दोहा....२ जुलाई २०१६
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आखर पोथी स्कूल की .................. शिक्षा केवल बंध
शिक्षा पा शिक्षित हुए .................... फिर भी रहते अंध
तात्पर्य-
शिक्षा का उद्देश्य आदमी को मानसिक निद्रा से जगाना है। फिर भी होता यह है कि चित्त शिक्षा-सामग्री या जानकारी के रूप में मिले ज्ञान के बोझ से दबकर निद्रा में ही बना रहता है। हाँ यह जानकारी उसे व्यावहारिक अर्थ में मददगार साबित होती है, फिर भी सही अर्थ में उसे ‘दृष्टि’ देगी इस बाक का कोई भरोसा नही। दृष्टि मूल समझ का नाम है, जानकारी या बौद्धिक समस्याओं को हल करने की क्षमता का नही। बौद्धिक क्षमता के सजग उपयोग को ही मूल समझ कहना ठीक होगा।
- अरुण
दोहा....३ जुलाई २०१६
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बिन समझे झुठलाय दे .................. कहलाएँ नास्तिक
बिन समझे जो मान ले................... वह भी तो नास्तिक
तात्पर्य-
आमतौर पर, ईश्वर के होने को जो नकारते हैं, उन्हे नास्तिक कहा जाता है। पर क्या वे सभी जो ईश्वर के होने को मान लेते हैं, आस्तिक हैं? मानना या न मानना आस्तिकता का पैमाना नही हो सकता। जो हाँ कहे वह भी और जो ना कहे वह भी, दोनों एक ही हैं। एक पैरों पे खड़ा है तो दूसरा सर पे। जिसमें अस्तित्व की पूरी समझ जाग जाती है, उसे ही आस्तिक समझें। बाकी सारे शाब्दिक विशेषण किसी भी अर्थ के नही। वे आदमीयों के किए गये, ऊपरी बँटवारे मात्र हैं।
- अरुण
दोहा....४ जुलाई २०१६
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सत खोजन के रास्ते...................... गुरू न होवे कोय
गहन खोज की प्रेरणा .....................
शिष्य बनाए तोय
तात्पर्य-
सत्य-खोज के मार्ग में गहन खोज की प्रेरणा चाहिए। ऐसी गहन प्रेरेणा का होना ही शिष्यत्व का सही आधार है। जिससे भी ऐसी प्रेरणा मिले, चाहे वह व्यक्ति हो या प्रसंग या साहित्य या ग्रंथ या सत्संग या दृष्टांत अथवा कुछ भी, वही सही गुरू है। किसी गुरू विशेष की पूर्वशर्त ज़रूरी नही।
- अरुण
दोहा....५-६ जुलाई २०१६
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कोरी कापी पर लिखे.......................सब को जो है भात
जो सिखलाए जात हैं...................... उन्हीं गुणों को गात
तात्पर्य-
मनुष्य कोरी बही लेकर जन्मता है, जिसपर वही बातें लिख ली जाती हैं जिन्हें दुनिया सराहे, दुनिया को भाये। वही उसके जीवन के मूल्य बनते हैं जिसे दुनिया ने, समाज ने संमति दी हो। मानवीय वातावरण उसे जो शिक्षा व संस्कार दे उसी को वह ग्रहण करता है। लेकिन सत्य की खोज कठोर है, वह मिली हुई जानकारी, शिक्षा और संस्कारों का तटस्थता से पुन: अवलोकन करती है।
- अरुण
आज की यह पोस्ट बैंगलोर से
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दोहा....७ जुलाई २०१६
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‘वह’ न किसी को ख़ूब दे ................और न देत अभाव
उसमें ना कुई दोस्ती.......................... ना कुई बैरीभाव
तात्पर्य-
