Monday, 29 February 2016

१ मार्च २०१६

दोहे....१ फ़रवरी २०१६
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प्रेम क्रोध मद मोह का............................. 'मै' ही ठेकेदार
जो 'मै' के बिन हो गया .................... पहुँच गया ' उस पार'

परम अर्थ प्रवचन नही......................... नही चर्चा, न विचार
परम दृष्टि के सामने................................ परमारथ संसार
अरुण

दोहे....२ फ़रवरी २०१६
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अकड़ दिखाए दूसरा............................ तुझमें उठ्ठे क्रोध
तू भी रोगी गर्व का............................ कर ले मन में बोध

पानी के ये बुलबुले.......................... इक जाता इक आता
हमने जोडा बीच दो............................ पुनरजनम का नाता
अरुण
दोहे....३ फ़रवरी २०१६
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'मै' आया तब 'वह' छुपा.................... 'वह' तो हरपल हाय    
जिसका होना स्वप्नसा....................... 'मै' 'मेरा' कछु नाय

शब्दों में छुपकर रहे ....................... अर्थ न कहीं दिखात
अर्थहि है बस काम का...................शब्द तो मुख की बात
अरुण
दोहे....४ फ़रवरी २०१६
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दुजा न देगा 'स्पर्श' तुझ .......................... ना करता उद्धार    
ग्रंथ गुरू बस छोर तक ............................ ख़ुद ही होना पार

सत खोजन के मार्ग में...................... वह तेरा गुरू होय
जो देता बस प्रेरणा ....................... खोज तुम्ही से होय
अरुण
दोहे....५ फ़रवरी २०१६
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सर रीता, मनवा भरा....................... मिट गया रीतापन      
मन को फिर कैसे जने......................... क्या है रीतापन ?

शब्दों ने विवरण बुना ................... विवरण बुनता ख़्याल
बिन 'दृष्टी' समझत नही ................... शब्दों का जंजाल
अरुण
दोहे....६ फ़रवरी २०१६
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आखर पोथी स्कूल की......................  शिक्षा केवल बंध
शिक्षा ले शिक्षित हुए........................ फिर भी रहते अंध

शिक्षा का धन पा गया........................करता है अभिमान
'अनपढ' को जाहिल कहे................... खुद को तो सम्मान
अरुण
दोहे....७ फ़रवरी २०१६
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बिन समझे जो हाँ कहे .................... वह अंधा आस्तिक
बिन समझे जो ना कहे ................... वह नक़ली नास्तिक

मन के भीतर हो रहा........................ आत्मा का आभास
मन के बाहर मिल सके ..................... आत्मा से सहवास
अरुण
दोहे....८ फ़रवरी २०१६
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गंगा में जमना मिले ......................या जमना में गंग
मीलन हो नर नार का................... संगम सहज अनंद

जान स्थान सम्मान का..................... जीवन में संघर्ष
इसके ऊपर जो उठा....................... उसको जीवन-स्पर्श
अरुण
दोहे....९ फ़रवरी २०१६
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तट पर कुंड बनाय कर................. बदन भिगोया जात
जीवन के मँझधार में.................. जीवन समझल जात

स्मृतिका हर कण टूटते.................. तरल बहे स्मृतिधार
निराकार हुई जात है...................... सखत अहं आकार
अरुण
दोहे....१० फ़रवरी २०१६
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चितर परीचित चित्त को................ इतना रखता बांध
के रेखा बिंदु रंग को................... अखियां होती आंध

डिब्बी भरते ज्ञान से.................... करते ढक्कन बंद
रखते मस्तक-कोष में ...................जो भीतर में अंध
अरुण
दोहे....११ फ़रवरी २०१६
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गत पल को बिसराय कर........ कर लो चित को नेक
हर पल जीवन है नया.................. जो जागे ले देख

क्योंकर आये हम यहाँ............ किससे हित या हानि?
ऐसे प्रश्नों में फँसा  .................. केवल मानुष प्राणि
अरुण

दोहे....१२ फ़रवरी २०१६
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बंदा जन्मे सकल ही.................फिर होवेव विभक्त
यही विभक्ता चाहता................ फिरसे होना भक्त  

नज़र मिलाना बाघ से............... शायद संभव हाय
ख़ुद के भीतर झाँकना   ............ बहुत भयावह होय
अरुण

दोहे....१३ फ़रवरी २०१६
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'आती-बीती' कल्पना............. होती स्मृतिका लेख
बनगये ख़ुद ही लेखमय............. सच ना पाए देख

घटना जा 'छाया' बचे.................. लेकर उससे रंग
फिर रेखें सपने नये ................... 'छाया' में रह दंग
अरुण
दोहे....१४ फ़रवरी २०१६
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'तर्क-चाप का बाण तो..............जावे तभी सटीक
आँखें जब हों जागती............. और लक्ष्य पर टीक

जीवन पथ पर दौड़ते................. पीछे को मत देख
पीछा 'भूत'  न छोड़ता...............फिर फिर करे फ़रेब
अरुण
दोहे....१५ फ़रवरी २०१६
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उलझन पर हल क्या करे ?..... हर हल उलझन होत
जब चित हो सुलझा हुआ........ कहीं न उलझन बोत

