
क्यों पौडे की बातकर..................... ..सबका वक्त गवाय?
अरुण
दोहे....१६ दिसम्बर
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संसारा डूबा हुआ.............................. सत से सौ गज दूर
सत ख़याल में जो डुबा..........................वह भी तो मजबूर
निज शरीर को छेदते.............................छिद्र हुआ ब्रह्मांड
बाहर के उपचार तो .........................सिरफ करम के कांड
अरुण
दोहे....१७ दिसम्बर
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गर सुनने को बैठते................,............. अपने से ना बोल
मन में बैठे कान-मुख............................. इक दूजे में घोल
अपने को ही घर मिले.................... ........झुग्गी रहे पड़ोस
सबको गर घर मिल गया.....................खोत हसी ओ जोश
अरुण
दोहे....१८ दिसम्बर
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बिन विकार के चित्त से...................... बिन विकार आचार
कुछ चित में तो सावले........................ लगते बिना विकार
जब भी आशा पूर हो.................. क्षणिक शांति जग जात
इस शांती को राखने ............................. पूरी नींद गँवात
अरुण
दोहे....१९ दिसम्बर
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वह हांके जब डींग तो........................ अपने मन पर घात
वह ख़ुद को ऊंचा करे ....................अपना दिल बिठ जात
नक़्शा बदले देश का.........................लोग न सुधरत पाय
कैसे भी घट को रचो............................बदलत माटी नाय
अरुण
दोहे....२० दिसम्बर
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हो विवेक ज़ंजीर तो....................... मुर्छितता बंध जाय
चित में गर हो रौशनी................... .....मुर्छा ना ढल पाय
जाको पैसा धूलसम...................... जगे न उसका ख़्याल
कोई रख दे जेब में....................... ..या ले जाय निकाल
अरुण
दोहे....२१ दिसम्बर
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सब क़ुदरत के अंश है ..................... क़ुदरतमय हैं बोर
सत चीनी का जानने......................... करत बताशा शोर
सतपुरुषों से लग रहे......................... कई हज़ारों लोग
कई योग में भोगते.............................कई साधते योग
अरुण
दोहे....२२ दिसम्बर
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लगा हुआ जो खोज में.....................भूल गया है 'खान'
'ना खाना' संकल्प जिस....................पा न सके सतज्ञान
सबकुछ 'मै' ने कर लिया .................'मै' का कितना ज़ोर
ना मिलता गर देह... मन...................'मै' रहता कित ओर?
अरुण
दोहे....२३ दिसम्बर
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'वो' न किसी को ख़ूब दे................... और न देत अभाव
'उसको' ना कोई दोस्ती....................... और न बैरी-भाव
इक अबोध मन आ गया..................... लगा कमाने ज्ञान
होत सार जब ज्ञान का................... पुनह अबोध सजान
अरुण
दोहे....२४ दिसम्बर
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कहाँ खोजते ईश को ........................ ईश बसा चहुं ओर
ख़ुद ही खोया ख्याल में ......................हो ख़याल में बोर
खोज रहा भगवान को........................... देत उसे सम्मान
पहले यह तो जान ले....................... कौन है यह भगवान
अरुण
दोहे....२५ दिसम्बर
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कुछ राजा हैं महल के .......................... कुछ का आश्रम राज
दोनों भूके राज के................................. दुजा न उनका काज
कण कण है ब्रह्मांड का ........................ आत्मा से भरपूर
कण कण टूटे............................आत्मा होत न चकनाचूर
अरुण
दोहे....२६ दिसम्बर
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स्मृति की आभा से बना...................... अपना जीवन-ख़्वाब
सत का पडदा दिख पड़े ........................ तब जाते हैं जाग
जो सपने में डूबता............................ सपने को सच मान
ख़ुद का सच जब साफ़ हो ........................होवे अंतरज्ञान
अरुण
दोहे....२७ दिसम्बर
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जब होती है रौशनी.............................. होत न है अंधियार
अंधी आँखें ढूंढती................................ पा न सकें उजियार
ना अच्छा ना कुछ बुरा ......................... जो सत खोजन जाय
जो सवाद देखन चला............................ खट कड़वा सब खाय
अरुण
दोहे....२८ दिसम्बर
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चितभूमी में बो दिया............................ जैसा मज़हब देश
वैसा फलता चित्त से..............................भाषा चिंतन वेश
धरम पोथ से हांथ उठ.............................. करे इशारा दूर
मोहभरी अंखियां मगर ........................... पढें हांथ को घूर
अरुण
दोहे....२९ दिसम्बर
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कठपुतली जब नाचती.......................... लगती जिंदा जीव