अस्तित्व करुणामयी है। एक ऐसा प्रेम-स्रोत है जिसमें दोस्ती और दुश्मनी, दोनों को ही कोई स्थान नही, पक्ष-विपक्ष नही, भेदभाव नही, ज़्यादा-कम नही, मेरा-तेरा नही, न्याय-अन्याय नही, अमीर-ग़रीब नही...... बस करुणा ही करुणा है... सब के लिए ... सकल के लिए।
- अरुण
दोहा....८ जुलाई २०१६
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मन का परदा ना हिले.........................देख अपरिचित लोग
परिचय में लग जात है............................. भले बुरे का रोग
तात्पर्य-
राह चलते कितने ही अपरिचित लोग मिलते हैं और हम उन्हे त्रयस्थभाव से देखते रहते हैं। अपरिचित होने के कारण उनसे हमारा कोई वास्ता नही, नाता नही, भावना नही, स्मृति नही.. न ही उनपर न कोई प्रतिक्रिया होती है और न ही उनका कोई विशेषण होता है। यही भाव सारी परिचित वस्तुओं, व्यक्तियों, प्राणी एवं परिस्थिती बाबत होना चाहिए, परंतु यह संभव नही हो पाता। जहाँ परिचय वहाँ किसी न किसी अच्छी बुरी या उदासीन प्रतिक्रिया का होना अपरिहार्य है।
जबतक स्वयं के प्रति तटस्थता न होगी, अन्यों के प्रति भी नही हो सकती। सारे संबंध,प्रतिक्रियायें, भावनायें स्वयं के केन्द्र से ही होती हैं। स्वयं को जो तटस्थता से देख पाए वही साक्षीभाव का धनी हो पाए।
- अरुण
दोहा....९-१० जुलाई २०१६
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अकड दिखाये दूसरा................................गर तुझमें हो क्रोध
तू भी रोगी गर्व का .......................... कर लो मन में बोध
तात्पर्य-
दूसरों के अहंकारपूर्ण बर्ताव को देखकर हम उनपर अहंकारी होने का आरोप करते हैं। बात यहीं समाप्त हो जाए तो ठीक, पर ऐसा नही होता। क्योंकि बहुधा हमारा आरोप केवल निरीक्षण मात्र से फला नही होता, वह हममें जगे ग़ुस्से या क्रोध की एक प्रतिक्रिया बनकर बाहर आता है। हमें यह बात सहज मालूम पड़ती है और हम उसे भुला देते हैं। परंतु ऐसी स्थिती में अगर भीतर ग़ौर से देखें तो पाएंगे कि हमारे भीतर का अहंकार किसी दूसरे के अहंकार द्वारा आहत हो रहा है।
- अरुण
दोहा....११-१२ जुलाई २०१६
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‘मै’ पृथ्वी हूँ जगत में.........................पृथ्वी में ‘मै’ देश
सूबा हूँ ‘मै’ देश का............................ क्या मेरा परिवेश
तात्पर्य-
अहंकार सूक्ष्म से सूक्ष्म और बृहत् से बृहत् रूप धारण करता रहता है। जैसे जैसे संदर्भ की सीमाएँ बदलती हैं, अहं का आकार भी बदलता जाता है। सृष्टि के संदर्भ में मै पृथ्वी हूँ, पृथ्वी में मै अपने को भारत से identify करता हूँ, भारत में मै महाराष्ट्र, महाराष्ट्र में मेरा जो गाँव है वो, गाँव में मेरा अपना मुहल्ला, मुह्ले में मेरा अपना घर .......इसतरह मेरे अहंकार की काल्पनिक सीमाएँ सदर्भानुसार घटती बढ़ती रहती हैं।
- अरुण
दोहा....१३-१४-१५ जुलाई २०१६
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मन की गौरय्या चुगे................ कण कण में विस्तार
ध्यान चबाये सकल ही...................... एक कौर संसार
तात्पर्य-
मन में विचार एक सीधी रेखा की तरह चलते हैं। जगत के सारे विस्तार को, मन एक क्रमिक ज्ञान के रूप में समय की पट्टीपर... रचता जाता है। परंतु ध्यान सकल सृष्टि को एक क्षण में ही निहार लेता है।
