From 14th March 2016
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Dohe March
दोहे....१३ मार्च २०१६
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स्मृति की पट्टी थामकर............ मनवा नापत काल
ध्यान सधे पट्टी गिरे..............'समय रहित' तत्काल
चित में है सूजन चढी............. मन की चढ़ती पीर
चित जबतक सूजा हुआ .......... अखियाँ ना बेनीर
- अरुण
दोहे....१४ मार्च २०१६
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चिंता चिंतन अहं से .............. जो शरीर आधीन
निराकार चित ध्यान दे......... कुल में जो है लीन
सब निद्रा में लीन हैं ........... बीच बीच कुइ जाग
हर क्षण बिरले ही जगे.............. सगरे अंध-प्रयास
- अरुण
दोहे....१५ मार्च २०१६
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कुछ, मानें फिर जान लें...... कुछ, मानत ही मान
कुछ जानें फिर मानते............. जाने वही सुजान
बिखरों को पागल कहें..............सुधरा, नेक सयान
वैसे सब पागल हुए ...... ...‘बिखर’ ‘सुधर’ पहचान
- अरुण
दोहे....१६ मार्च २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ..................ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले................ प्रज्ञानी परिमल
जिनसे पागलपन हटा...............दुनिया उनसे दूर
उनको केवल पूजती.................... बैठे दूर सदूर
- अरुण
दोहे....१७ मार्च २०१६
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मन ने तोड़ा जगत को............टुकड़ों में भर जान
जिसमें मन लुप्ता गया..........सधा सकल निर्वाण
झूठामूठा दर्द था................... पहुँचे बैद हकीम
सब ही नुक्सा दे रहे........ सच को कुई न चीन
- अरुण
न चीन=पहचान न पाया
दोहे....१८ मार्च २०१६
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जीवित क्षण जागा हुआ...... देखत भूत भविष्य
हम निद्रावश चूकते................ वर्तमान का दृश्य
देखत सोचत भोगकर............ होवे ‘अनुभव ज्ञान’
जो जागे इस ज्ञान पर ..........उसे ज्ञान का ज्ञान
- अरुण
दोहे....१९ मार्च २०१६
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जो भी उभरे कल्पना ....... उसको सत्य न जान
जहाँ जन्म ले कल्पना.......... वही सत्य का धाम
तन में आत्मा है बसा.......... आत्मा बसा शरीर
आत्मा में आत्मा बसा.......... आत्मा बना शरीर
- अरुण
दोहे....२४ मार्च २०१६
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ख़ुद ही है बाहर खड़ा..............ख़ुद ले उसे निहार
कोई नही भीतर यहाँ...............कुछ भी नही बहार
सागर की गर बूँद ने .......... धर ली भिन पहचान
सागर तो जीवित रहे................. होत बूँद निष्प्राण
इसीलिए जब बूँद को ............. होता सत का ज्ञान
सागर-जीवन भोगती................. बनकर सागर-प्राण
- अरुण
दोहे....२५ मार्च २०१६
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जो होती है कल्पना............... उसको सत्य न जान
जिस कारणवश कल्पना........... सत का वही विधान
मन मेरा हिस्सा महज़ ............ समाज-मन का एक
सदियों की यादें बंधी................... कुछ ही पाए फेंक
- अरुण
दोहे....२८ मार्च २०१६
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मै जागा मनमें मगर............... मन तो रहा अजाग
जो कर दे ख़ुद को ज्वलित............ मै ढूंढू वह आग
गुड के बने गणेशजी.................... गुड का बना प्रसाद
गुड ही गुड को खा रहा................ द्वैत महज़ आभास
- अरुण
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Dohe March
दोहे....१३ मार्च २०१६
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स्मृति की पट्टी थामकर............ मनवा नापत काल
ध्यान सधे पट्टी गिरे..............'समय रहित' तत्काल
चित में है सूजन चढी............. मन की चढ़ती पीर
चित जबतक सूजा हुआ .......... अखियाँ ना बेनीर
- अरुण
दोहे....१४ मार्च २०१६
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चिंता चिंतन अहं से .............. जो शरीर आधीन
निराकार चित ध्यान दे......... कुल में जो है लीन
सब निद्रा में लीन हैं ........... बीच बीच कुइ जाग
हर क्षण बिरले ही जगे.............. सगरे अंध-प्रयास
- अरुण
दोहे....१५ मार्च २०१६
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कुछ, मानें फिर जान लें...... कुछ, मानत ही मान
कुछ जानें फिर मानते............. जाने वही सुजान
बिखरों को पागल कहें..............सुधरा, नेक सयान
वैसे सब पागल हुए ...... ...‘बिखर’ ‘सुधर’ पहचान
- अरुण
दोहे....१६ मार्च २०१६
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अज्ञानी पागल यहाँ..................ज्ञानी भी पागल
जो पागलपन बूझ ले................ प्रज्ञानी परिमल
जिनसे पागलपन हटा...............दुनिया उनसे दूर
उनको केवल पूजती.................... बैठे दूर सदूर
- अरुण
दोहे....१७ मार्च २०१६
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मन ने तोड़ा जगत को............टुकड़ों में भर जान
जिसमें मन लुप्ता गया..........सधा सकल निर्वाण
झूठामूठा दर्द था................... पहुँचे बैद हकीम
सब ही नुक्सा दे रहे........ सच को कुई न चीन
- अरुण
न चीन=पहचान न पाया
दोहे....१८ मार्च २०१६
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जीवित क्षण जागा हुआ...... देखत भूत भविष्य
हम निद्रावश चूकते................ वर्तमान का दृश्य
देखत सोचत भोगकर............ होवे ‘अनुभव ज्ञान’
जो जागे इस ज्ञान पर ..........उसे ज्ञान का ज्ञान
- अरुण
दोहे....१९ मार्च २०१६
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जो भी उभरे कल्पना ....... उसको सत्य न जान
जहाँ जन्म ले कल्पना.......... वही सत्य का धाम
तन में आत्मा है बसा.......... आत्मा बसा शरीर
आत्मा में आत्मा बसा.......... आत्मा बना शरीर
- अरुण
दोहे....२४ मार्च २०१६
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ख़ुद ही है बाहर खड़ा..............ख़ुद ले उसे निहार
कोई नही भीतर यहाँ...............कुछ भी नही बहार
सागर की गर बूँद ने .......... धर ली भिन पहचान
सागर तो जीवित रहे................. होत बूँद निष्प्राण
इसीलिए जब बूँद को ............. होता सत का ज्ञान
सागर-जीवन भोगती................. बनकर सागर-प्राण
- अरुण
दोहे....२५ मार्च २०१६
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जो होती है कल्पना............... उसको सत्य न जान
जिस कारणवश कल्पना........... सत का वही विधान
मन मेरा हिस्सा महज़ ............ समाज-मन का एक
सदियों की यादें बंधी................... कुछ ही पाए फेंक
- अरुण
दोहे....२८ मार्च २०१६
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मै जागा मनमें मगर............... मन तो रहा अजाग
जो कर दे ख़ुद को ज्वलित............ मै ढूंढू वह आग
गुड के बने गणेशजी.................... गुड का बना प्रसाद
गुड ही गुड को खा रहा................ द्वैत महज़ आभास
- अरुण
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