जो ख़ुद ही दुर्बल हुआ............ डरा स्वयम प्रतिपल
वही दुजे को बल दिआ.......... जो ख़ुद स्पष्ट,सबल
- अरुण

दोहे....१६ फ़रवरी २०१६
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नहर बनी यह जिंदगी..................... मूलधार से टूट
अंत होत, खोये नहर.......................मूलधार से जूट

सज्जनता फलती सहज................ पूर्ण ध्यान के साथ
सज्जनता कौशल नही.................. हो जिसका अभ्यास
अरुण
दोहे....१७ फ़रवरी २०१६
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गर्वभाव-ओ-अस्मिता ................... 'मै'-भ्रम के आधीन
इस भ्रम की पूजा करे ................... राजनीति का जीन

कारण को कारण हुआ............... कारण बिन कछु नाहि
कारण बिन सृष्टी हुई................... जिसका 'रचता' नाहि
अरुण
दोहे....१८ फ़रवरी २०१६
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सबकुछ जगमें सचल है ............. अचल होत नही कोय
गति देखन के वास्ते ....................'स्थिरता' मन में बोय

तनमन एक सुराग़ है ...................... आत्मा है आकाश
इस सुराग़ से झांक लो ................ आत्मा यह अविनाश
अरुण


दोहे....१९ फ़रवरी २०१६
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दीप लिये जब ढूँढते .................... ना दिखता अंधियार
जो जागा, ना जन्मता......................उसमें चित्त-विकार

इक अंधा इक नयनसुख .............. भिन भिन उनकी चाल
इक चलता लाठी लिये ................. इक 'सतदृष्टी' साथ
अरुण
दोहे....२० फ़रवरी २०१६
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अनुभव से दोहा बहे.........................और दोहे से बोध
क्यों रटनी हैं पंक्तियां.................... करो बोध का शोध

जिसने पायी दृष्टि हो ...................... उसको दोहे व्यर्थ
क्या सूझेगा अंध को....................... इन दोहों का अर्थ
अरुण
दोहे....२१ फ़रवरी २०१६
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अँखियाँ देखें चित्र को..................... एक नज़र में पूर्ण
पर विचार संकीर्ण हैं......................... देखें आधअधूर

जादूगर जादू करे ............................ चतुराई के साथ
यही चतुरता साधते................... .......चमत्कार-महराज
अरुण
दोहे....२२ फ़रवरी २०१६
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कंकड़, सूजन आँख में, ............. किसका करूँ इलाज
कारण-लछ्छन एक ही.................. देखो जाकर पास

सपने में बदलाव बस..................... क़ायम रहती नींद
दिन में लगती जागती...................... और रात में नींद
अरुण
दोहे....२३ फ़रवरी २०१६
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एकदृष्टि दिखता जिसे.............. 'शुरू' सहित ही 'अंत'
वही समाधी में रमे.......................समयरहित गुणवंत

जो 'मै' चाहे 'मुझ' लिए.................... वही सबन को देव
इस 'मै' में सब आ बसें................... 'मुझमें' सब भर देव
अरुण
दोहे....२४ फ़रवरी २०१६
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वस्तु अवस्तु मिल बनी...................अनुभूति की वस्तु
दोनों में क्या भेद, जन............. समझ सको, क्या अस्तु*    अस्तु=अस्तित्व

'मै' विचार से कह रहा..................... कर विचार को दूर
कैसे यह 'मै' कर सके....................... जो विचार से पूर
अरुण
दोहे....२५ फ़रवरी २०१६
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भय लालच, ये जाल दो................ फसते बुद्धू सारे
भोंदुगिरी नचवा रही ...................... नाचें बुद्धू-चेले

जब विकास और सभ्यता............... क़ुदरतसे बेमेल
कुदरत खोती संतुलन.................. मानव-संकट बेल
अरुण
दोहे....२६ फ़रवरी २०१६
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परिचय का चष्मा पहन................... देखत तू संसार
अब नवीनतम कछु नही............ सब परिचय अनुसार

उंगली में पीडा चढ़े ..................उंगली पे बस ध्यान
मनचित की पीड़ा लिए............... सब खोते अवधान
अरुण
दोहे....२७ फ़रवरी २०१६
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टेप चले, गाना बजे................ गायक के बिन गीत
मन चलते मन बोलता............ बोलत नही कुइ मीत

गागर की दीवार पर .............. जमती स्मृति की धूल
गागर स्मृति ही बन गई.................अपना अंतस भूल
अरुण
दोहे....२८ फ़रवरी २०१६
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ज्ञान नही निष्कर्ष कछु............. ज्ञान नही अनुमान
चयन रहित अवधान ही ........... देत ज्ञान का ज्ञान

सदा स्मृति की राहपर.............. चिंतन चलता जाय
देत काल का भास वह ............... मन देता भरमाय
अरुण
दोहे....२९ फ़रवरी २०१६
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अर्थ लगाता सृष्टि का........... अर्थ न समझत पाय
छूटत इच्छा अर्थ की............. ख़ुद सृष्टि बन जाय

भरभर भारा भोरभा .................. भोभो भाचा भाल
बेमतलब के शब्द ही................. बनें अर्थ जंजाल
अरुण

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