प्राण डोर पर नाचता ............................'यह पुतला' निर्जीव
रोटी बाटी खेल में..................................हम इतने मशगूल
प्रेम द्वेष में डूबते...................................गये 'खेल यह' भूल
अरुण
दोहे....३० दिसम्बर
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भूक उठी है पेट में .............................यह तो ख़ुद का ज्ञान
पर दिखलाऊँ ग़ैर को ?......................यह तो मुश्किल काम
जहाँ कुई मतलब बसा .......................... धर्म न वहाँ बसात
जब प्रचार होने लगे ........................... धर्म न फिर बच पात
अरुण
दोहे....३१ दिसम्बर
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त्याग-भाव को त्याग दो .................... त्याग न रखिए ख्याल
पाली गायें त्यागकर.............................त्याग न मन में पाल
इक तिनके की चाह ही.......................... दुखपर्वत की जान
जहाँ चाह ही लोपती .......................... सुख दुख एक समान
अरुण
दोहे....१ जनवरी २०१६
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प्रेम न कोई चाह है............................... प्रेम न दुखवा देत
प्रेम न होवे खास से.............................. प्रेमवा सभी समेत
जो जुबान मीठी करे...............................वह मीठा कहलाय
मीठा मीठा कहन से................................ ना मीठा बन जाय
अरुण
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मानुष ना हम जन्मसे.................... मानुष एक विकास
जिस प्राणी के घर जनम ...............उस प्राणी का भास
दान धरम की आड़ में..................... गर छुपती कुई आस
दान नही, व्यापार यह ....................... खोजत ग्राहक पास
- अरुण
दोहे....१४ दिसम्बर
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कुइना किसी की चीज़ है................ कुइना किसी का दास
कण कण सबका आम है...................नही किसी का खास
कुछ धरना कुछ छोड़ना........................ प्रीत घीन की रीत
जो सत खोजन चल पड़ा...................... ...हर ज़र्रे से प्रीत
अरुण
दोहे....१५ दिसम्बर
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जाको धन का गर्व हो........................ आतम धन ना पाय
नीचा देखत धनिक को..........................वह भी साधू नाय
गर तू पानी-स्पर्श को........................नामुमकिन कह जाय
क्यों पौडे की बातकर..................... ..सबका वक्त गवाय?
अरुण
दोहे....१६ दिसम्बर
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संसारा डूबा हुआ.............................. सत से सौ गज दूर
सत ख़याल में जो डुबा..........................वह भी तो मजबूर
निज शरीर को छेदते.............................छिद्र हुआ ब्रह्मांड
बाहर के उपचार तो .........................सिरफ करम के कांड
अरुण
दोहे....१७ दिसम्बर
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गर सुनने को बैठते................,............. अपने से ना बोल
मन में बैठे कान-मुख............................. इक दूजे में घोल
अपने को ही घर मिले.................... ........झुग्गी रहे पड़ोस
सबको गर घर मिल गया.....................खोत हसी ओ जोश
अरुण
दोहे....१८ दिसम्बर
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बिन विकार के चित्त से...................... बिन विकार आचार
कुछ चित में तो सावले........................ लगते बिना विकार
जब भी आशा पूर हो.................. क्षणिक शांति जग जात
इस शांती को राखने ............................. पूरी नींद गँवात
अरुण
दोहे....१९ दिसम्बर
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वह हांके जब डींग तो........................ अपने मन पर घात
वह ख़ुद को ऊंचा करे ....................अपना दिल बिठ जात
नक़्शा बदले देश का.........................लोग न सुधरत पाय
कैसे भी घट को रचो............................बदलत माटी नाय
अरुण
दोहे....२० दिसम्बर
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हो विवेक ज़ंजीर तो....................... मुर्छितता बंध जाय
चित में गर हो रौशनी................... .....मुर्छा ना ढल पाय
जाको पैसा धूलसम...................... जगे न उसका ख़्याल
कोई रख दे जेब में....................... ..या ले जाय निकाल
अरुण
दोहे....२१ दिसम्बर
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सब क़ुदरत के अंश है ..................... क़ुदरतमय हैं बोर
सत चीनी का जानने......................... करत बताशा शोर
सतपुरुषों से लग रहे......................... कई हज़ारों लोग
कई योग में भोगते.............................कई साधते योग
अरुण
दोहे....२२ दिसम्बर
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लगा हुआ जो खोज में.....................भूल गया है 'खान'
'ना खाना' संकल्प जिस....................पा न सके सतज्ञान
सबकुछ 'मै' ने कर लिया .................'मै' का कितना ज़ोर
ना मिलता गर देह... मन...................'मै' रहता कित ओर?