- अरुण
दोहा....१६ जुलाई २०१६
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हिंदू-मन मुस्लिम बने...................... मुस्लिम हिंदू-प्राण
यही खरी है ‘एकता’.......................... बाकी सब भ्रममान
तात्पर्य-
हिंदू-मुस्लिम एकता की बहुत चर्चा होती रहती है। परंतु ‘एकता’ के नामपर जो होता दिखता है, क्या उसीको एकता कहना ठीक होगा? दोनों के बीच आपसी समझौता, आंतरिक-समझ या सामंजस्य के होने को भले ही अच्छा सकारात्मक रुख़ मान लिया जाए, परंतु एकता यह शब्द और भी व्यापक और गहन है। ‘एकता’ का संकेत उस मनोमिलन की ओर है जिसमें हिंदू-मन मुसलमान के अंतरंग में घुला हो और मुसलमान.. हिंदू के प्राणोंको महसूस करता हो। बात आंतरिक-समझ तक ही न रुके तो आगे बढ़कर आंतरिक मिलन में रूपांतरित हो… यही खरा संकेत है ‘एकता’ शब्द का।
- अरुण
दोहा....१७-१८ जुलाई २०१६
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दीप लिये जो ढूँढता ....................... ना दिखता अंधियार
जो जागा ना पालता........................ कोई चित्त- विकार
तात्पर्य-
चित्त के सारे विकार मन के अंधेरे में जन्म लेते हैं। जागरण ऐसा प्रकाश है जिसके अवतरित होते ही सारे मानसिक अंधेरे लुप्त हो जाते हैं, फलत: कोई भी चित्तविकार भी नही फलता। दरअसल न प्रकाश ने कभी अंधेरे को देखा है और न अंधेरे ने प्रकाश को। इसीतरह, जागरण ने निद्रा को और निद्रासे फलनेवाले विकारों को जाना ही नही कभी। जो सकल में जागा वह विकल न होगा, उसका चित्त विकारों से मुक्त होगा।
- अरुण
दोहा....१९-२० जुलाई २०१६
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सपने में घायल हुआ....................... दवा माँगता बैद
दवा उसे क्या काम की.................... जो सपने में क़ैद
तात्पर्य-
सपने का तात्पर्य नींदसे, बेहोशीसे, विचारों-चिंताओं या सपनों में खो जाने से है। ऐसी बेहोशी की अवस्था में होनेवाला कोई भी दुख या मानसिक वेदना किसीभी दवा से दूर नही हो सकती। नींदसे जाग जाना ही एकमेव दवा या उपाय है।
- अरुण
दोहा....२१-२२ जुलाई २०१६
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तनमन एक सुराग़ है .................... आत्मा एक आकाश
इस सुराग़ से झाँक लो .................. आत्मा जो अविनाश
तात्पर्य-
आत्मा को जानने के लिए तनमन की ही आवश्यकता है। इसी माध्यम से अस्तित्व को समझा जा सकता है। तनमन एक सुराग़ है जहांसे परमात्मा में लीन हुआ जा सकता है।
- अरुण
दोहा....२३-२४-२५ जुलाई २०१६
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पाँच द्वार के देह में........................पंचमुखी इक चोर
जिसे देह ना पा सके.................... हासिल कर ले चोर
तात्पर्य-
पाँच इंद्रियों वाले इस देह के भीतर पाँच मुखवाला मन नामक चोर अवतरित होता है। जिन चीज़ों की चाहना होती है, मन उसे शरीर से पहले ही लपककर प्राप्त कर लेता है... इतना ही नही उस वस्तु को मन ही मन उपभोगना भी शुरू कर देता है। भले ही, शरीर, चाही वस्तु को असलियत में, प्राप्त न कर पाए, पर मन हासिल कर लेता है और यह एक मानसिक तनाववाली स्थिति बन जाती है। मनुष्य ऐसे ही तनाओंसे जूझता रहता है... परेशान है।
