Wednesday, 13 April 2016

14 April 2016 Dohe


1 April Dohe 2016
दोहे....१ अप्रैल २०१६
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निर्मलता शिशु की हुई.............पशुसम साफ़ सफ़ेद
नाम धाम की कालिखी.............. मानुष बना फ़रेब

जीता जी धर जी रहा जीवन............. बिन पहचान
जीवन दुष्कर बन गया................. पाते ही पहचान
- अरुण
दोहे....२ अप्रैल २०१६
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हिंदू-मन मुस्लिम बने................मुस्लिम हिंदू-प्राण
यही खरी है एकता.................. बाकी सब उपचार

जीकर भी ना जी सको.............. ‘दुनियादारी’ बीच
एक गुफ़ा फैली रहे.................जनम मरण के बीच
- अरुण

दोहे....३ अप्रैल २०१६
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हो विकास सबके लिए......... जन जंगल सब प्राण
तभी फलेगा क्षेत्र सकल......... करत सबन कल्याण

उसका ना परिचय कुई............क्योंकर करो बयान
जिन देखा वह कह पड़ा...........यही खुदा यहि राम
- अरुण

दोहे....४ अप्रैल २०१६
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तेरे मेरे बीच में........................ खड़ी एक दीवार
तहंकार के गाँव को................. अहंकार का द्वार

भूक प्यास का बोध ले............ खाओ पीओ मस्त
भूक प्यास दो नाम के ..........करो न मज़हब पुष्ट
- अरुण
दोहे....५ अप्रैल २०१६
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तन मन धन सब संपदा......... ब्रह्म जगत का अंग
घर मंजिल मारग सफ़र .......... सब रहते इक संग

ख़ून चले, ढाँचा चले................. चले धरत, अवकाश        धरत= धरती
सूर्य चले, मंडल चले...................चले सभी इक साथ
- अरुण

दोहे....६ अप्रैल २०१६
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मुरदों का स्वागत रहा........... शिशु की सुनी न हास
जीवन तो जीवित नही.................. मृत्यु का उल्हास

काल-कबूतर...................नोंचता घडियों का यह बाज
‘कल’ ‘कल’ दो कल बीच में.........लतपथ पूरा ‘आज’
- अरुण
दोहे....७ अप्रैल २०१६
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एक खुला मैदां जगत.................... फैला सूर्य प्रकाश
मै की छोटी खिड़कियाँ .................. नन्हासा आकाश

मन की गौरैया चुगे................ कण कण से विस्तार
ध्यान चबाए सकल को................... एक कौर संसार
- अरुण
दोहे....८ अप्रैल २०१६
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मनचित तन का अंग है.................तन को करे ग़ुलाम
माँ से जन्मे पुत्र को .....................माँ ने किया सलाम

जल थल या आकाश हो................. इसे दूर उस पास
अंधा देख न पायगा...................... कितहूं करे प्रवास
- अरुण
दोहे....९ अप्रैल २०१६
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‘कर्ता’ तो करता रहे.......................मनसुख ख़ातिर काम
‘होते’ का होता रहे............................सभी काम निष्काम

भाव मुताबिक़ दृष्टि हो........................ दृष्टीसम आचार
नाटक हो गर भाव में........................ नाटकसम व्यवहार
- अरुण
दोहे....१० अप्रैल २०१६
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एकसाथ मन दौड़ता .................... पूरब पश्चिम देस
मन टूटा, टूटा जगत.................... लगती हर पग ठेस

अति लगाव गर व्यक्ति से .......... या विचार या चीज़
भय हिंसा और द्वेष का ................. मन में पड़ता बीज
- अरुण
दोहे....११ अप्रैल २०१६
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हम ख़याल में सोचते .......... भूमि स्पर्श कस भाय
भूमीपर ही हैं खड़े .................. पता न इसका होय

जिस दरवाज़े से घुसे........................ कल्पजगत के बीच
उसी द्वार से लौटता ....................... सच्चा साधकमीत
- अरुण
दोहे....१२ अप्रैल २०१६
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नाटक-घर में वह घुसा................. लौटा करत बयान
घर की ही तारीफ़ बस ..............नाटक रहा न ध्यान

जल बहता सीधा सरल................... रहता मुक्त प्रवाह
मारग में पत्थर लढें...................... लगते स्वयं कराह
- अरुण
दोहे....१३ अप्रैल २०१६
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देखत जग का आइना.............. दिखा स्वयं का रूप
दृष्टी पैनी होत जब.................. दिखता जगत अरूप

ऊँची नीची घाटियाँ ....................... चित्र-धरातल एक
वर्तमान पर खिंच रही......................कालभरम की रेख
- अरुण
दोहे....१४ अप्रैल २०१६
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जो भी दिखता सामने............... सर में जा मंडरात
दुनिया सर में है धरी ............. सर ही सर खुजलात

जाने उसको जानना..................... बाकी सबकुछ व्यर्थ
तभी समझ आए हमें.................. क्या जीवन का अर्थ?
- अरुण









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