अरुण
दोहे....२३ दिसम्बर
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'वो' न किसी को ख़ूब दे................... और न देत अभाव
'उसको' ना कोई दोस्ती....................... और न बैरी-भाव
इक अबोध मन आ गया..................... लगा कमाने ज्ञान
होत सार जब ज्ञान का................... पुनह अबोध सजान
अरुण
दोहे....२४ दिसम्बर
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कहाँ खोजते ईश को ........................ ईश बसा चहुं ओर
ख़ुद ही खोया ख्याल में ......................हो ख़याल में बोर
खोज रहा भगवान को........................... देत उसे सम्मान
पहले यह तो जान ले....................... कौन है यह भगवान
अरुण
दोहे....२५ दिसम्बर
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कुछ राजा हैं महल के .......................... कुछ का आश्रम राज
दोनों भूके राज के................................. दुजा न उनका काज
कण कण है ब्रह्मांड का ........................ आत्मा से भरपूर
कण कण टूटे............................आत्मा होत न चकनाचूर
अरुण
दोहे....२६ दिसम्बर
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स्मृति की आभा से बना...................... अपना जीवन-ख़्वाब
सत का पडदा दिख पड़े ........................ तब जाते हैं जाग
जो सपने में डूबता............................ सपने को सच मान
ख़ुद का सच जब साफ़ हो ........................होवे अंतरज्ञान
अरुण
दोहे....२७ दिसम्बर
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जब होती है रौशनी.............................. होत न है अंधियार
अंधी आँखें ढूंढती................................ पा न सकें उजियार
ना अच्छा ना कुछ बुरा ......................... जो सत खोजन जाय
जो सवाद देखन चला............................ खट कड़वा सब खाय
अरुण
दोहे....२८ दिसम्बर
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चितभूमी में बो दिया............................ जैसा मज़हब देश
वैसा फलता चित्त से..............................भाषा चिंतन वेश
धरम पोथ से हांथ उठ.............................. करे इशारा दूर
मोहभरी अंखियां मगर ........................... पढें हांथ को घूर
अरुण
दोहे....२९ दिसम्बर
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कठपुतली जब नाचती.......................... लगती जिंदा जीव
प्राण डोर पर नाचता ............................'यह पुतला' निर्जीव
रोटी बाटी खेल में..................................हम इतने मशगूल
प्रेम द्वेष में डूबते...................................गये 'खेल यह' भूल
अरुण
दोहे....३० दिसम्बर
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भूक उठी है पेट में .............................यह तो ख़ुद का ज्ञान
पर दिखलाऊँ ग़ैर को ?......................यह तो मुश्किल काम
जहाँ कुई मतलब बसा .......................... धर्म न वहाँ बसात
जब प्रचार होने लगे ........................... धर्म न फिर बच पात
अरुण
दोहे....३१ दिसम्बर
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त्याग-भाव को त्याग दो .................... त्याग न रखिए ख्याल
पाली गायें त्यागकर.............................त्याग न मन में पाल
इक तिनके की चाह ही.......................... दुखपर्वत की जान
जहाँ चाह ही लोपती .......................... सुख दुख एक समान
अरुण
दोहे....१ जनवरी २०१६
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प्रेम न कोई चाह है............................... प्रेम न दुखवा देत
प्रेम न होवे खास से.............................. प्रेमवा सभी समेत
जो जुबान मीठी करे...............................वह मीठा कहलाय
मीठा मीठा कहन से................................ ना मीठा बन जाय
अरुण
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