- अरुण
दोहा....२६-२७-२८ जुलाई २०१६
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मिची आँख अंधियार है.................. खुली आँख उजियार
है इक पल का फ़ासला.....................बंधन....मुक्त-दवार
तात्पर्य-
अँधियारे और उजाले के बीच न कोई फ़ासला है और न ही कोई दीवार। आँख बंद हो तो अँधियारा, खुली हो तो प्रकाश ही प्रकाश। प्रपंच और संस्कारों की पट्टियाँ....परमदृष्टि को रोके रखती हैं, या यूँ कहें कि हमें परमप्रकाश से वंचित रखती हैं। जिस क्षण अनायास, यह रुकावट ओझल हो जाए, परमसयानपन उभर आए।
दोनों के बीच न फ़ासला है वक्त का और न ज़मीनी।
- अरुण
दोहा....२९-३० जुलाई २०१६
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टेप चले गाना बजे..........................गाना गाये गीत
गाना ही गाना सुने.……................... भ्रमित हुआ संगीत
तात्पर्य-
गहन आत्म अवलोकन की जरूरत है.....
कल्पना कीजिए, कहीं कोई टेप, कैसेट, सीडी या रेडियो पर कोई गाना बज रहा हो और उसे सुननेवाला अगर कोई है.... तो वह है स्वयं बजनेवाला वह गाना ही। यही अवस्था मन की है। मन के भीतर विचार या कल्पनाओं के रूप में एक अखंड आवाज़ गूँज रही है और उस आवाज़ को केवल मन के भीतर बजनेवाली वह आवाज़ ही सुन पाती है। मनुष्य का ध्यान इस तरफ नही होता.... वह तो स्वयं मन बन जाता है, पूरी तरह मनाधीन होकर अपनी भ्रमावस्था में जीवन संगीत को खो बैठता है।
- अरुण
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आखर पोथी स्कूल की .................. शिक्षा केवल बंध
शिक्षा पा शिक्षित हुए .................... फिर भी रहते अंध
तात्पर्य-
शिक्षा का उद्देश्य आदमी को मानसिक निद्रा से जगाना है। फिर भी होता यह है कि चित्त शिक्षा-सामग्री या जानकारी के रूप में मिले ज्ञान के बोझ से दबकर निद्रा में ही बना रहता है। हाँ यह जानकारी उसे व्यावहारिक अर्थ में मददगार साबित होती है, फिर भी सही अर्थ में उसे ‘दृष्टि’ देगी इस बाक का कोई भरोसा नही। दृष्टि मूल समझ का नाम है, जानकारी या बौद्धिक समस्याओं को हल करने की क्षमता का नही। बौद्धिक क्षमता के सजग उपयोग को ही मूल समझ कहना ठीक होगा।
- अरुण
दोहा....३ जुलाई २०१६
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बिन समझे झुठलाय दे .................. कहलाएँ नास्तिक
बिन समझे जो मान ले................... वह भी तो नास्तिक
तात्पर्य-
आमतौर पर, ईश्वर के होने को जो नकारते हैं, उन्हे नास्तिक कहा जाता है। पर क्या वे सभी जो ईश्वर के होने को मान लेते हैं, आस्तिक हैं? मानना या न मानना आस्तिकता का पैमाना नही हो सकता। जो हाँ कहे वह भी और जो ना कहे वह भी, दोनों एक ही हैं। एक पैरों पे खड़ा है तो दूसरा सर पे। जिसमें अस्तित्व की पूरी समझ जाग जाती है, उसे ही आस्तिक समझें। बाकी सारे शाब्दिक विशेषण किसी भी अर्थ के नही। वे आदमीयों के किए गये, ऊपरी बँटवारे मात्र हैं।
- अरुण
दोहा....४ जुलाई २०१६
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सत खोजन के रास्ते...................... गुरू न होवे कोय
गहन खोज की प्रेरणा .....................
शिष्य बनाए तोय
तात्पर्य-
सत्य-खोज के मार्ग में गहन खोज की प्रेरणा चाहिए। ऐसी गहन प्रेरेणा का होना ही शिष्यत्व का सही आधार है। जिससे भी ऐसी प्रेरणा मिले, चाहे वह व्यक्ति हो या प्रसंग या साहित्य या ग्रंथ या सत्संग या दृष्टांत अथवा कुछ भी, वही सही गुरू है। किसी गुरू विशेष की पूर्वशर्त ज़रूरी नही।
- अरुण
दोहा....५-६ जुलाई २०१६
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कोरी कापी पर लिखे.......................सब को जो है भात
जो सिखलाए जात हैं...................... उन्हीं गुणों को गात
तात्पर्य-
मनुष्य कोरी बही लेकर जन्मता है, जिसपर वही बातें लिख ली जाती हैं जिन्हें दुनिया सराहे, दुनिया को भाये। वही उसके जीवन के मूल्य बनते हैं जिसे दुनिया ने, समाज ने संमति दी हो। मानवीय वातावरण उसे जो शिक्षा व संस्कार दे उसी को वह ग्रहण करता है। लेकिन सत्य की खोज कठोर है, वह मिली हुई जानकारी, शिक्षा और संस्कारों का तटस्थता से पुन: अवलोकन करती है।
- अरुण
आज की यह पोस्ट बैंगलोर से
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दोहा....७ जुलाई २०१६
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‘वह’ न किसी को ख़ूब दे ................और न देत अभाव
उसमें ना कुई दोस्ती.......................... ना कुई बैरीभाव
तात्पर्य-
अस्तित्व करुणामयी है। एक ऐसा प्रेम-स्रोत है जिसमें दोस्ती और दुश्मनी, दोनों को ही कोई स्थान नही, पक्ष-विपक्ष नही, भेदभाव नही, ज़्यादा-कम नही, मेरा-तेरा नही, न्याय-अन्याय नही, अमीर-ग़रीब नही...... बस करुणा ही करुणा है... सब के लिए ... सकल के लिए।
- अरुण
दोहा....८ जुलाई २०१६
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मन का परदा ना हिले.........................देख अपरिचित लोग
परिचय में लग जात है............................. भले बुरे का रोग
तात्पर्य-
राह चलते कितने ही अपरिचित लोग मिलते हैं और हम उन्हे त्रयस्थभाव से देखते रहते हैं। अपरिचित होने के कारण उनसे हमारा कोई वास्ता नही, नाता नही, भावना नही, स्मृति नही.. न ही उनपर न कोई प्रतिक्रिया होती है और न ही उनका कोई विशेषण होता है। यही भाव सारी परिचित वस्तुओं, व्यक्तियों, प्राणी एवं परिस्थिती बाबत होना चाहिए, परंतु यह संभव नही हो पाता। जहाँ परिचय वहाँ किसी न किसी अच्छी बुरी या उदासीन प्रतिक्रिया का होना अपरिहार्य है।
जबतक स्वयं के प्रति तटस्थता न होगी, अन्यों के प्रति भी नही हो सकती। सारे संबंध,प्रतिक्रियायें, भावनायें स्वयं के केन्द्र से ही होती हैं। स्वयं को जो तटस्थता से देख पाए वही साक्षीभाव का धनी हो पाए।
- अरुण
दोहा....९-१० जुलाई २०१६
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अकड दिखाये दूसरा................................गर तुझमें हो क्रोध
तू भी रोगी गर्व का .......................... कर लो मन में बोध
तात्पर्य-
दूसरों के अहंकारपूर्ण बर्ताव को देखकर हम उनपर अहंकारी होने का आरोप करते हैं। बात यहीं समाप्त हो जाए तो ठीक, पर ऐसा नही होता। क्योंकि बहुधा हमारा आरोप केवल निरीक्षण मात्र से फला नही होता, वह हममें जगे ग़ुस्से या क्रोध की एक प्रतिक्रिया बनकर बाहर आता है। हमें यह बात सहज मालूम पड़ती है और हम उसे भुला देते हैं। परंतु ऐसी स्थिती में अगर भीतर ग़ौर से देखें तो पाएंगे कि हमारे भीतर का अहंकार किसी दूसरे के अहंकार द्वारा आहत हो रहा है।
- अरुण
दोहा....११-१२ जुलाई २०१६
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‘मै’ पृथ्वी हूँ जगत में.........................पृथ्वी में ‘मै’ देश
सूबा हूँ ‘मै’ देश का............................ क्या मेरा परिवेश
तात्पर्य-
अहंकार सूक्ष्म से सूक्ष्म और बृहत् से बृहत् रूप धारण करता रहता है। जैसे जैसे संदर्भ की सीमाएँ बदलती हैं, अहं का आकार भी बदलता जाता है। सृष्टि के संदर्भ में मै पृथ्वी हूँ, पृथ्वी में मै अपने को भारत से identify करता हूँ, भारत में मै महाराष्ट्र, महाराष्ट्र में मेरा जो गाँव है वो, गाँव में मेरा अपना मुहल्ला, मुह्ले में मेरा अपना घर .......इसतरह मेरे अहंकार की काल्पनिक सीमाएँ सदर्भानुसार घटती बढ़ती रहती हैं।
- अरुण
दोहा....१३-१४-१५ जुलाई २०१६
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मन की गौरय्या चुगे................ कण कण में विस्तार
ध्यान चबाये सकल ही...................... एक कौर संसार
तात्पर्य-
मन में विचार एक सीधी रेखा की तरह चलते हैं। जगत के सारे विस्तार को, मन एक क्रमिक ज्ञान के रूप में समय की पट्टीपर... रचता जाता है। परंतु ध्यान सकल सृष्टि को एक क्षण में ही निहार लेता है।
- अरुण
दोहा....१६ जुलाई २०१६
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हिंदू-मन मुस्लिम बने...................... मुस्लिम हिंदू-प्राण
यही खरी है ‘एकता’.......................... बाकी सब भ्रममान
तात्पर्य-
हिंदू-मुस्लिम एकता की बहुत चर्चा होती रहती है। परंतु ‘एकता’ के नामपर जो होता दिखता है, क्या उसीको एकता कहना ठीक होगा? दोनों के बीच आपसी समझौता, आंतरिक-समझ या सामंजस्य के होने को भले ही अच्छा सकारात्मक रुख़ मान लिया जाए, परंतु एकता यह शब्द और भी व्यापक और गहन है। ‘एकता’ का संकेत उस मनोमिलन की ओर है जिसमें हिंदू-मन मुसलमान के अंतरंग में घुला हो और मुसलमान.. हिंदू के प्राणोंको महसूस करता हो। बात आंतरिक-समझ तक ही न रुके तो आगे बढ़कर आंतरिक मिलन में रूपांतरित हो… यही खरा संकेत है ‘एकता’ शब्द का।
- अरुण
दोहा....१७-१८ जुलाई २०१६
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दीप लिये जो ढूँढता ....................... ना दिखता अंधियार
जो जागा ना पालता........................ कोई चित्त- विकार
तात्पर्य-
चित्त के सारे विकार मन के अंधेरे में जन्म लेते हैं। जागरण ऐसा प्रकाश है जिसके अवतरित होते ही सारे मानसिक अंधेरे लुप्त हो जाते हैं, फलत: कोई भी चित्तविकार भी नही फलता। दरअसल न प्रकाश ने कभी अंधेरे को देखा है और न अंधेरे ने प्रकाश को। इसीतरह, जागरण ने निद्रा को और निद्रासे फलनेवाले विकारों को जाना ही नही कभी। जो सकल में जागा वह विकल न होगा, उसका चित्त विकारों से मुक्त होगा।
- अरुण
दोहा....१९-२० जुलाई २०१६
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सपने में घायल हुआ....................... दवा माँगता बैद
दवा उसे क्या काम की.................... जो सपने में क़ैद
तात्पर्य-
सपने का तात्पर्य नींदसे, बेहोशीसे, विचारों-चिंताओं या सपनों में खो जाने से है। ऐसी बेहोशी की अवस्था में होनेवाला कोई भी दुख या मानसिक वेदना किसीभी दवा से दूर नही हो सकती। नींदसे जाग जाना ही एकमेव दवा या उपाय है।
- अरुण
दोहा....२१-२२ जुलाई २०१६
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तनमन एक सुराग़ है .................... आत्मा एक आकाश
इस सुराग़ से झाँक लो .................. आत्मा जो अविनाश
तात्पर्य-
आत्मा को जानने के लिए तनमन की ही आवश्यकता है। इसी माध्यम से अस्तित्व को समझा जा सकता है। तनमन एक सुराग़ है जहांसे परमात्मा में लीन हुआ जा सकता है।
- अरुण
दोहा....२३-२४-२५ जुलाई २०१६
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पाँच द्वार के देह में........................पंचमुखी इक चोर
जिसे देह ना पा सके.................... हासिल कर ले चोर
तात्पर्य-
पाँच इंद्रियों वाले इस देह के भीतर पाँच मुखवाला मन नामक चोर अवतरित होता है। जिन चीज़ों की चाहना होती है, मन उसे शरीर से पहले ही लपककर प्राप्त कर लेता है... इतना ही नही उस वस्तु को मन ही मन उपभोगना भी शुरू कर देता है। भले ही, शरीर, चाही वस्तु को असलियत में, प्राप्त न कर पाए, पर मन हासिल कर लेता है और यह एक मानसिक तनाववाली स्थिति बन जाती है। मनुष्य ऐसे ही तनाओंसे जूझता रहता है... परेशान है।
- अरुण
दोहा....२६-२७-२८ जुलाई २०१६
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मिची आँख अंधियार है.................. खुली आँख उजियार
है इक पल का फ़ासला.....................बंधन....मुक्त-दवार
तात्पर्य-
अँधियारे और उजाले के बीच न कोई फ़ासला है और न ही कोई दीवार। आँख बंद हो तो अँधियारा, खुली हो तो प्रकाश ही प्रकाश। प्रपंच और संस्कारों की पट्टियाँ....परमदृष्टि को रोके रखती हैं, या यूँ कहें कि हमें परमप्रकाश से वंचित रखती हैं। जिस क्षण अनायास, यह रुकावट ओझल हो जाए, परमसयानपन उभर आए।
दोनों के बीच न फ़ासला है वक्त का और न ज़मीनी।
- अरुण
दोहा....२९-३० जुलाई २०१६
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टेप चले गाना बजे..........................गाना गाये गीत
गाना ही गाना सुने.……................... भ्रमित हुआ संगीत
तात्पर्य-
गहन आत्म अवलोकन की जरूरत है.....
कल्पना कीजिए, कहीं कोई टेप, कैसेट, सीडी या रेडियो पर कोई गाना बज रहा हो और उसे सुननेवाला अगर कोई है.... तो वह है स्वयं बजनेवाला वह गाना ही। यही अवस्था मन की है। मन के भीतर विचार या कल्पनाओं के रूप में एक अखंड आवाज़ गूँज रही है और उस आवाज़ को केवल मन के भीतर बजनेवाली वह आवाज़ ही सुन पाती है। मनुष्य का ध्यान इस तरफ नही होता.... वह तो स्वयं मन बन जाता है, पूरी तरह मनाधीन होकर अपनी भ्रमावस्था में जीवन संगीत को खो बैठता है।
- अरुण
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